Tuesday, 9 June 2020

अथर्ववेद में हिंसक मंत्र

क्या अथर्ववेद एक जंगी किताब है ?


इस पोस्ट में हम बस यह देखेंगे कि वेदों में कितने खतरनाक मंत्र हैं और वो मानवता के लिए कितने कष्टदायक साबित हो सकते हैं।
हर एक मंत्र में अपने शत्रु से ऐसा व्यवहार करने की आज्ञा दी गयी है जो आज तक कहीं नही दी गयी, ना किसी धर्म मे और ना किसी जाति में, और ना किसी देश में।

आइए हम उन मंत्रों को देखते हैं एक एक करके

मंत्र - 1
सेनापति मोहनास्त्र, आग्रेयास्त्र व व्यवयास्त्र के प्रयोग से शत्रुओं को विदुरत कर दें।

इसी तरह का एक मंत्र और है वह भी देखिए 

राजा राष्ट्र के शत्रुओं पर आक्रमण करे आग्रेयास्त्रों से उन्हें भस्म कर दे । मोहनास्त्र से शत्रु सैन्य को मूढ बना दे, उनके हाथ शस्त्रग्रहण में समर्थ न रहें | सूचना - यहाँ इस प्रकार के अस्त्र के प्रयोग का संकेत स्पष्ट है कि जिससे शत्रु - सैन्य चेतना खो बैठता है और उसके हाथों में से अस्त्र शस्त्र गिर पडते हैं ।

अब इस मंत्र में जो शब्द आये हैं उनको अर्थ समझिए

मोहनास्त्र:-  एक प्रकार का प्राचीन काल का अस्त्र जिसके प्रभाव से शत्रु मोह के वश में या मूर्च्छित/ अचेत/ बेसुध हो जाना/ Unconscious हो जाता था.। अर्थात ऐसे पदार्थ अपने शत्रु पर फेंक दो जिससे वो बेहोश हो जाये और फिर उसे आसानी से मार सकते हैं। यह छल कपट से मारने वाली बात है धोखा देकर।

आग्नेयास्त्र(Firearms) :- ऐसे अस्त्र जिनसे आग निकलती हो । जैसे तोप और बंदूक इत्यादि

वायव्य-अस्त्र:- पौराणिक काल के युद्धों में प्रयोग किया जाने वाला एक दिव्य बाण था। इस बाण के प्रयोग से भयंकर तूफ़ान आता है और अन्धकार छा जाता है।

इसका प्रयोग महाभारतकाल में किया जाता था।

दिव्यास्त्र वे आयुध हैं जो मन्त्रों से चलाये जाते हैं- ये दैवीय हैं। प्रत्येक शस्त्र पर भिन्न-भिन्न देव या देवी का अधिकार होता है और मन्त्र-तन्त्र के द्वारा उसका संचालन होता है। वस्तुत: इन्हें दिव्य तथा मान्त्रिक-अस्त्र कहते हैं।

बाकी और कितने तरह के अस्त्र शस्त्र होते थे आप इस लिंक पर क्लिक करके पढ़ सकते हैं।

मंत्र - 2
हिंसा के प्रयोग ! तू शत्रुओं को इस प्रकार निर्मूल कर दे जैसे कि वायु वृक्षों को निर्मूल कर डालता है । इन्हें पाँव तले रौंद डाल - दूर भगा दे । इनके गौ, अश्व व पुरुषों को जीवित मत छोड़ । लौटकर इन हिंसा-प्रयोग करनेवाले पुरुषों को प्रजाहीन हो जाने की चेतावनी दे । उन्हें यह स्पष्ट कर दे कि इन प्रयोगों का परिणाम इतना भयंकर होगा कि तुम्हारा वंश ही उच्छिन्न हो जाएगा । 

अब देखिए इस मंत्र में क्या कहा जा रहा है। अपने शत्रु के प्रति इतनी घृणा है इन मंत्रों में की इसकी मिसाल कहीं नही मिलेगी। 
पांव तले रौंदना कोनसा सभ्य काम है भाई ?
गाय, घोड़े(अश्व) और पुरुष को जिवित मत छोड़, जानवर तक को मानने की शिक्षा दी जा रही है ये कैसी क्रूरता है ? क्या वैदिक ईश्वर इतना क्रूर है कि उसे ना मनाने वाले के प्रति इतनी घृणा भरी है?
गाय तक को मारने की बात की जा रही है क्या गाय माता नही रही अब? क्या अपनी गाय माता और शत्रु की गाय माता नही है ? 

मंत्र - 3
राजा व सेनापति सैनिकों के प्रति उदार वृत्तिवाले होते हुए शत्रु - सैन्य पर आक्रमण करें और उसे भस्म कर दे।

इस मंत्र में कहा जा रहा है कि शत्रु को समाप्त करके ही सुरक्षित बनोगे।

मंत्र - 4
हे आगे बढने वाले वीरो ! खूब आगे बढो, विजयी बनो । तुम्हारी भुजाएँ बड़ी तेजस्वी हों । तीक्ष्ण बाणों वाले, तेजस्वी शस्त्रों वाले व तेजस्वी भुजाओं वाले तुम इन निर्बल धनुषों वाले निर्बल शत्रुओं को विनष्ट कर डालो ।


इस मंत्र में अपने तेजस्वी और नुकीले अस्त्रों से कमजोर तीर वाले दुश्मन पर हमला करने को कहा जा रहा है। 

मंत्र - 5
सेनापति का वभ्र शत्रुओं में इस प्रकार मार-काट करने वाला हो कि वे घबरा जाएँ।

अर्थात इस तरह से मार काट करनी है कि दुश्मन घबरा जाए सहम जाए।

मंत्र - 6
हमारे घर में उत्तम लोहे की बनी हुई तलवारें हैं और हे शत्रुकृत् हिंसा-प्रयोग ! जितने प्रकार के तेरे पर्व हैं उन्हें भी हम जानते हैं । हम अपने यहाँ शत्रुविनाश के लिए अस्त्र - शस्त्रों को तैयार रक्खें तथा शत्रुकृत् हिंसा - प्रयोगों के प्रति सावधान रहें । शत्रुकृत् हिंसा - प्रयोग को सम्बोधित करते हुए हम कह सकें कि तू यहाँ से उठ ही खड़ा हो, यहाँ से सुदूर स्थान में चला जा । हे अज्ञातरूप में रहनेवाली हिंसाक्रिये ! यहाँ तू क्या चाहती है अर्थात् यहाँ तेरा क्या काम है ? तुझे हम समझ गये हैं - अब तू यहाँ से दूर ही रह ।

लोहे की बनी हुई तलवारों को दुश्मन के लिए पहले से तैयार रखें। इस मंत्र से ऐसा लग रहा है वैदिक काल में बहुत घमासान जंगे हुए करती थी। लेकिन वेद तो एक बार मे ही अवतरित हो गए थे, तो क्या वैदिक ईश्वर ने पहले से बता दिया था कि वेदों को ना मानने वालों के साथ केसा व्यवहार करना है? वैदिक ईश्वर है या जंग सिखाने वाले उस्ताद??

मंत्र - 7
यह राष्ट्रपति, गतमन्त्र के अनुसार, प्रबल आक्रमण के द्वारा तुम्हारे हृदयों में ( यानि चित्तानि) जो चित्त हैं, नष्ट करने की भावनाएँ हैं, उन्हें मोह अवस्था में ले जाए । वे चित्त चेतना शून्य हो जाएँ । हमें नष्ट करने के तुम्हारे स्वप्न समाप्त हो जाएँ । 2. यह अग्रि तुम्हारा पीछा करता हुआ तुम्हें तुम्हारे घरों में से भी सन्तप्त करके निकाल दे । तुम्हें सब ओर खूब ही सन्तप्त (वंचित) कर दे । तुममें भाग-दौड़ मच जाए और तुम कहीं भी रुक न पाओ ।

इस मानते को देखिए अपने शत्रु के प्रति कैसी घृणा है खतरनाक आक्रमण करो। उन्हें मोह अवस्ता में ले जाओ अर्थात बेहोशी की दशा में ले जाओ । यहां तक के घरों रक पीछा करके उन्हें घरों से निकाल दे। दुश्मन में भाग दौड़ मच जाए और कहीं भी रुक ना पाओ। खूब ही आक्रमणकारी नीति है ।

मंत्र - 8

राष्ट्रपति शत्रुओं पर ऐसा प्रबल आक्रमण करे कि उन की शत्रुओं में आयुधग्रहण का सामथ्र्य ही न रहे।

अर्थात शत्रु पर इतना खतरनाक आक्रमण करना है कि वो दुबारा उठ खड़ा होने की हिम्मत ही ना करे।

मंत्र - 9
Sandarbh :शत्रु के चुने हुए वीरों का विनाश 
हम समझदारी से अस्त्रवर्षां करके शत्रु के चुने हुए वीरों का विध्वंस कर दें । इनमें से कोई बच न पाये । मुख्य सैनिकों के विनाश से सामान्य सैनिकों का विनाश अनावश्यक हो जाता है । विशेष-विजयी राष्ट्र में तेजस्विता व अभ्युदय की वृद्धि होती है । लोग उत्तम वसुओंवाले, उत्तम निवासवाले ' वसिष्ठ ' बनते हैं । 

यहां वैदिक ईश्वर दुआ सीखा रहा है कि 
अस्र समझदारी से फेका जाए और दुश्मन को चुन चुन कर मारे और उनके श्रेष्ठ योद्धाओं को मारे। इन में से कोई भी ना बच पाए। 

मंत्र - 10

राजा सैनिकों को उत्साहित करे । वीर - प्रेरणा को प्राप्त सैनिक शत्रुओं को पराजित करने वाले हों, राजा स्वयं सेनाओं के नेतृव करे और प्रबल आक्रमण द्वारा शत्रुओं को समाप्त के दें


खतरनाक आक्रमण द्वारा शत्रुओं को समाप्त करो। और राजा शत्रुओं को जंग करने पर उभारे। वाह! शांति संदेश दिया जा रहा है प्रभू।

मंत्र - 11

हे जितेन्द्रियता व सौम्यता के भावों ! (राजा, न्यायाधीश) जितेन्द्रिय राजन व सौम्य न्यायाधीश ! आप दोनों मस्तिष्करूप धुलोक से ज्ञान से पापी के विनाशक आयुध को प्रवृत्त करो । इस प्रकार ज्ञान पूर्वक दण्ड दो कि पापी की पापवृत्ति नष्ट हो जाए । पृथिवी से ऐसे आयुध को उत्पन्न करो जोकि पाप का शंसन करने वाले के लिए विनाशक हो । पार्थिव अस्त्रों से तलवार आदि से शत्रु का विनाश किया जाए । २. पर्ववान मेघों से शब्दपूर्वक सन्तप्त करने वाली विद्युत शक्ति से उत्पन्न शस्त्र को बनाओ, जिससे कि दुष्टता में बहुत बढते हुए राक्षसी वृत्ति के पुरूष को आप हिंसित कर दें ।


Bhavarth . पापी को ज्ञान के अस्त्र से विनष्ट किया जाए समझदार उसके पाप को दूर किया जाए । ऐसा न होने पर पार्थिव अस्त्रों से दण्डित कर उसे पाप निवृत्ति के लिए प्रेरित किया जाए । विवशता में विद्युत शस्त्र से (पर बिठाकर) उसे समाप्त कर दिया जाए ।

अगर शत्रु ना माने तो उसके लिए बिजली से चलने वाला यंत्र बना कर उस पे बिठा कर उसे समाप्त कर दिया जाए।

मंत्र - 12
हे प्राणियों के रक्षक प्रभो ! सबको बराबर कर देनेवाली इस दिव्य अस्वरूप विद्युत् को हमारा लक्ष्य करके मत फेंकिए । हम पर आकाश से यह बिजली न गिर पड़े । गिरती हुई विद्युत् सबको गिराती हुई समीकृत- सा कर देती है । हमारे प्रति आप क्रोध न कीजिए - हम पाप से बचते हुए आपके क्रोध-पात्र न ही । हम आपके लिए नतमस्तक होते हैं । २. इस आकाश में होनेवाली- अलौकिक आकाश में शयन करनेवाली शक्तिशाली विद्युत् को हमसे भिन्न अन्य स्थान में ही कम्पित कीजिए । हम विद्युत्पतन के शिकार न हों ।

वेदीक ईश्वर को गुस्सा भी आता है वो भी इतना भयंकर की अपने मानने वालों पर बिजली गिरा देता है। वेदों के मानने वाले ही वैदिक ईश्वर से इतने डरे हुए हैं कि कह रहे हैं इस बिजली को हमारी तरफ मत फेंकिये। क्या वैदिक ईश्वय भूल गया था जो उसे उसके ही मानने वाले बता रहे हैं कि बिजली किधर गिरानी है ?? 

मंत्र - 13
[हे रुद्र परमात्मन् !] तो न हमारी गौओं में और पुरुषों में और न हमारी बकरी और भेड़ों में [ मारने की ] अभिलाषा कर । (उग्र) - हे बलवान् ! दूसरे [वैरियों] में घूम जा और हिंसकों की प्रजा [जनता] को मार


यहाँ भी वैदिक धर्मी वैदिक ईश्वर से दुआ कर रहे हैं कि हे परमात्मा हमारी गायों,पुरुषों बकरियों को मत मार दूसरों को मार ।
बताओ वैदिक ईश्वर को मारने काटने के अलावा और कोई काम नही है ? वैदिक धर्मी खुदकी गाय बकरी तो अपने ईश्वर से दुआ करके बचा रहे हैं लेकिन दूसरे की गाय बकरी प्रजा को मरवा रहे हैं। 

मंत्र - 14
इस ब्रह्मघाती (वैदविरोधी) के लोमों को काट डाल । इस की त्वचा (खाल) को उतार लो । इसके मांस के लोथड़ों को काट डाल । इसकी नसों को ऐंठ दे - कुचल दे । इसकी हड्डियों को मसल डाल । इसकी मज्जा को नष्ट कर डाल । इसके सर्वाअङ्गों व जोड़ों को विश्रथय ढीला कर दे बिल्कुल पृथक् - पृथक् कर डाल । कच्चे मांस को खा - जानेवाला इस ब्रह्मज्य को पृथिवी से धकेल दे और जला डाले ।

अथर्ववेद 12:5:68-73

अथर्ववेद के 12वें अध्याय के 5वें सूक्त का यह मंत्र है जिसमे वेद को ना मानने वाले के लिए इतना भिभत्स कार्य बताया है कि पूरी दुनिया में आपको ऐसा कार्य कहीं नहीं मिलेगा।

ध्यान रहे ये बात उस व्यक्ति के लिये कही जा रही है जो वेदों का इनकार करता है उन्हें नही मानता है। वेदों का विरोध करता है उसके बनाये नियम को नही मानता है।

मुझे नहीं लगता कि इससे ख़तरनाक मंत्र और भी होगा वेद में।

मंत्र - 15

मैं जो खाता हूँ, उससे बल का सम्पादन करता हूँ । इस प्रकार शक्ति के दृष्टिकोण से ही भोजन करता हुआ, अर्थात् स्वाद के लिए न खाता हुआ वज्रतुल्य दृढ़ शरीर का आदान करता हूँ । अब उस शत्रु के कन्धों को मैं इस प्रकार नष्ट कर डालता हूँ जैसे शक्तियों का स्वामी सूर्य  आच्छादन करनेवाले मेघ के अवयवों को छिन्न - भिन्न कर देता है ।

वैदिक धर्मी खाना इसलिए खाते हैं क्योंकि उनका शरीर एक हत्यार के रूप में काम मे ले सकें। और देखिए क्या कह रहा मंत्र दुश्मन के कंधों को ऐसे तोड़ू जैसे बादल छिन्न भिन्न हो जाते हैं।
अब बताओ ये किताब मानव की शांति के लिए है या मानव को खत्म करने के लिए है??

मंत्र - 16
मैं जो जल पीता हूँ तो शत्रु का निग्रह करके उसके रस को ही पी जाता हूँ, उसी प्रकार समुद्र नदीमुख से सारे जल को लेकर सम्यक् पी जाता है । हम भी उस शत्रु के प्राणापान आदि व्यापार को पीकर उस शत्रु को ही पी जाते हैं । जो कुछ मैं खाता हूँ तो शत्रु को ही निगल जाता हूँ । जैसेकि समुद्र नदी - जल को निगीर्ण कर लेता है । हम भी उस शत्रु के  प्राणों को निगलकर उस शत्रु को ही निगल जाते हैं ।
 
भावार्थ- हम खाते - पीते इस दृष्टिकोण को न भूलें कि इस खान - पान से शक्ति का सम्पादन करके शत्रुओं को ही खा - पी जाना है , स्वाद का दृष्टिकोण तो हमें ही शत्रुओं का शिकार बना देगा 

अब इस मंत्र के संबंध में तो कोई क्या ही बोले कि खाने पीने के साथ भी मारने की सोच रखते हैं ये मंत्र।
जिस तरह समुद्र नदी के जल को अपने समा के नदी के जल का नाम ही खत्म कर देता है ऐसे ही ये भी दुश्मन का नाम निशान खत्म के देते हैं। ये खाते पीते ही इस लिए हैं कि दुश्मन को ही खा पी जाएं।


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