आपत्ति नंबर 14
क़ुरआन सूरह बक़रह
आयत : 53 व 65
हमने मूसा को किताब और चमत्कार दिए । हमने उनको कहा तुम अपमानित बन्दर हो जाओ यह एक डर दिखाया जो उनके सामने और पीछे थे उनको और पथ प्रदर्शन ईमानदारों को।
(आयत : 53 व 65)
आपत्ति 14
यदि मूसा को किताब दी थी तो कुरआन का होना बेकार है यह बात जो बाइबिल और कुरआन में लिखी है कि उसे चमत्कार दिखाने की ताकत दी थी मानने योग्य नहीं क्योंकि यदि ऐसा हुआ था तो अब भी होता । यदि अब नहीं होता तो पहले भी नहीं हुआ था जैसे स्वामी लोग आजकल भी जाहिलों के बीच विद्वान बन जाते हैं इसी तरह उस जमाने में भी धोखा किया होगा ।
क्योंकि ईश्वर और उस की पूजा करने वाले अब भी मौजूद हैं । तब भी इस समय ईश्वर चमत्कार दिखाने की ताकत क्यों नहीं देता ? और न वे चमत्कार दिखा सकते हैं । यदि मूसा को किताब दी थी तो दोबारा कुरआन के देने की क्या जरूरत थी ? क्योंकि यदि भलाई बुराई करने में करने का उपदेश सब जगह समान है तो दोबारा विभिन्न किताबों के बनाने से पिसे हुए के पीसने का उदाहरण लागू होता है । क्या ईश्वर उस किताब में जो कि मूसा को दी थी कुछ भूल गया था । यदि ईश्वर ने अपमानित बन्दर हो जाना मात्र डराने के लिए कहा तो उसका कहना झूठा हुआ या उसने धोखा दिया या जो ऐसी बातें करता है वह ईश्वर नहीं और जिस किताब में ऐसी बातें मौजूद हों वह ईश्वर की ओर से नहीं हो सकती ।
आपत्ति का जवाब
चमत्कारों के बारे में बड़ा अच्छा प्रश्न किया । स्वामी जी ! आप ही के कथनानुसार दुनिया के आरंभ में यदि मनुष्य जवान जवान पैदा हुए थे (सत्यार्थ प्रकाश अध्याय 8)_* तो क्यों जवान जवान पैदा नहीं होते । यदि आप कहें कि वे बच्चे पैदा होते तो उनके लालन पालन के लिए दूसरे मनुष्यों की जरूरत पड़ती जिससे आप का मतलब यह है कि अब जवान जवान पैदा होने की ज़रूरत नहीं तो ठीक इसी तरह चूंकि पैगम्बर कोई नहीं इसलिए चमत्कार दिखाने की जरूरत नहीं ।
आपने यह सवाल तो किया कि चमत्कार दिखाने की अब ताकत क्यों नहीं मगर यह न सोचा कि पहले जो ताकत थी वह किन को थी ? आज पंडित जी होते तो हम उनसे पूछते कि बताइए आपके जीवन में तो आर्य समाज को वेदों की टीका लिखने की ताकत अब क्यों नहीं ? क्यों आप ही की लकीर के फकीर बने हुए हैं क्यों आपके पौने दो वेदों की टीका को पूरे दो भी नहीं कर दिखाते लाला साहब ।
इससे अधिक जानकारी के लिए तफसीर सनाई तीसरा भाग देखें । बाइबिल के होते कुरआन की जरूरत के बारे में हम पहले वाक्य 05 में लिख आए हैं । और सुनिए आप ही के शब्दों में सुनाते |
"ईश्वर का ज्ञान असीम है या नहीं ? तो फिर काम के लिए ? यदि कहो कि अपने ही लिए ले ली है तो क्या ईश्वर उपकार नहीं करता । तुम यह कहोगे करता है फिर इससे क्या ? इससे यह कि ज्ञान अपने लिए होता है और दूसरों के लिए भी क्योंकि इसके यही दो उद्देश्य हैं । यदि ईश्वर उपदेश न देता तो ज्ञान का दूसरा उद्देश्य अपनी मौत मर जाता । इसलिए ईश्वर ने अपने ज्ञान (कुरआन मजीद)_1 के उपदेश से इस दूसरे मतलब को पूरा किया है परमेश्वर बड़ा दयावान है यदि ऐसा न करता तो सदैव अज्ञानता का सिलसिला स्थापित रहता और मनुष्य धर्म, अर्थ काम, मोक्ष की प्राप्ती से वंचित रहकर परम आनन्द न पा सकता ।"(वृग वेद आदि भाषा भूमिका पृष्ठ - 8 )
बताइए यदि कुरआन न आता तो अरब जैसे लड़ाकू वहशी और बहुदेव वाद से लिप्त देश को कौन पथ प्रदर्शन करता । वेद दानव को तो वह रास्ता भी मालूम न था वह गैरों को पथ प्रदर्शित करके अपने में मिलाते थे । न वेद में यह कशिश थी कि गैरों को खींच लेता जिसका पक्का सबूत है कि आपके कथना नुसार 2 अरब साल वेद को बने हो गए आज तक कहीं किसी देश में हिन्दुस्तान के अलावा कोई भी इस का नाम लेने वाला नहीं कोई इतना भी तो नहीं जानता ।
अभी इस राह से गुजरा है कोईकहे देती है शोखी नक्शे पा की
तौरात, इंजील वालों का हाल यह था कि एकेश्वरवाद की बजाए तसलीस (तीन ईश्वरों का अकीदा) में आज तक डुबे हुए हैं । सुनिए
कुरआन अपने बयान में विवश नहीं है वह अपनी वजह बताता है । वेद की तरह "मुरीदां हमें परानन्द” का मोहताज नहीं । ईश्वर अरबों को संम्बोध करके फरमाता है कि ।
अरबी में कुरआन इसलिए उतारा है ताकि तुम न कहने लगो कि हम से पहले लोगों पर किताब उतरी थी और उनकी तालीम से अनभिज्ञ थे ।
(अन्नाम : 155)
निश्चय ही उनको बन्दर बनाया था झूठ क्यों होता । मगर ऐसे नहीं कि आपको आवागमन की सूझे बल्कि उनके इसी शरीर को जिसमें वे थे बन्दर बना दिया था न कि सामान्य तरीके मां के गर्भ में जाकर जैसे वेदिक मत वाले बनते हैं और कहते हैं । विस्तार से देखो रिसाला बहस तनासुख में ।
- स्वामी जी की तहरीर में वेद है।
*(प्रश्न) सृष्टि की आदि में एक वा अनेक मनुष्य उत्पन्न किये थे वा क्या?
(उत्तर) अनेक। क्योंकि जिन जीवों के कर्म ऐश्वरी सृष्टि में उत्पन्न होने के थे उन का जन्म सृष्टि की आदि में ईश्वर देता है। क्योंकि ‘मनुष्या ऋषयश्च ये। ततो मनुष्या अजायन्त’ यह यजुर्वेद में लिखा है। इस प्रमाण से यही निश्चय है कि आदि में अनेक अर्थात् सैकड़ों, सहस्रों मनुष्य उत्पन्न हुए । और सृष्टि में देखने से भी निश्चित होता है कि मनुष्य अनेक माँ बाप के सन्तान हैं।
प्रश्न
यहां पर एक प्रश्न और मन में उठता है कि स्वाम जी ने लिखा है कि "मनुष्या ऋषयश्च ये। ततो मनुष्या अजायन्त" यह मंत्र यजुर्वेद में लिखा है। लेकिन स्वामी जी ने इसका पूर्ण प्रमाण नही लिखा। और महत्वपूर्ण बात ये है कि आज तक इसका सही प्रमाण मिल भी नही पाया है। आज तक किसी भी आर्य समाजी ने इस मंत्र को यजुर्वेद में नही पाया है। तो क्या यह मान लिया जाए कि स्वामी जी ने यह मंत्र मन से बना लिया है ? और लोगों(आर्य समाजियों) को बेवकूफ बना दिया है? और यह बहुत से जवान जवान लोगों के पेड होने की बात कोरी कल्पना है ?
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