Sunday, 31 May 2020

आपत्ति नंबर 13
क़ुरआन सूरह बकरा
आयत : 48
उस दिन से डरों कि जब कोई आत्मा किसी आत्मा पर भरोसा न रखेगी न उसकी सिफारिश कुबूल की जाएगी न उससे बदला लिया जाएगा और न वे मदद पावेंगे ।_1
     (आयत : 48) 

 आपत्ति - 13

क्या मौजूदा दिनों में न डरें । बुराई करने से सदैव डरना चाहिए जब सिफारिश न मानी जाएगी तो फिर यह बात कि पैगम्बर (दूत) की गवाही या सिफारिश से ईश्वर जन्नत देगा, किस तरह सच हो सकेगी ? क्या ईश्वर जन्नत वालों ही का मददगार है । जहन्नम वालों का नहीं ? यदि ऐसा है तो ईश्वर पक्षपाती है । 

आपत्ति का जवाब

स्वामी जी ! अनादर कर रहा हूं क्षमा करें . . . . . . बुद्धि शायद काम नहीं करती आपकी । “किसी दिन से डरना" और "किसी दिन में डरना” इन दोनों वाक्यों में अन्तर है । आपको कौन कहता है कि उस दिन से मौजूदा दिनों में न डरें । ईश्वर आपको भलाई प्रदान करे क्योंकि बुराई करने से सदैव डरना चाहिए । 

पंडित जी ! “से" का शब्द जज़ा पर आया है अतएव आपने भी । बुराई करने से लिखा है चूंकि मुसलमानों के निकट पूर्ण सजा व इनाम उस दिन में होगी । इसलिए कहा गया कि उस दिन से डरो । जिसके साफ मायना हैं कि बुराई करने से डरो ! स्वामी जी ! | 
मैं इलज़ाम उनको देता था कुसूर अपना निकल आया

इसलिए हम बार बार कहते हैं कि कुरआन को भी किसी अरबी पाठशाला में रहकर पढ़ लेते तो तस्वीर का रुख दूसरा होता । 

सिफारिश चूंकि ईश्वर की अनुमति के बिना नहीं होगी अर्थात किसी नबी, वली का व्यक्तिगत हक या लिहाज नहीं होगा कि अपराधी की सिफारिश करे । जब तक ईश्वर उसे खास अनुमति न दे । इसलिए यह कहना पूरी तरह मुनासिब है कि किसी की सिफारिश स्वीकार न होगी अर्थात कोई सिफारिशी, सिफारिश ही नहीं करेगा । 
"खूब कही . . . जहन्नम वालों का हामी नहीं तो तरफदार है।"
(सूरह निसा - 35)

स्वामी जी को औरों की तो क्या याद होती ऐसे भोले हैं कि अपनी | भी भूल जाते हैं । सुनिए....
मेरा आशीर्वाद उन्हीं लोगों के लिए है जो सद कर्म और भले हैं न उनके लिए जो जनता के लोगों पर अत्याचार करने वाले हैं । मैं दुराचारी अत्याचारियों को कभी । आशीर्वाद नहीं देता ।

समाजियो ! बताओ परमेश्वर पक्षपाती है या नहीं ? 
                   
हाथ ला उस्ताद क्यों कैसी रही । 
 
  1. बनी-इसराईल के बिगाड़ की एक बहुत बड़ी वजह ये थी कि आख़िरत के बारे में उनके अक़ीदे में ख़राबी आ गई थी। वो इस क़िस्म के ग़लत ख़यालों में पड़ गए थे कि हम अज़ीम नबियों की औलाद हैं, बड़े-बड़े वलियों, सुधारकों और ज़ाहिदों (इबादत करनेवाले लोगों) से ताल्लुक़ रखते हैं। हमारी बख़शिश तो उन्हीं बुज़ुर्गों की मेहरबानी से हो जाएगी। उनका दामन थामने के बाद कोई सज़ा कैसे पा सकता है? इन्हीं झूठे भरोसों ने उनको दीन से बेपरवाह और गुनाहों के चक्कर में फँसा दिया था। इसलिये नेमत याद दिलाने के साथ फ़ौरन ही उनकी इन ग़लतफ़हमियों को दूर किया गया है।
तफ़्सीर मौलाना मौदूदी


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