आपत्ति

Monday, 18 May 2020


आपत्ति नंबर 2
क़ुरआन सूरह फ़ातिहा 
आयत : 2

       
"सारी प्रशंसा वास्ते अल्लाह के जो सारे जगत का पालनहार क्षमा करने वाला कृपालू है"
                                                                    (आयत : 2)
आपत्ति - 2

यदि कुरआन का अल्लाह दुनिया का पालनहार होता और सब पर दया और क्षमा किया करता तो दूसरे धर्म वालों और हैवानात आदि को भी मुसलमानों के हाथ से कत्ल का आदेश न देता । यदि क्षमा करने वाला है तो क्या पापियों पर भी दया करेगा ? और यदि करेगा तो आगे जिक्र आएगा कि "काफिरों को क़त्ल करो” अर्थात जो कुरआन और पैगम्बर को न मानें वही काफिर है । ऐसा क्यों कहता ? इसलिए कुरआन अल्लाह का कलाम साबित नहीं होता ।

आपत्ति का जवाब 

इस वाक्य में आपत्ति कर्ता स्वामी जी ने जिहाद की ओर इशारा किया है और अपनी आदत के अनुसार आगे भी कई एक अवसर पर इशारा करेंगे इसलिए उचित मालूम होता है कि जिहाद की हकीकत वेद और कुरआन से इसी जगह स्पष्ट कर दी जाए और आगे आने वाले अवसरों पर इसी जगह के हवालों से काम लिया जाए । स्पष्ट रहे कि वेद और वेद के अलावा मनुस्मृति आदि में जिनको स्वामी जी प्रमाणिक और विश्वसनीय मानते हैं जिहाद के बारे में विभिन्न प्रकार के निर्देश मिलते हैं । 

वेद की पहली हिदायत जंग में काम आने वाले हथियारों को ठीक करने के बारे में है जो ऋग्वेद मंडल प्रथम सूक्त 39 मन्त्र 2 में लिखा है । 

 "ऐ आज्ञा पालक लोगों ! तुम्हारे हथियार अग्नि आदि तोप व भाले, तीर व तलवार आदि शास्त्र विरोधियों को पराजित करने और उनको रोकने के लिए प्रशंसनीय और सट्टढ़ हों । तुम्हारी सेना सतर्क व होशियार हो ताकि तुम सदैव विजयी होते रहो ।"
एक और स्थान पर दुआ यूं लिखी हुई है ।

 "मैं उसका रक्षक कायनात के स्वामी मान एवं प्रताप वाले अत्यन्त बलवान और विजयी सारी कायनात के राजा सर्व शक्तिमान और सबको शक्ति प्रदान करने वाले परमेश्वर को जिसके आगे समस्त ज़बरदस्त बहादुर आज्ञा पालक सर झुकाते हैं । और जो न्याय से प्राणियों की रक्षा करने वाला इन्द्र है । 
"हर जंग में विजय पाने के लिए आमन्त्रित करता हूं और शरण लेता हूं।”

एक जगह परमेश्वर दुआ देता है ।
"ऐ मनुष्यो ! तुम्हारे हथियार अर्थात तोप बन्दूक_1 आदि अग्नि धावक शस्त्र और तीर व कमान तलवार आदि हथियार मेरी कृपा से शक्ति शाली और साहस वर्धक कार्य वाले हो तुम दुश्मनों की सेना को पराजित करके उन्हें पछाड़ो । तुम्हारी सेना विश्व व्यायी हुकूमत इस धरती पर स्थापित हो और तुम्हारा शुत्र (घणात्मक खतरनाक तलवार म्यान वाली) पराजित हो और नीचा देखे। (जैसा गाजी महमूद गजनवी और मुहम्मद गौरी ने नीचा देखा ?)
(उपरोक्त ऋग्वेद मंत्र भी यही है)

एक स्थान पर लिखा है ।
       
"ऐ दुश्मनों के मारने वाले जंग के नियमों में माहिर निडर, साहसी, प्रिय, प्रतापी और जवां मर्द तू सब प्रजा को प्रसन्न रख । परमेश्वर के आदेश पर चलो और घ्रणित शुत्र को ( हे महाराज इतनी नाराजी ) पराजित करने के लिए लड़ाई का कार्य पूरा करो । तुमने पहले मैदानों में शत्रुओं की सेना को पछाड़ा है । तुमने इन्द्रियों को पराजित और धरती को विजयी किया है । तुम शक्तिशाली बाजू वाले हो । अपनी बाजू की ताकत से दुशनों को समाप्त करो ताकि तुम्हारे बाजू का जोर और ईश्वर की दया व कृपा से हमारी विजय हो ।
(अथर्ववेद कांड 6 , अनुवादक वरग 95 मन्त्र 3)

 मनु जी का आदेश यह है- 
         
"जब जनता प्रेमी राजा कोई अपने से छोटा चाहे बराबर चाहे बड़ा जंग के लिए बुलाए तो क्षत्रियों के धर्म को याद करके जंग के मैदान में जाने से अपने आपको न रोके , बल्कि बड़ी होशियारी के साथ उनसे जंग करे जिससे अपनी विजय हो ।"

 एक स्थान पर आदेश है ।
   
 "किसी समय उचित समझे, दुश्मन को चारों ओर से घेर कर  रोक रखे और उसके देश को तकलीफ पहुंचा कर चारा_1, खुराक पानी और अन्य सामान को नष्ट और खराब कर दे।”
"शत्रु के तालाब, नगर के प्रकोट और खाई को तोड़ फोड़ दे, रात्रि में उनको भय देवें और जीतने का उपाय करें ।"
(धिक्कार है समाजियो ! यह दया कैसी ? देखो मनु महाराज जी) 

एक जगह आदेश है ।
"अपने मतलब की पूर्ति के लिए उचित या अनुचित समय में दुश्मन के साथ जो अपने किसी दोस्त की गलती करने वाला हो लड़ना, अर्थात इसी दो प्रकार के आधार पर जंग करना चाहिए ।'' 

नोट:- यहां से कुछ हमारी तरफ से लिखा जा रहा है जो कि दोनों कोष्ठक [ ] के बीच मे होगा
["हे अन्न वाले! [व वज्र वाले परमेश्वर]। तुझको स्तुति करने वाले लोग अच्छे प्रकार प्रसन्न करें। तू [हमारे लिए] धन कर, वेद द्वेषों को नष्ट कर।" 

"हम लोग जिस से द्वेष करें और जो हम से द्वेष करे, उस को हम शेर आदि पशुओं के मुख में डाल दें।" 

"तू [वेद निंदक] को, काट डाल, चीर डाल, फाड़ डाल, जला दे, फूँक दे, भस्म कर दे।"
  

यजुर्वेद के एक मंत्र में विद्वानों को संबोधित करते हुए लिखा है कि

मैं दुष्ट स्वभाव वाले शत्रुओं के शिरों(Head) को भी छेदन(चीर-फाड़) करता हूँ वैसे तुम भी छेदन करो ।

यहाँ वेद मंत्र ख़ुद दुष्ट स्वभाव वाले शत्रुओं के सिरों को काटने की आर्य समाजियों को आदेश दे रहे हैं। यह वेद मंत्र कितना अमानवीय है कि अपने शत्रु के साथ केसा बर्ताव करने का आदेश दे रहा है। ध्यान रहे आर्यों का शत्रु आर्यों के धर्म को ना मानने वाला हर व्यवक्ति है।

जिस ईश्वर ने वेदों में गैर लोगों से ऐसे भयंकर व्यव्हार की शिक्षा दी है और उनको दस्यु, राक्षस, और असुर के ख़िताब दिए हैं, वह ईश्वर पक्षपाती अवश्य है।

और सुनिए अथर्ववेद कहता है
"वेदानुयायी सत्यवीर पुरुष नास्तिकों का नाश करें"

अब प्रश्न ये है कि नास्तिक कोन हैं? केवल ईश्वर में आस्था न रखने वाले? चलिए देखते हैं कि स्वामी दयानंद सरस्वती नास्तिक किसको कहते हैं.
     "नास्तिक वह होता है, जो वेद ईश्वर की आज्ञा, वेदविरुद्ध पोपलीला चलावे"

इस परिभाषा में वह सारे लोग आते हैं जिन की वेदों में आस्था नहीं है जैसे मुस्लिम, ईसाई, जैनी, बोद्ध आदि. इस से यह स्पष्ट होता है कि वेद अन्य धर्मों के लोगों को नष्ट करने की शिक्षा देता है.
स्वामी दयानंद सरस्वती सत्यार्थ प्रकाश में ब्रह्मोसमाज और प्रर्थ्नासमाज की आलोचना करते हुए लिखते हैं,
"जिन्होंने अँगरेज़, मुसलमान, चंडाल आदि से भी खाने पीने का अंतर नहीं रखा। उन्होंने यही समझा कि खाने और जात पात का भेद भाव तोड़ने से हम और हमारा देश सुधर जाएगा लेकिन ऐसी बातों से सुधार कहाँ उल्टा बिगाड़ होता हे।"

मुसलमान और ईसाई कितने ही सदाचारी हों, स्वामी जी के अनुसार उनके साथ खाना उचित नहीं। यह पक्षपात नहीं तो और क्या हे? क्या आप अब भी ऐसे 'आर्य समाज' में रहना पसंद करेंगे? ]

क्या इतने हवालों के बाद भी आपत्ति कर्ता और उनके चेले ।  जिहाद को मुंह पर लाएंगे और कहेंगे कि ''यदि कुरआन का ईश्वर संसार का पालनहार होता और सब पर क्षमा और दया किया करता तो दूसरे धर्म वालों और जानवरों आदि को मुसलमानों के हाथ से कत्ल कराने का आदेश न देता । 

पाठक जनो ! यह है स्वामी जी का न्याय और यह है उनकी ईमानदारी और फिर कौम का लीडर ।
अल्लाह रे ऐसे हुस्न पे ये हैं तेरी बे नियाजियां
बन्दा  नवाज  आप  किसी  के   खुदा  नहीं  | 

हमारे इन वेदिक हवालों से जहां जिहाद का मसला हल हो गया । वेद की प्राचीनता और दुनिया का आदिकाल से होना भी असत्य हुआ । पाठक गण तनिक ध्यान से देखें । 

अब इस आपत्ति का जवाब सुनियेः कुरआन में कहीं लिखा कि काफिरों को उनके कुफ्र के कारण मारो और कत्ल करो , बल्कि साफ इर्शाद है ।
     
"जो तुम से लड़े तुम उनसे लड़ो और लड़ने में अत्याचार न करो, निस्सन्देह अल्लाह अन्याय करने वालों से मुहब्बत नहीं  करता ।
(सूरह बकरा - 19)

स्वामी जी । यदि काफिरों को कुफ्र के कारण मारने का आदेश होता तो काफिरों को जनता के रूप में क्यों रखा जाता । यह मसला हमारी किताबों में अनेक अवसरों पर आया है । आगे भी स्वामी जी को जिन-जिन आयतों में से सन्देह होगा दूर किया जाएगा इन्शा अल्लाह । 

पाठको ! आपत्ति करने वालों का न्याय देखिए कि यह आयत (पूरी सूरह फातिहा अन्त तक) ऐसी पाकीज़ा शिक्षा से भरी हुई है । मगर आपत्ति कर्ता को भलाई भी हलक से नहीं उतरी, क्यों न हो मुसलमानों के हाथ से छूत है । 

मददगार साहब से यह तो न हो सका कि इन वेदिक हवालों से इन्कार करते या हमारे शोधपूर्ण जवाब ही को देखते । झट से लिख  मारा कि । 
"आपने जितने भी मन्त्र प्रस्तुत किए हैं उनमें से किसी एक में भी यह निर्देश नहीं कि तुम स्वयं अपना धर्म फैलाने के लिए दूसरों से लड़ो या उनको कत्ल करो वहां तो मदनी राजनीति के बारे में न्याय पर आधारित है रंग व कौम, धर्म व समुदाय भेद भाव के बिना समस्त मानव जाति के लिए समान विश्वव्यायी निर्देश हैं जिनका किसी विशेष कौम या धर्म से तनिक भर भी संबंध नहीं, हां यही_1 विषय कुरआन में मौजूद है जिस पर हमारी आपत्ति है और तुम्हारा चू चरा करना गलती है ।"
(आर्य मुसाफिर सितम्बर 1902 ई०)
मददगार साहब यदि न्याय के साथ हमारे शोध पूर्ण जवाब को देखते तो यह बातें मुंह पर न लाते कि कुरआन में धर्म फैलाने के लिए जिहाद हैं और वेद में देशों पर कब्जा करने व राजनीति के लिए । हम प्रतीक्षा में थे कि लाला साहब कुरआन से दावा का सबूत देंगे । मगर प्रतीक्षा ही प्रतीक्षा रही । मददगार साहब लीजिए ! हम और भी स्पष्ट शब्दों में बताते हैं कि कुरआन शरीफ ईमान लाने को किन शब्दों में ना पसन्द करता है । ध्यान से सुनिए . . . . . . । 
”क्या तू ऐ रसूल लोगों को मबूर करेगा कि वे मुसलमान हो जाएं।" 
(सूरह यूनुस – 100) 

(अर्थात ऐसा करना किसी तरह जायज़ नहीं) इसके अलावा यह भी गलत है कि वेद के मन्त्र धार्मिक लड़ाई के लिए नहीं बल्कि मदनी राजनीति के लिए हैं क्योंकि इन मन्त्रों में जिन लोगों को सम्बोध किया है अर्थात जिन लोगों की हुकूमत दुनिया पर स्थापित करने की इच्छा व्यक्त कि गयी है वे कौन लोग हैं या तो वे जो वेदिक धर्म के पाबन्द होंगे या कोई भी हो जो उस समय दुनिया में शासक थे चाहे मूर्ति पूजक हों या सलीब पूजने वाले, मुसलमान हों या यहुदी लेकिन ईश्वरीय और धार्मिक किताबों से यह मतलब कोसों दूर बल्कि असंभव है कि ऐसे आदेश उन्हीं लोगों के लिए होते हैं जो इस किताब के पाबन्द होते हैं । अतः इन मायनों को ध्यान में रखकर वेदिक मंत्रों को ध्यान से देखें कि कैसे वेदिक धर्म का साम्राज्य अन्य सारे देशों में करने के निर्देश है । 

भला यदि दो देशों जैसे पंजाब और बंगाल में वेदिक धर्म के अनुयायी रहते हैं और उनमें यदि किसी बात पर बिगाड़ हो जाए तो दोनों कौम इन मन्त्रों को पढ़ पढ़कर एक दूसरे पर आक्रमण करेंगी और मददगार साहब की व्याख्या प्रस्तुत करेंगी ? कि यह मन्त्र राज्य की राजनीति से संबंधित है । बंगाली कहेंगे कि पंजाबी हमारे विरुद्ध दंगा फ़साद भड़काने की कोशिश करते हैं और पंजाबी कहेंगे कि बंगाली ऐसा करते हैं जिस तरह हो सके हम उनको नष्ट किए बिना  न रहेंगे क्योंकि पवित्र वेद में ईश्वर ने हमारी हुकूमत को संसार में स्थापित किया है । 

कुछ सन्देह नहीं कि ऐसे अवसर के लिए न तो मददगार साहब और न स्वामी जी इन मन्त्रों का ताल्लुक बताएंगे । फिर बताइए ये मन्त्र धार्मिक लड़ाई से संबंधित न हुए तो किस से हुए ? हां एक बात में कुरआन शरीफ की वास्तव में गलती है कि उसने इसके विपरीत तमाम कौमों और हुकूमतों को दुनिया में शान्ति व सुख से रहने का एक निराला प्रस्ताव बताया है ।

सारी कौमों और हुकूमतों में यह दस्तूर है कि जब तक मुकाबले वाला पक्ष अपना सर न झुका दे अर्थात अधीन न हो जाए लड़ाई बन्द नहीं करते चाहे वे एक ही कौम व धर्म के ही क्यों न हों । अग्रेजों और बोइरो, जर्मनी व फ्रांस आदि की लड़ाइयां उदाहरण स्वरूप मौजूद हैं । इस्लाम और कुरआन ने यह प्रस्ताव तो स्वीकार किया कि . . . . . । 
"यदि काफिर समझौता (सुलह) चाहें तो तुम भी सुलह (संधि) पसन्द करो और अल्लाह पर भरोसा करो।" 
 (सूरह अन्फाल - 61)

इसके अलावा दूसरा रास्ता भी बताया जिसका हम इस अवसर पर उल्लेख करते हैं जिससे अधिकांश विरोधियों को भ्रम पैदा हुआ है वह यह कि यदि विरोधी मुसलमान हो जाएं तो जंग को समाप्त कर दिया जाए । ध्यान से सुनो ।
"यदि काफिर मुसलमान हो जाएं और इस्लामी आदेशों के पाबन्द हो जाएं तो उनका मार्ग छोड़ दो ।"
(सूरह तौबा)
यही आयत है जिससे वे समझे बूझे विरोधियों को सन्देह होता है । कि इस्लामी जंगें लोगों को जबरदस्ती मुसलमान बनाने के लिए थीं । मगर वास्तविकता ऐसी नहीं है । यह तो कुरआन शरीफ का महान उपकार और एक आधुनिक तरीका है सुलह सफाई का जो आज तक किसी सभ्य कौम को प्रदान नहीं हुआ कि मुकाबले वाले पक्ष का एक ही धर्म का हो जाने पर जंग समाप्त कर दी जाए । क्या 1900 ई० की अंग्रेजों और बोइरों की जंग को दुनिया भूल गयी है । कि जब तक अंग्रेजों ने देश को अपने अधीन नहीं कर लिया, नहीं  छोड़ा चाहे वे हजार बार मसीह और सलीब को सज्दा करते रहे ।

हां कुरआन पर यह आरोप इस सूरत में लग सकता था कि केवल यही एक तरीका सुलह सफाई का होता लेकिन जिस सूरत में इस तरीके के अलावा दूसरा तरीका भी मौजूद है कि मुकाबले वाले बेशक अपने धर्म बल्कि मूर्ति पूजा पर जमे रहें मगर सन्धि की प्रार्थना करें (यह भी शर्त नहीं कि वे इस्लामी खलीफा को बादशाह मानें) तो तुरन्त जंग बन्द कर दी जाएगी जिसका सबूत ऊपर आ चुका है । अब उस पक्ष को अख्तियार है कि वह जिस में अपना लाभ समझे अख्तियार करे लेकिन इस्लाम और इस्लामी खलीफा की ओर से उसपर जोर जबरदस्ती न होगी कि वे मुसलमान ही हों तो जंग समाप्त होगी , ऐसा नहीं है बल्कि प्रार्थना पत्र देकर वे स्वतंत्र रूप से जनता (जिम्मी) बनकर भी सुलह कर सकते हैं मगर शर व फ़साद से नहीं । जरा ध्यान से पढ़िए । 
   "लड़ो उन से जब तक फितना न खत्म हो जाए।"
( सूरह बकरा - 193 ) 
सारांश यह कि सभी कौमों में सुलह सफाई का एक ही तरीका है । मगर कुरआन मजीद में दो तरीके हैं और यही कुरआन की बड़ी श्रेष्ठता है । इसलिए कुरआन अपने बारे में यह कहता है । 

मुझ  में  एक  ऐब  बड़ा  है  कि  वफादार हूँ मैं
उनमें दो वस्फ़ हैं बदखूं भी हैं खुद काम भी है
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  1. तोप बन्दूक स्वामी जी के शब्द है हम इनके जिम्मेदार नहीं ।
  2. मराज गऊ माता क्या खाएगी ?
  3. इसमें यही के इशारे को हम नहीं समझे कि इशारा किधर को है ।

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