आपत्ति नम्बर 3
क़ुरआन सूरह फातिहा
खुदावन्द दिन न्याय का तेरी ही उपासना करते हैं हम और तुझी से मदद चाहते हैं हम, दिखा हमें सीधी राह दिखा।
(आयत : 4-5)
आपत्ति - 3
क्या ईश्वर सदैव न्याय नहीं करता । किसी विशेष दिन न्याय करता है तो अंधेर की बात है । उसी की उपासना करना और उसी से मदद चाहना यह तो ठीक है लेकिन क्या बुरी बात में मदद का चाहना ठीक है और सीधा रास्ता क्या केवल मुसलमानों ही का है ? या दूसरों का भी । सीधे रास्ते को मुसलमान कुबूल क्यों नहीं_1 करते ? क्या सीधा रास्ता बुराई की तरफ का तो नहीं चाहते ? यदि अच्छी बातें सब की सब समान हैं तो फिर मुसलमानों में कुछ विशेषता न रही और यदि दूसरों की अच्छी बातें नहीं मानते तो पक्षपाती हैं ।
आपत्ति का जवाब
ईश्वर सदैव न्याय करता है । कुरआन को पढ़ो तो मालूम हो_2 कुरआन का स्पष्ट इर्शाद है ।
"जो तुम्हें मुसीबत पहुंचती हैं तुम्हारे अपने कर्मों के कारण"
(शूरा - 30)
उसे न्याय का दिन इसलिए कहा कि उस दिन का न्याय सब लोग अपनी आंखों से स्वयं देखेंगे और कोई झूठा उसे झुठला न सकेगा ।
फ ब स रू कल यवमा हदीदुन_3
(सूरह काफ - 22)
इसे बड़े ध्यान से पढ़ो ।
बुरे कामों में ईश्वर से मदद मांगने का उल्लेख नहीं। यह तो आपकी समझ का फेर है बल्कि भले कामों में ईश्वर से मदद मांगी गयी है, अतएव इस जगह उपासना का सलीका भी मौजूद है, हां स्वामी जी वेद भगवान की तरह चाहते होंगे कि शारीरिक इच्छाओं के (वे भी ऐसी कि असंभव सी हों) पूरा होने की दुआ क्यों नहीं सिखायी ।
ऐ भगवान ! आपकी कृपा से हमारी समस्त मनोकामनाएं सच्ची या पूरी हों अर्थात हमारा संसार को वर्शभूत करने और मान व प्रताप हासिल होने की इच्छा पूरी हो प्रभावहीन न हो ।
और सुनिए . . . . . . ।
"ऐ विराट सर्व शक्तिमान ईश्वर, अपनी कृपा से मुझ तुच्छ प्राणी की मुक्ति की इच्छा पूरी करा मुझे सारे सुख या सारे संसार की हुकूमत प्रदान कर ।"
आपत्ति कर्ता जी ! यदि सारे संसार के लोग यही दुआ मांगे कि मुझे दुनिया की हुकूमत प्रदान कर तो सब की कुबूल हो गयी तो क्या होगा । क्या यह सोचा है ?
स्वामी जी ! निस्सन्देह इस्लाम ही सीधी और सही राह है । क्या वेदिक मत के सिवा दूसरा कोई धर्म सीधा नहीं जो सत्यार्थ प्रकाश समुल्लास 11 पेज नंबर 255 पर लिख आए हैं कि वेद का इन्कारी नास्तिक और अधर्मी है सच्चाई का रास्ता सदैव एक ही होता है । हम सब धर्मों की अच्छी बातें मानते हैं । किसी धर्म की अच्छी बातों से इन्कार नहीं । मगर आप को मालूम नहीं कि धर्म किस चीज का नाम है शेष मामूली आचरण तो हर धर्म में बराबर मिलते हैं । यदि अपने ही धर्म को सही समझना पक्षपात है तो आप अव्वल दर्जा पक्षपाती हैं जो लिखते हैं ।
"यदि कोई कहे कि तुम्हारा अकीदा क्या है तो यही जवाब देना चाहिए कि हमारा विश्वास वेद है अर्थात जो कुछ वेदों में बयान किया गया है हम उसको मानते हैं"
[ देश निकाले और जाति से बाहर करने का हुक्म भी स्वामी दयानंद जी दे कर गए हैं-
जो वेद और वेदानुकूल आप्त पुरुषों के किये शास्त्रें का अपमान करता है उस वेदनिन्दक नास्तिक को जाति, पङ् क्ति और देश से बाह्य कर देना चाहिये।
यही बात आगे भी है
जो कोई मनुष्य वेद और वेदानुकूल आप्तग्रन्थों का अपमान करे उस को श्रेष्ठ लोग जातिबाह्य कर दें। क्योंकि जो वेद की निन्दा करता है वही नास्तिक कहाता है।
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- महाराज बड़े ही पापी हैं ।
- जो कुछ तुम को मुसीबत पहुंचती है तुम्हारी करतूतों ही के कारण ।
- अपराधियों की ज्योति (आंख की रोशनी) उस समय तेज होगी ।
- यह मुंह और मसूर की दाल ।
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