आपत्ति नंबर 4
क़ुरआन सूरह फातिहा
आयत : 6-7
राह उन लोगों की कि नेमत की है तूने ऊपर उनके सिवा उनके जो क्रोध किया गया है ऊपर उनके और न पथ भ्रष्टों के रास्ते हम को दिखा ।
आयत : 6-7
आपत्ति - 4
जब मुसलमान लोग आवागमन और पहले किए हुए गुनाह और सवाब को नहीं मानते तो कुछ लोगों पर दयालुता करने और कुछ पर न करने से ईश्वर पक्षपाती ठहरता है क्योंकि गुनाह व सवाब के बिना दुख व कष्ट का देना केवल अन्याय की बात है और अकारण किसी पर दया और किसी पर प्रकोप की नजर करना भी उसकी प्रकृति से सुदूर है । अकारण वह दया या प्रकोप नहीं कर सकता और जब उनके पूर्व संक्षिप्त गुनाह व सवाब ही नहीं तो किसी पर दया और किसी पर प्रकोप करना यह बात ही नहीं बन सकती और इस सूरह की शरह (धर्म शास्त्र) में ये शब्द - यह सूरह ईश्वर ने मनुष्यों के मुंह से कहलवाई कि हमेशा इस तरह से कहा करें । अंकित हैं । यदि यह बात सही है तो वह ''अ ब" अक्षर भी अल्लाह ही ने पढ़ाए होंगे । यदि कहो कि बिना अक्षर जाने इस सूरह को कैसे पढ़ सकते तो सवाल यह है कि क्या हलक ही से बुलाए और बोलते गए । यदि यह बात सही है तो सारा कुरआन ही ज़बानी पढ़ाया होगा । यह समझना चाहिए कि जिस किताब में पक्षपात की बातें पायी जाएं वह किताब ईश्वर की बनाई हुई नहीं हो सकती जैसे अरबी भाषा में उतारने से अरब वालों को इसका पढ़ना आसान और दूसरी भाषा बोलने वालों को मुश्किल हो जाता है इससे ईश्वर पक्षपाती ठहरता है और जिस तरह की ईश्वर ने सारे दुनिया में रहने वाले लोगों पर न्याय की नजर से सारे देशों की भाषाओं से निराली भाषा संस्कृत में जो कि सारे देशों के लिए समान मेहनत से हासिल होती है वेदों को उतारा है ऐसी ही भाषा में यदि कुरआन उतरता तो यह आपत्ति या खराबी पैदा न होती ।
आपत्ति का जवाब
क्या ही नयी लौजिक है आपत्ति कर्ता जी ! क्या पहले कर्मों की वजह ही से दया और इनाम हो सकता है । इस जन्म के कर्मों का कोई मूल्य नहीं ? सुनिए और ध्यान से सुनिए ! इस जन्म के सदकर्म । उनके लिए इनाम का कारण बने थे । दूसरी आयत इस बात की व्याख्या करती है जहां अल्लाह ने उन इनाम पाने वालों को ईश्वर को स्वयं बताकर आपके बेकार के सवाल को हल कर दिया है । जरा सोच विचार करके पढिए ।
"जिन पर अल्लाह ने इनाम किया वे नबी और बड़े सच्चे और नेक लोग हैं ।"
( सूरह निसा - 69 )
हां यह भली सूझी कि अल्लाह ने अक्षर पढ़ाए होंगे । आपत्ति कर्ता जी के भोले भाले बच्चों के से सवाल सुनकर आप से आप हंसी आती है फिर जब ऐसे व्यक्ति को एक कौम का लीडर सुनते हैं तो तुरन्त जबान से निकलता है ।
बुत भी खुदाई करते हैं कुदरत खुदा की है।
स्वामी जी ! जिस तरह वेद आपके ऋषियों को बताए गए थे उसी तरह कुरआन भी मुसलमानों को सिखाया गया है । तनिक उपरोक्त मंत्र पर ध्यान दीजिए ।
निसंदेह जिस किताब में पक्षपात की बातें हो रही हों वह खुदा की नहीं होती । मगर यह तो बताइए कि शुद्र के घर का पका हुआ खाने से जो आप मना कराते हैं चाहे कैसा ही भला मानस क्यों ने हो ।
[प्रश्न - द्विज अपने हाथ से रसोई बना खावें , वा शूद्र के हाथ की बनाई खावें ?
उत्तर - शूद्र के हाथ से रसोई खावें क्योंकि ब्राह्मण, क्षत्रिय , वैश्यवर्णस्थ स्त्रीपुरुष विद्या पढ़ाने, राज्यपालने और पशुपालन, खेती और व्यापार के काम में तत्पर हैं और शूद्र के पात्र तथा उसके घर का पका हुआ अत्र आपत्काल के विना न खावें ।
यह किस किताब का हुक्म है ? और यह आप की तरफदारी तो नहीं ?
आपत्ति कर्ता जी ! अरबी भाषा में कुरआन के उतरने का कारण तो कुरआन ने स्वयं ही बता दिया है । सुनो ईश्वर कहता है ।
“यदि हम कुरआन को अरबी ( भाषा ) के सिवा किसी और भाषा में उतारते तो अरबी लोग कहते कि इसके आदेशों को स्पष्ट क्यों नहीं किया। कलाम गैर अरबी और सम्बोधित अरबी ।"
(हामीम सदा - 44 )
चूंकि कुरआन के प्रथम मुखातिब उसके अरब के लोग थे इसलिए इस भाषा में उतारा गया । उन्होंने इसे समझ कर दूसरे लोगों को समझा दिया यही एक मात्र न्याय है अन्तर केवल आपकी समझ का है ।
अधिक जानकारी के लिए यह पोस्ट पढ़ें।
क्या पवित्र क़ुरआन मात्र अरब वासियों के लिए अवतरित हुआ था ? या फिर सारी मानवता के लिए?_______________________________________________
स्वामी जी का कहना है कि क़ुरआन को भी किसी ऐसी भाषा मे आना चाहिए था जैसे संस्कृत आयी थी। अब संस्कृत कैसे आयी थी? यह भी स्वामी जी ने ही बता दिया है। इसी आपत्ति में लिखा है कि
"जैसे परमेश्वर ने सृष्टिस्थ सब देशस्थ मनुष्यों पर न्यायदृष्टि से सब देशभाषाओं से विलक्षण संस्कृत भाषा कि जो सब देशवालों के लिये एक से परिश्रम से विदित होती है उसी में वेदों का प्रकाश किया है, यह करता तो कुछ भी दोष नहीं होता"
सत्यार्थ प्रकाश में दूसरे स्थान पर किसी ने प्रश्न किया उसी के उत्तर में स्वामी जी ने जो उत्तर दिया वह भी इसी तरह का है।
(प्रश्न) किसी देश -भाषा में वेदों का प्रकाश न करके संस्कृत में क्यों किया?
(उत्तर) जो किसी देश-भाषा में प्रकाश करता तो ईश्वर पक्षपाती हो जाता। क्योंकि जिस देश की भाषा में प्रकाश करता उन को सुगमता और विदेशियों को कठिनता वेदों के पढ़ने पढ़ाने की होती। इसलिये संस्कृत ही में प्रकाश किया; जो किसी देश की भाषा नहीं और वेदभाषा अन्य सब भाषाओं का कारण है। उसी में वेदों का प्रकाश किया। जैसे ईश्वर की पृथिवी आदि सृष्टि सब देश और देशवालों के लिये एक सी और सब शिल्पविद्या का कारण है। वैसे परमेश्वर की विद्या की भाषा भी एक सी होनी चाहिये कि सब देशवालों को पढ़ने पढ़ाने में तुल्य परिश्रम होने से ईश्वर पक्षपाती नहीं होता। और सब भाषाओं का कारण भी है।
स्वामी जी कहना ये चाह रहे हैं कि जिस तरह संस्कृत किसी भी देश की भाषा नही थी उसी तरह क़ुरआन भी ऐसी ही भाषा मे आता जो किसी देश की भाषा नही होती।
और स्पष्ट करते हैं, जब वेदों को प्रकाशित किया गया तो एक से अधिक देश थे (ऐसा स्वामी जी की बात से ही प्रतीत होता है) और उनकी अलग भाषा थी तो जब वेद प्रकाशित हुए तो वेद ऐसी भाषा मे आये जो किसी देश की भाषा नही थी अर्थात "संस्कृत" में ।
अब जब संस्कृत किसी देश की भाषा नही तो इसमें किसी देश वाले के साथ यह पक्षपात नही हुआ कि उसके देश की भाषा मे तो वेद आये और दूसरे की भाषा मे नही आये तो किसी और को तो वेद पढने में सुगमता हो और दूसरे को पढ़ने में कठिनाई हो।
इसलिए ईश्वर ने वेदों को ऐसी भाषा मे भेजा जो किसी देश की भाषा नही थी अर्थात कोई नही जानता था कि संस्कृत भाषा क्या है?
जब कोई इस भाषा को जानता ही नही था तो फिर वेद कैसे समझे होंगे?
वेद तो छोड़िए संस्कृत सीखी कैसे होगी?
और किसने सीखी होगी? और किससे सीखी होगी?
संस्कृत जब किसी भी देश की भाषा नही थी तो फिर क्या यह सभी देश वालों के साथ पक्षपात नही हुआ? क्या वैदिक ईश्वर को बस संस्कृत ही आती है? और किसी देश की भाषा नही आती?
इन प्रश्नों का उत्तर कोई समाजी दे तो बड़ी कृपा हो जाये।
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