Wednesday, 20 May 2020

आपत्ति नंबर 5
क़ुरआन सूरह बकरा 
आयत : 2-7

यह किताब जिसमें शक नहीं परहेजगारी (संयम) की राह दिखाती है जो कि ईमान लाते हैं साथ परोक्ष के और स्थापित करते हैं नमाज को और उस चीज़ को जो कि हमने दी खर्च करते हैं । वे लोग जो इस किताब पर ईमान लाते हैं जो रखते हैं । तेरी ओर या तुझसे पहले उतारी गयी और विश्वास कियामत पर रखते_1 हैं । ये लोग अपने पालन हार के निर्देश पर हैं और यही हैं छुटकारा पाने वाले । निस्संदेह जो लोग काफिर हुए और उनको तेरा डराना न डराना बराबर है । वही ईमान न लाएंगे । मुहर की अल्लाह ने ऊपर दिलों के उनके और ऊपर कानों उनके और उनकी आंखों पर पर्दा है और उनके वास्ते बड़ी यातना है ।

(आयत : 2-7)

आपत्ति - 5

क्या अपने ही मुंह से अपनी किताब की प्रशंसा करना ईश्वर के धब्बे की बात नहीं । जो परहेज़गार संयमी लोग हैं वे तो स्वयं सीधी राह पर हैं और जो झूठी राह पर हैं उनको यह कुरआन राह ही नहीं दिखा सकता तो फिर किस काम का रहा ? क्या पाप और पुन और मेहनत के बिना ईश्वर अपने ही खजाने से खर्च करने देता है ? यदि देता है तो सब को क्यों नहीं देता है ? और मुसलमान लोग मेहनत क्यों करते हैं ? यदि बाइबिल, इन्जील आदि पर विश्वास रखना अनिवार्य है तो मुसलमान इन्जील आदि पर ईमान कुरआन की तरह क्यों नहीं लाते ? और यदि लाते हैं तो फिर कुरआन उतरना किस लिए ? यदि कहें कि कुरआन में अधिक बातें हैं तो क्या पहली किताब में अल्लाह लिखना भूल गया था और यदि नहीं भूला था तो कुरआन का बनाना बेकार है । हम देखते हैं कि बाइबिल और कुरआन की कुछ बातें आपस में नहीं मिलतीं और बहुत सी मिलती हैं । एक ही सम्पूर्ण किताब जैसी कि वेद है क्यों न उतारी ? क्या कियामत ही पर विश्वास रखना चाहिए और किसी चीज़ पर नहीं, क्या ईसाई और मुसलमान ही अल्लाह के निर्देशों पर चलने वाले हैं और इनमें कोई गुनहगार नहीं है ? क्या वे ईसाई और मुसलमान जो दीनदार नहीं वे मुक्ति प्राप्त कर पाएंगे और दूसरे जो दीनदार हैं वे नहीं ? क्या यह बड़ी भारी ना इन्साफी और अंधेर की बात नहीं है ? क्या जो लोग मुसलमानी धर्म को नहीं मानते उनको काफिर कहना एक तरफा डिग्री नहीं है ? यदि ईश्वर ही ने उनके दिल में और कानों में डाट लगाई और इसी कारण वे गुनाह करते हैं तो उनका कुछ भी दोष नहीं है यह दोष ईश्वर ही का है । ऐसी हालत में उनको सुख या दुख या गुनाह व सवाब नहीं हो सकता । फिर ईश्वर उनको बदला व दंड क्यों देता है ? क्योंकि उन्होंने गुनाह या सवाब अपने अधिकार से नही किया ।

आपत्ति का जवाब

अफसोस ! इस भोले पन पर जो हर घड़ी अपमान का कारण बने । स्वामी जी को इतना भी मालूम नहीं कि वेद स्वयं अपनी प्रशंसा इससे कई दर्जा बढ़कर करते हैं । सुनो 
"पवित्र करने वाले कर्मों को खोलने वाला जिसमें प्रशंसा योग्य ज्ञान का गुण है ऐसे उच्च ज्ञानों को देने वाला जो वेद का कलाम है वह समस्त कलाओं के स्वरूप से हम को सूचित करता है ।"
 (वृग वेद अंकित आर्ग मुसाफ़िर पृष्ठ 18 सितम्बर 1899 ई0)
और सुनिए ।
     
"गलती से मुक्त सम्पूर्ण ज्ञानों का स्त्रोत जो वेद शास्त्र है अपार शक्ति से परमेश्वर ने जाहिर किया ।"
(महा यज्ञ दोही पृ0 11 लेखक स्वामी जी) 

स्वामी जी मुत्तकियों (डरने वालों) के लिए पथ प्रदर्शन होने का वह मतलब है जिस मतलब से आप सत्यार्थ प्रकाश अध्याय 10 में लिखते हैं कि जिद्दी और अन्यायी को जवाब न देना चाहिए ।
"कभी विना पूछे वा अन्याय से पूछने वाले को कि जो कपट से पूछता हो उस को उत्तर न देवे। उन के सामने बुद्धिमान् जड़ के समान रहें।" 7

सुनिए, कुरआन स्वयं अपनी टीका करता है । ईश्वर कहता है 
"हम (खुदा) कुरआन को सब लोगों की बीमारियों के लिए शिफ़ा और ईमानदारों के लिए दयालुता बनाकर उतारते हैं और जालिमों (इन्कारियों) को हानि उठाने के कोई फायदा नहीं देता ।"  
(सूरह इसरा - 82 )
स्वामी जी ! यदि कोई रोगी हकीम के नुसखे और बताए हुए परहेज़ पर अमल न करे तो दोष किसका है ? सब को वह अपने खजाने से मात्र अपनी मेहरबानी से देता है । बन्दों का उस पर कोई हक नहीं । वह हकीम भी है जितना उचित समझता है देता है । सुनो
“क्या इन्कारी नहीं सोचते कि ईश्वर जिसे चाहता है आजीविका को बढ़ा देता है और जिसको चाहता है तंग कर देता है निः सन्देह इसमें बहुत सी कुदरत की निशानियां हैं ।”
 (सूरह रूम - 37)

कुरआन को यदि आपने किसी पाठशाला (मदरसा) में पढ़ा होता तो बाइबिल का सवाल न करते । सुनिए  

कुरआन मानता है कि पहले ईश्वरीय किताबें आयी हैं मगर इसी के साथ यह भी कहता है कि टेढ़ करने वालों ने इसमें टेढ़ मिला दी जो बात कुरआन सही बता दे उसे सही समझो और जो गलत कहे उसे गलत जानो । अल्लाह फरमाता है ।

"हम (ईश्वर) ने तेरी तरफ (ऐ नबी) कुरआन उतारा है जो अपने से पहली किताबों की पुष्टि करता है और उनपर रक्षक भी है। अर्थात गलत को सही से अलग करता है ।"
(सुरह मायदा 5:48)

कियामत पर ईमान का जिक्र इसलिए किया है कि जिसे आगे की सजा व इनाम का विश्वास होता है वही सद कर्म करता है और व्यभिचार से बचता है । जो निडर हो उसे क्या गरज पड़ी है कि अपने सर बला दे । ईसाई पथ प्रदर्शन पर नहीं हैं । बल्कि केवल मुसलमान वह भी भला मुसलमान जिनका इस आयत में बयान है । वही हिदायत पर है । क्या जो वेद को नहीं मानते उनको नास्तिक और अधर्मी कहना न्याय है ?
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1 - प्रिय पाठको आपत्ति कर्ता जी का अनुवाद गौर से पढ़िए जो टिटीरा और डेरा बसती की तरह हैं ।






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