Wednesday, 20 May 2020

आपत्ति नंबर 6
क़ुरआन सूरह बक़रह 
आयत : 10

उनके दिलों में बीमारी है। अल्लाह ने उन की बीमारी बढ़ा दी।_1
(आयत : 10) 

आपत्ति - 6

भला बिना गलती अल्लाह ने उनकी बीमारी बढ़ा दी । दया न आयी, उन बीमारों को कितनी बड़ी तकलीफ हुई होगी । क्या यह शैतान से बढ़कर शैतानियत का काम नहीं है किसी के दिल पर ठप्पा लगाना किसी की बीमारी को बढ़ाना खुदा का काम नहीं हो सकता । क्योंकि बीमारी का बढ़ना अपने गुनाहों का नतीजा हैं । 

आपत्ति का जवाब 

अल्लाह किसी के दिल पर अकारण ठप्पा नहीं लगाता । सुनिए इस कलाम के वही मायना है जो आपने सत्यार्थ प्रकाश में वेदों की बेदीनी और गुमराहों के बारे में लिख चुके हैं ।
"उन्होंने किस दर्जा अपनी जिहालत की तरक्की की है जिसका उदाहरण इसके सिवा दूसरा नहीं हो सकता । विश्वास तो यही है । कि वेद और ईश्वर से विरोध करने का उनको यही नतीजा मिला ।। 
             
(सत्यार्थ प्रकाश समुल्लास 12 पेज नंबर 333)

[और जो मांस खाना है यह भी उन्हीं वाममार्गी टीकाकारों की लीला है । इसलिये उन को राक्षस कहना उचित है परन्तु वेद में कहीं मांस का खाना नहीं लिखा । इसलिये मिथ्या बातों का पाप उन टीकाकारों को और जिन्होंने वेदों के जाने सुने विना मनमानी निन्दा की है ; निःसन्देह उन को लगेगा । सच तो यह है कि जिन्होंने वेदों का विरोध किया और करते हैं । और करेंगे वे अवश्य अविद्यारूपी अन्धकार में पड़ के सुर के बदले दारुण दुःख जितना पावें उतना ही न्यून है । इसलिये मनुष्यमात्र को वेदानुकूल चलना समुचित है ।११ 
(सत्यार्थ प्रकाश समुल्लास 12 पेज नंबर 330)
 
ऐसी ही इनकी लीला वेद , ईश्वर को न मानने से हुई । अब भी सुख चाहैं तो वेद ईश्वर का आश्रय लेकर अपना जन्म सफल करें।
(सत्यार्थ प्रकाश समुल्लास 12 पेज नंबर 334)]

और जिस को यजुरवेद अध्याय 25 मन्त्र 13 में यूं बयान किया
"जो परमेश्वर ज्ञान आदि प्रदान करने वाला और जिसकी छत्र छाया से व कृपा से वंचित होना ही मौत अर्थात निरंतर जीने मरने के चक्कर में पड़ना है ।" 

कुरआन ने तो अपनी टीका दूसरी आयत में स्वयं कर दी है । सुनिए 
"अल्लाह घमंड करने वालों की गर्दन कशों के दिलों पर मुहुर लगा देता है ।"  
(कुरआन)
बल्कि इसी आयत में एक शब्द ऐसा भी है जिसको आप ध्यान से देखते तो यद्यपि आपको आपत्ति करने का शौक है फिर भी यह शौक किसी और जगह पूरा करते । सुनिए . . . . . ।
इन्नल्लजी न क फ रू सवाउन अलैहिम अ अन्जर तहुम अम लम तुन्जिर हुम0  
[जिन लोगों ने इनकार किया उनके लिए बराबर है डराओ या न डराओ, वह मानने वाले नहीं हैं। ]  
(सूरह बकरा - 6 )

इसी का अनुवाद आपने नकल किया है । इसमें सवा उन अलैहिम सिला से बदल है यदि ज्ञान है । तो समझो या किसी अरबी पाठशाला में पढ़ो अतः आयत का अर्थ बिल्कुल स्पष्ट है कि अल्लाह के हुकमों से गर्दन कशी करने का नतीजा यह होता है बाकी जवाब वाक्य 5 में आ गया । स्वामी जी को अधिक नम्बर लेने का शौक है इसी जवाब में शैतानी बातों का जवाब भी मिलेगा ।
आपत्ति कर्ता जी ! ऋग्वेद अशटक  अध्याय 3 वरग 18 मंत्र 2 को ध्यान से देखिए जो इसके अर्थ हैं वही इस आयत के हैं यदि आप को या आपके चेलों को देखने का अवसर न मिले तो सुनिए हम बतलाए देते हैं ध्यान से सुनिए । परमेश्वर कहता है । मैं बदकार, जालिमों को कभी आशीर्वाद (भली दुआ) नहीं देता।(अर्थात उनको पथ प्रदर्शन । या अनुकम्पा नहीं करता )


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  1. पूरी आयत का अनुवाद
"उनके दिलों में (निफ़ाक़) की बीमारी है तो अल्लाह ने उनकी बीमारी को बढ़ा दिया और उनके लिए दर्दनाक अज़ाब है, इस वजह से कि वे झूठ कहते थे।" 

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