आपत्ति

Thursday, 14 May 2020

हक प्रकाश पर एक समीक्षा

शैखुल इस्लाम सनाउल्लाह अमृतसरी निस्सन्देह एक हक परस्त विद्वान थे। अल्लाह ने आपको वह सोच एवं ज्ञान प्रदान किया था कि वे एक ही समय में समस्त इस्लाम दुश्मन संगठनों से मुकाबला करते रहे। कादियानियत, ईसाइयत, आर्यसमाजी, सनातन धर्मी, बहाई अर्थात वे सारे तत्व जो इस्लाम को चुनौती देने का साहस करते थे। शैखुल इस्लाम ने सब का सतर्क जवाब दिया। दोस्तों ने ही नहीं स्वयं दुश्मनों ने भी इस बात को स्वीकारा। इस मैदान में कोई उनका मुकाबला नहीं हो सकता। आज भी देखिए तो हैरत होती है कि एक व्यक्ति बिल्कुल अकेले किस तरह ऐसा चौमुखी हमला कर सकता था । उनका समाचार पत्र ''अहले हदीस” अपने समय का महत्वपूर्ण पर्चा था और गैर मुस्लिमों में भी वह उतना ही लोक प्रिय था जितना मुसलमानों में। 

स्वामी दयानन्द सरस्वती ने हिन्दू धर्म में सुधार का बीड़ा उठाया। वे हिन्दू धर्म में मूर्ति पूजा को नहीं मानते थे न अवतार वाद में विश्वास रखते थे इस प्रकार उन्होंने हिन्दू धर्म को उसके मूल की ओर लौटाने का प्रयत्न किया ताकि वह करोड़ों देवी देवताओं के अकीदे से निकल कर एकेश्वरवाद की ओर आए जो सारे धर्मों की असल बुनियाद है। स्वामी जी ने एक पुस्तक सत्यार्थ प्रकाश लिखी जो आर्य समाज की बाइबिल बन गयी। उन्होंने इस किताब में हिन्दू धर्म के उसूल, रीति रिवाज और अकीदों पर बहस की और हिन्दू समाज में फैले हुए गलत अकीदों का सुधार करने का यत्न किया। साफ़ सी बात है कि इससे किसी को मतभेद नहीं हो सकता था बल्कि यह एक बड़ी अच्छी कोशिश थी लेकिन इसी किताब में उन्होंने अन्य धर्मों पर भी आपत्ति व्यक्त की और उनको बुरा और गलत बताने की कोशिश की। 

सत्यार्थ प्रकाश के चौदहवें अध्याय में उन्होंने इस्लाम पर तीर चलाए और कुरआनी शिक्षा को निशाना बनाया। चूंकि स्वामी जी अरबी जानते नहीं थे इस लिए व्याकरण संबंधी नियम एवं इन भाषाओं, मुहावरों और भाषा से अनभिज्ञता के कारण शब्दों का सही अर्थ व भाव समझने से विवश रहे इसके बावजूद उन्होंने इस्लाम पर आपत्तियां व्यक्त की और उनको अपनी पुस्तक में शामिल किया। इस प्रकार अपनी कौम को उन्होंने अपने ज्ञान एवं जानकारी से प्रभावित करने की कोशिश की लेकिन मुसलमानों को उनकी इस कार्रवाई से तकलीफ पहुंची। विरोध एवं रोष भी व्यक्त किया। पहले यह पुस्तक देवनागरी लिपि में प्रकाशित हुई थी इसलिए गैर हिन्दी हलकों में यह परिचित नहीं हो पायी, हा शैखुल इस्लाम जैसे विद्वान ने जो उस दौर में भी देवनागरी से भली प्रकार परिचित थे इसका नोटिस लिया और इसका जवाब लिखने का इरादा किया। इसी बीच स्वामी जी ने सत्यार्थ प्रकाश का उर्दू अनुवाद भी प्रकाशित कर दिया और किताब सारे हलकों में पहुंच गयी और फिर हर ओर से इस पर आपत्तियां होने लगीं।

शैखुल इस्लाम साहब अल्लामा अमृतसरी "हक प्रकाश" की भूमिका में लिखते है : - जब तक किताब देवनागरी में थी इसकी आम शोहरत न थी हमने देवनागरी में भी इसका अध्ययन किया था उसी समय से हमारा विचार था कि जितना कुरआन से इसका हिस्सा संबंधित है उसका जवाब उर्दू में दिया जाए। उस समय इसका जवाब देने में यह परेशानी थी कि देवनागरी से उर्दू में अनुवाद भी हमें ही करना पड़ता। अल्लाह की शान कि यह काम चूंकि उसे हम से ही कराना मन्जूर था अतः इसका सबब भी अल्लाह ने आर्यो ही को बनाया कि उन्होंने इस किताब का अनुवाद देश की लोकप्रिय और जन सामान्य भाषा उर्दू में करके हजारों प्रतियां प्रकाशित कर डालीं। इस बात को कहना कोई जरूरी नहीं कि स्वामी के सवालात आम तौर पर गलत फहमियों पर टिके हुए हैं इसलिए कि सत्य को स्वीकार करने से बहुधा गलत फहमी ही रोक बनती है । ( पृष्ट 4-5 )
 
शैखुल इस्लाम अमृतसरी ने किताब में मुहक्किक और मुदकिकक के शीर्षक लगा कर स्वामी जी की आपत्तियों को प्रस्तुत। करके उनका सतर्क जवाब दिया है और साबित किया है कि स्वामी जी की आपत्तियां अरबी भाषा के उसूल व नियम से उनकी अनभिज्ञता और गलत फहमी की वजह से सामने आयी हैं इसी के साथ शैखुल इस्लाम ने हिन्दुओं की किताब से हवाले नकल करके अपनी बात स्पष्ट कर दी है, इससे शैखुल इस्लाम की दूरदर्शिता और सूझ बूझ और अन्य धर्मों की धार्मिक पुस्तकों से उनकी गहरी जानकारी का अन्दाजा होता है। 

हक प्रकाश के प्रकाशन से मुसलमानों में वह बेचैनी और परेशानी दूर हो गयी जो स्वामी के निराधार और बेतुकी आपत्तियों के कारण पैदा हो गयी थी क्योंकि यह बात स्पष्ट हो गयी कि स्वामी जी की आपत्तियां उनकी अज्ञानता और जानकारी न होने का नतीजा हैं। आर्यों की ओर से शैखुल इस्लाम की किताब के अनेक जवाब लिखे गये जैसा कि भूमिका से स्पष्ट है। दयानन्द तमर भास्कर, सत्यार्थ भास्कर, दयानन्द सभा व प्रकाश आदि। 

लेकिन असल बात यह है कि वे शैखुल इस्लाम की आपत्तियों का सतर्क जवाब नहीं दे सके यह इसलिए कि शैखुल इस्लाम की पहुंच उनकी धार्मिक पुस्तकों तक थी वे संस्कृत और देव नागरी भाषाएं भली प्रकार जानते थे और चूंकि सारे धर्मों के धार्मिक ग्रंथों पर गहरी नजर थी इसलिए ऐसे-ऐसे नुक्ते प्रस्तुत करते थे कि उनका जवाब आसान नहीं होता था। इस प्रकार शैखुल इस्लाम अमृतसरी ने इस्लाम के बचाव में बह मूल्य साहित्य उपलब्ध किया और उस दौर में जो मुनाजिरों का दौर था इस साहित्य का बड़ा महत्व था। आज के बदले हुए हालात में जबकि बहु संख्यक के राजनीतिक प्रभाव व सत्ता के कारण दूसरे धर्मों के लोग (अल्प संख्यक) बचाव करने की स्थिति में आ गए हैं। इस लिट्रेचर के महत्व व कुद्र और अधिक बढ़ गयी है ताकि मुस्लिम समुदाय की नयी नस्ल जो तेजी से प्रभावित हो जाने का शिकार रही है हकीकत से अवगत हो सके और किसी प्रकार के प्रभाव में आने के वातावरण से बाहर आए।

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