Thursday, 14 May 2020

कुछ पुस्तक के बारे में



1 - हक प्रकाश बाजवाब सत्यार्थ प्रकाश, एकेडमी की ओर से प्रस्तुत की जाने वाली आठवीं पुस्तक है। हक प्रकाश मौलाना मरहूम की एक शाहकार किताब कहलायी जाने की हकदार है और यूं भी उनकी किताबों में इस को एक प्रमुख और महत्वपूर्ण दर्जा हासिल है। चूंकि मौलाना मरहूम को अल्लाह ने इस्लाम के विरोधियों से ज्ञानात्मक और लेखों व वक्तव्यों की सतह पर मुकाबला करने और तब्लीग के लिए भेजा था इसलिए मुनाज़रा से असाधारण दिलचस्पी एक स्वभाविक बात थी, यह किताब हक प्रकाश जो कि स्वामी दयानन्द सरस्वती संस्थापक आर्य समाज की किताब सत्यार्थ प्रकाश के अध्याय 14 का मुसलमानों की ओर से सतर्क जवाब है। किताब के अध्ययन से आर्य समाज और हिन्दू धर्म से संबंधित पर्याप्त जानकारी हासिल की जा सकती हैं । 

2 - कुछ लोगों को आज के दौर में इस प्रकार के विषय संबंधी चीजें पसन्द नहीं हैं बल्कि इस्लाम का मात्र परिचय या सकारात्मक अन्दाज के लिट्रेचर के प्रकाशन के पक्ष में हैं यद्यपि गहरी नजर से देखा जाए तो दोनों प्रकार के लिट्रेचर की सदैव जरूरत रही है और रहेगी। इसका अनुमान उन लोगों को हो सकता है जो गैर मुस्लिमों में इस्लाम के प्रचार का काम करते हैं। इसमें सन्देह नहीं कि आज मुनाजरों का दौर नहीं है लेकिन इस्लाम के प्रचार के बारे में हक प्रकाश, मुकद्दस रसूल, ईसाइयों को जवाब, तर्के इस्लाम, तकाबुल सलासा, इस्लाम और मसीहियत और तफसीर सनाई जैसी किताबों से गैर मुस्लिमों के भ्रम एवं सन्देहों को दूर करने के लिए बहुत सा मैटर उपलब्ध हो जाता है कि आज के दौर की लिखी हुई सैकड़ों किताबों में ऐसा मैटर नहीं मिल सकेगा, सनाई लिट्रेचर का अध्ययन गैर मुस्लिमों में तब्लीग करने वाले लोगों के लिए अत्यन्त जरूरी है। 

3 - और वैसे भी आज जबकि सरकारी मदरसों में शिक्षा प्रणाली सैक्यूलर है लेकिन फिर भी पाठयक्रम में बहुसंख्यक समुदाय की सभ्यता एवं संस्कृति, विचारों एवं दृष्टिकोणों की गहरी छाप है जबकि हमारी नयी नस्ल इस्लाम धर्म और इस्लामी सभ्यता एवं संस्कृति से अनभिज्ञ है और इस अनभिज्ञता ने उनको हीन भावना का शिकार बना दिया है अत एवं इस्लाम के विरोधियों को इस कमजोरी के कारण बेजा लाभ उठाने का सुनहरा अवसर जुटा दिया है। 

       शुद्धि संगठन किसी न किसी रूप में आज भी जीवित है। इस्लाम के खिलाफ लिट्रेचर विशेष रूप से आर्य समाज की ओर से खुल्लम खुल्ला प्रकाशित हो रहा है यहां तक कि आजादी से पूर्व की प्रतिबन्धित पुस्तकें, जाली नामों और पतों के साथ प्रकाशित की जा रही हैं इसका जीवन्त उदाहरण बदनाम जमाना किताब "रंगीला रसूल" है जो हिन्दी भाषा में प्रकाशित करके चोरी छुपे बेची जा रही है और सरकार की सी आई डी या खुफिया विभाग इस पर ध्यान नहीं दे रहा है।

    जहां तक सत्यार्थ प्रकाश का संबंध है इसका चौदहवां अध्याय मुसलमानों के लिए सबसे अत्यधिक दिल को चोट पहुंचाने वाला है। इसका अनुमान हक़ प्रकाश में दिए गए मैटर से लगाया जा सकता है। इतने अपमान, तिरस्कार और तुच्छ वाक्य और घटिया शैली दुनिया की किसी किताब की नहीं हो सकती जो कि सत्यार्थ प्रकाश की है। आजादी से पूर्व सिन्ध में इस पर पूरी तरह पाबन्दी लग चुकी थी और उसी दौर में पंजाब में इस प्रकार का आन्दोलन चल रहा था।

     आश्चर्य की बात है कि हिन्दुस्तान के मुस्लिम रहनुमा और इस्लाम का दर्द रखने वाली संस्थाएं और स्वयं सरकार का जिम्मेदार स्टाफ़ आज तक क्यों खामोश हैं ? यह उल्लेखनीय और विचारणीय बात है कि इस किताब में न केवल मुसलमानों के विरुद्ध मैटर है बल्कि सिखों और दूसरे हिन्दू समुदायों के अलावा इस किताब के खंडन भाग में ईसाई धर्म का खंडन और अपमानजनक बातों पर आधारित तेरहवां अध्याय भी है क्या ही अच्छा होता कि अल्प संख्यक आयोग इस समस्या पर भी ध्यान दे क्योंकि सत्यार्थ प्रकाश में अल्प संख्यकों के धर्मों के विरुद्ध अध्यायों का अलग-अलग पुस्तिकाओं के रूप में भी विभिन्न भाषाओं में छाप कर गांव देहात और शहरों में बांटा जा रहा है । 
       यह भी एक अटल हकीकत है कि देश वासियों को इसी वजह से इस्लाम के बारे में भ्रम पैदा हो रहा है और इस प्रकार का विषैला लिट्रेचर देश की प्रगति एवं निर्माण व उसकी अन्तर्राष्ट्रीय प्रतिष्ठा को ठेस पहुंचाने का एक स्थाई जरिया बना हुआ है। हिन्दू मुस्लिम एकता के आवाहक महात्मा गांधी ने अपने समाचार पत्र "यंग इन्डिया" में इस पुस्तक को "निराशा" जनक किताब कहा और इसके लेखों पर अपनी "नापसन्दीदगी" व्यक्त की थी ।

4 - सत्यार्थ प्रकाश की शताब्दी ( सौ साला उत्वस ) 22 से 25 मार्च तक दिल्ली के राम लीला ग्राउंड में बड़ी धूम धाम से मनाया गया। देश विदेश से भारी संख्या में आए हुए लोग शरीक हुए। इस अवसर पर इस "हक प्रकाश" पुस्तक का प्रकाशन सराहनीय और एक अच्छा कदम है । 

                                                                       
                       वस्सलाम 
                   अबु राशिद बिन हाजी मुहम्मद सुलैमान                                   
                    10 मार्च 1979 ई० 13

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