भूमिका
पहले मुझे देखिये
स्वामी_1 दयानन्द जी ने एक किताब "सत्यार्थ प्रकाश" देवनगरी
में लिखी थी जिसमें सारे प्रचलित धर्मों_2 का खंडन और अपनी मामूली समस्याओं को बयान किया था। किताब के चौदह अध्याय हैं। इनमें से चौदहवें अध्याय में कुरआन पर आपत्ति की है। जब तक यह किताब देवनागरी में थी जन सामान्य की भाषा न होने के कारण प्रसिद्ध न थी। हमने इसका हिन्दी में भी अध्ययन किया था। उसी समय से हमारा विचार था कि जितना कुरआन से इसका भाग संबंधित है उसका जवाब उर्दू में दिया जाए, उस समय इसका जवाब देने में यह परेशानी थी कि नागरी का अनुवाद भी हमें ही करना पड़ता।
अल्लाह की शान चूंकि यह काम अल्लाह को हम से कराना मन्जूर था। इसका ज़रिया भी उसने आर्यों को ही बनाया कि उन्होंने इस किताब का अनुवाद उर्दू में करके हजारों प्रतियां प्रकाशित की । फिर क्या था एक हमारी स्वंय की राय, दूसरे दोस्तों ने भी जो इस नाचीज़ को इस काम के लिए योग्य समझते थे। इसका जवाब देने के लिए जोर डाला जाने लगा अतएव अल्लाह का नाम लेकर मैने इस काम को आरंभ कर दिया और फिर अल्लाह ने इस काम को पूरा भी करा दिया।
इस बात को बताना कुछ जरूरी नहीं कि स्वामी जी के सवाल पूरी तरह गलत फहमी पर आधारित हैं इसलिए कि सत्य को स्वीकार करने से सदैव गलत फहमी ही रोक बना करती है वर्ना सत्य की समझ भली प्रकार मन मस्तिष्क में आ जाए तो फिर किसी सत्य को चाहने वाले के दिल से विरोध नहीं हुआ करता। हां, इस बात का दुख अवश्य है कि इस जवाब से पहले स्वामी जी की तेज जबानी और अल्पज्ञान के मुकाबले हिन्दुओं की शिकायतें सुनकर हम उनको धार्मिक पक्षपात और अकारण की दुश्मनी पर आधारित और अतिश्योक्ति वाला समझा करते थे मगर जब हम पर बीती तो हमें बड़ा भारी दुख हुआ कि हमारी यह पुरानी राय गलत साबित हुई जिससे भविष्य में हम हिन्दुओं की शिकायत को वाजिबी मानने को मजबूर हैं ।
स्वामी जी ने कुरआन शरीफ का उर्दू अनुवाद नागरी में कराकर बिना सोचे समझे आगे पीछे देखे बिना जो कुछ दिल में आया लिख मारा। यद्यपि उन्होंने अनुवाद का नाम नहीं बताया मगर अन्दाजे से मालूम होता है कि जिस अनुवाद पर स्वामी जी ने बुनियाद रखी है । वह शाह रफीउद्दीन साहब का शाब्दिक अनुवाद है जो उर्दू भाषा के कायदे व व्याकरण, मुहावरे व अरबी भाषा के स्पष्ट अर्थ पर आधारित नहीं है। इसके अलावा स्वामी जी इसमें अपनी ईजाद (अविष्कार) से भी बाज़ न रहे अतएव पाठक जगह जगह इसे प्रतीत करेंगे।
स्वामी जी ने सवालों पर नम्बर भी लगाए हैं कुल नम्बर 159 हैं। मगर हम इनके लिए उनकी वकालत में एक नम्बर और ज्यादा करके पूरे 160 कर देंगे। यदि हमारे समाजी दोस्त कहते तो ऐसे नम्बरों की संख्या हम हज़ारों तक उनको पहुंचा देते। काश स्वामी जी बजाए 159 नम्बर के केवल 59 बल्कि इनमें से भी 9 के अंक को उड़ा कर केवल 5 सवाल ही ऐसे करते जिनको विद्वान उचित सवालों का नाम दे सकते।
चलिए जो कुछ स्वामी जी से हुआ वह यही 159 या हमारी वकालत की मदद से 160 नम्बर हैं जिनको हम ज्यों का त्यों उन्हीं के वाक्यों में पूरा पूरा नकल करके जवाब देंगे।
स्वामी जी ने जैसा कि हमारे पाठक देखेंगे यह तरीका रखा है। कि पहले कुरआन शरीफ का शाब्दिक अनुवाद लिखते हैं फिर अपना नाम आपत्ति कर्ता लिखकर उस पर आपत्ति करते हैं । इसी लिए हमने जवाब देते हुए "आपत्ति का जवाब" शीर्षक लगाकर जवाब दिया है।
चूंकि स्वामी के अधिकांश सवाल ऐसे भी हैं जो वैदिक धर्म या आर्य समाज के सम्पूर्ण धर्म के भी विरुद्ध है इसलिए सामान्यता हमने उनकी आपत्तियों का जवाब देकर बाद में भी शोधपूर्ण जवाब दिए हैं।
स्पष्ट रहे कि हमारे हवालों में सत्यार्थ प्रकाश से तात्यर्प प्रमाणिक उर्दू अनुवाद प्रकाशित प्रतिधार्मिक सभा पंजाब है। चूंकि यह अनुवाद अनेक बार छपा है और आर्यों ने किसी विशेष लाभ के लिए प्रथम एडीशन के पृष्ठों की समानता नहीं रखी। इसलिए पाठक गणों की आसानी के लिए अध्याय नम्बर सहित भी लिखेंगे और ऋग्वेद आदि भाष्य भूमिका का केवल भूमिका से तात्पर्य अनुवादक बाबू निहाल सिंह आर्य निवासी कर्नाल हैं अतः जिस सज्जन को हमारे हवालों या वेद के अनुवाद में संदेह हो वह प्रत्यक्ष में हम से जवाबी कार्ड भेजकर मालूम करें हम उनको स्वामी जी की किताब से ही वे हवाले दिखा देंगे। और यह भी स्पष्ट रहे कि हमने इस जवाब में किसी समाजी लेखक को सम्बोध नहीं किया क्योंकि हम जानते हैं कि जितनी इस्लाम से दूरी हुई है इसलिए उनके चेले वही कहें तो उनका दोष नहीं।
पहले एडीशन में यह किताब ईशवरीय किताब के साथ इसलिए लगायी गयी थी कि इसमें आर्यों से वाद विवाद था मगर दूसरे एडीशन से दोस्तों की इच्छा के अनुसार उसको अलग कर दिया गया और उसका नाम भी इसी के हिसाब से "हक प्रकाश बजवाब सत्यार्थ प्रकाश" प्रस्तावित हुआ।
पहले एडीशन पर आर्यों में एक असाधारण जोश पैदा हुआ। इसके जवाब देने का विज्ञापन भी निकला, बल्कि रिसाला आर्य मुसाफ़िर में थोड़ा बहुत जवाब भी निकला । लेकिन अन्त में वही बात सामने आयी - - कि
हबाब बहर को देखो यह कैसा सर उठाता है
तकब्बुर वह बुरी शै है कि फौरन टूट जाता है
हम इन्तिज़ार में थे कि पूरा जवाब सामने आए तो दूसरे एडीशन में इस ओर भी कृपा हो जाए मगर अफसोस कुछ नम्बरों में जो अभी आरंभ ही हुए थे कि उत्तरदायी आलोप हो गए। सितम्बर 1902 ई तक जवाबुल जवाब की भनक तक न आयी बल्कि पांचवे एडीशन (जुलाई 1924 ई0) तक भी उनकी आवाज न आयी।
दिल की दिल ही में रही बात न होने पायी
हैफ सर हैफ मुलाकात न होने पायी
जितना लेख आर्य मुसाफ़िर रिसाला में छपा था उसका जवाब उन्हीं दिनों में रिसाला अनवारुल इस्लाम सियालकोट में तुरन्त निकल गया था फिर भी कुछ बातों का जवाब जो इस नाचीज़ से खास संबंध रखती हैं समय समय पर दिया जाएगा। जवाबुल जवाब के वाक्य से पहले मोअय्यद (मददगार) का शब्द होगा। जैसे कि स्वामी के वाक्य के सिरे पर शब्द मुहक्किक आपत्ति का शब्द मिलेगा। मोअय्यद (मददगार) ने जवाब की भूमिका में मुझ पर आरोप लगाया है कि सत्यार्थ प्रकाश लिखे हुए 26 साल हो गए, अब तुम्हें जवाब सूझा। मगर अफ़सोस कि उन्होंने यह नहीं समझा कि 26 साल यदि गुजरे हैं तो नागरी ही में गुजरे हैं लेकिन जब देश की सामान्य भाषा उर्दू में आप लोगों ने इसका जलवा दिखाया तो जवाब की जरूरत भी महसूस हुई फिर तुरन्त कर्ज उतारा गया।
इसके अलावा यह आरोप तो स्वामी जी पर भी है कि कुरआन को उतरे हुए तेरह सौ साल हुए और अब स्वामी से बड़ी मुश्किल से यह बन पड़ा जो आगे आता है। यदि यह कहा जाए कि स्वामी जी तो पैदा ही अब हुए हैं वे तेरह सौ साल पहले किस प्रकार कुरआन पर आपत्ति व्यक्त करते तो निवेदन यह है कि यह नाचीज़ भी तो स्वामी जी के जमाने के बाद ही व्यस्क और ज्ञान की प्राप्ती तक पहुंचा है। यदि मुझे उनसे मुलाकात का अवसर मिलता तो शायद उनको सत्यार्थ प्रकाश लिखते हुए चौदहवां अध्याय लिखने की जरूरत न पड़ती।
इस जवाब के "हक प्रकाश" की सूरत में प्रकाशित होने के बाद स्वामी दर्शना नन्द_3 को जवाब का ध्यान आया अतएव उन्होंने अपनी मासिक पत्रिका मुबाहसा के एक दो नम्बरों में जवाब देना आरंभ किया। उसे देखकर हम लम्बे समय तक इन्तिज़ार करते रहे कि स्वामी जी खत्म करें तो इसके जवाब का फैसला तीसरे एडीशन में कर दें मगर अफ़सोस कि स्वामी दर्शना नन्द भी एक दो कदम चलकर ऐसे गिरे कि दुनिया सिधारे जाने तक इधर का रुख न किया।
प्रिय पाठको ! आर्यो के मिशन में जितनी धार्मिक पुस्तकें होती हैं। व्यक्त करने की जरूरत नहीं मगर हक प्रकाश के जवाब पर साहस न जुटा पाना क्या कारण रखता है ? यही उनका ज्ञान भी इसी बात का फैसला करता है कि स्वामी दयानन्द जी की आपत्तियां कुछ खास महत्व नहीं रखतीं। भवदीय
भवदीय लेखक अमृतसर ।
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- स्वामी बड़ा सम्मानित शब्द है। आर्य समाज हमारे पैगम्बर हजरत मुहम्मद मुस्तफा ﷺ का नाम केवल मुहम्मद लिखते और एक वचन के कलिमे से बयान करते हैं जैसे लिखते हैं 'मुहम्मद' पैदा हुआ, मुहम्मद कहता था यह एक सामान्य दर्ज के लोगों के लिए है मगर हम उनके गुरू को इज्जत ही से याद करेंगे क्योंकि इस्लाम का यही आदेश है ।
- हिन्दुओं ने अपने लेख के बारे में इस किताब के अनेक जवाब दिए हैं अतएव कुछ के नाम ये हैं। दयानन्द तमर भास्कर, सत्यार्थ भास्कर, दयानन्द सुभावे प्रकाश, ईसाइयों के जवाब का नाम है सत्यार्थ प्रकाश
- आह ! आज ये बुजुर्ग हम से सदैव के लिए बिछड़ गए हैं। आर्यों में बड़ी खूबी के आदमी थे देवरया जिला गोरखपुर के बाद विवाद में यही सज्जन हमारे मुकाबले में थे। कडवी कसीली बात करना, दिल दुखान। जो दूसरे बहुत से आर्यों की आदत है इनमें न थी।
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