इब्लीस ने अल्लाह का हुक्म नही माना तो क्या इब्लीस बड़ा हो गया?
किस्सा आदम-ओ-इब्लीस
यह क़ुरआन की सूरह आराफ़ 7 की आयत 10 11 12 13 14 15 16 17 18 है जिनमें आदम और इब्लीस का किस्सा बयान हुआ है ।
इस में अल्लाह तआला के कहने पर भी इब्लीस ने आदम अलै• को सजदा करने से मना कर दिया और जब उससे पूछा गया कि, "तुझे किस चीज ने आदम को सज़्दा करने से रोका है ?"
तो उसने अपनी तख़लीक़ (बनावट) पर घमंड करते हुए कहा कि मैं आग से बना हूँ और आदम मिट्टी से, मैं(इब्लीस) आदम से बेहतर हूँ।
बस इसी घमंड की बिना पर उसने ख़ुदा का हुक्म मानने से इनकार कर दिया । और वो गुनहगार बन गया । अल्लाह हमें इस्लाम पर पूरी तरह चलने की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए ।
उसके बाद उसने ये वादा किया कि वो अल्लाह के बंदों को अल्लाह की राह से क़यामत तक भटकाएगा; तो अल्लाह ने उसे मोहलत दी । लेकिन जो अल्लाह का बंदा होगा वो नहीं भटकेगा और अल्लाह की बताई हुई राह पर रहेगा ।
आपत्ति
अब यहाँ पर एक सवाल किया जाता है, वो ये है कि अल्लाह ने सबको सज़्दा करने के लिए कहा था लेकिन इब्लीस ने सज़्दा करने से मना कर दिया और इब्लीस ने अल्लाह की नाफ़रमानी कर दी, तो अल्लाह ने इब्लीस का कुछ किया नहीं, और लोग इससे ये परिणाम (नतीजा/रिजल्ट) निकालते हैं कि चूंकि अल्लाह की नाफ़रमानी करने के बावजूद भी अल्लाह इब्लीस को सजा नहीं दे पाए, तो अल्लाह बड़ा है या इब्लीस ? ये सवाल कुछ लोग करते हैं ।
आपत्ति का जवाब
पहली बात तो ये हैं कि इब्लीस जिन्नों में से था फरिश्तों में से नहीं । और जिन्नों और इंसानों दोनो को अपनी पसंद चुनने की आजादी दी गयी है यानी इन दोनों मख़लूक़ात को free will दी गई है। इंसानों और जिन्नों को जो अच्छा लगे वो उन्हें करने का इख्तियार है। इस बात की आजादी अल्लाह तआला ने इंसानों और जिन्नों को दी है ।
और यहाँ पर इब्लीस ने अपनी पसंद की आजादी का भरपूर फायदा उठाया और उसने खुदा की बात मानने से इनकार कर दिया (और अवज्ञाकारी हुआ) । याद रहे कि इस वाकिये से पहले वो नेकोकार भी था इबादतगुजार भी था । लेकिन यहाँ उसने अपनी पसंद चुनी । अल्लाह ने पसंद चुनने की आजादी दी हुई है लेकिन अगर इंसान और जिन दोनों मे से कोई भी बुरे अमल करेगा और ख़ुदा की नाफ़रमानी करेगा तो उसका बदला आख़िरत में उसे मिलेगा । जैसा अल्लाह ने कहा कि: जो भी तेरी (इब्लीस) की पैरवी करेगा अल्लाह उसे और उसके पैरोकारों को जहन्नम से भर देंगे ।
नोट :- अल्लाह चाहता तो उसे उसी वक्त सजा दे देता लेकिन बुरे आमाल पर सजा देना और अच्छे आमाल पर जज़ा देना ये आख़िरत तक के लिए रोक दिया है ।
यहाँ एक बात और समझने की है कि अगर अल्लाह, इब्लीस से बड़ा न होता, तो इब्लीस को उस जगह से नहीं निकाल पाता और इब्लीस वहीं डेरा डाल कर बैठा रहता । लेकिन अल्लाह ही सब से बड़ा है तो उसने उसे उस जगह (जन्नत) से निकाल दिया ।
एक बात और यहीं समझ लें कि इब्लीस ने अल्लाह से मोहलत माँगी है यानी इजाज़त माँगी है कि मैं ऐसा काम करूँगा । अगर इब्लीस अल्लाह से बड़ा होता तो इब्लीस इजाज़त नही मांगता बल्कि कहता कि मैं तेरे हर बंदे को गुमराह करूँगा ।
अल्लाह हमें इब्लीस से अपनी पनाह में रखे ।
एक सवाल और उठ सकता है कि इब्लीस ने ही इनकार क्यों किया फरिश्तों ने क्यों नहीं किया ? तो उसके लिए ये बात जान लेनी चाहिए कि फरिश्तों की तख़लीक़ (सृष्टि) में नाफ़रमानी जैसा कोई शब्द है ही नहीं उन्हें बस हुक़्म दिया जाता है और वो उसे पूरा कर देते हैं वो नाफ़रमानी कर ही नहीं सकते हैं ।
एक उदाहरण से समझते हैं कि जिस तरह बाप की नाफ़रमानी बेटा कर देता है तो बाप को अधिकार होता है कि वो उसे सजा दे या छोड़ दे । अब आप इससे ये परिणाम नहीं निकालेंगे की बाप से बड़ा बेटा हो गया, अगर बाप ने बेटे को सजा दिए बगैर छोड़ दिया दिया तो ।
एक प्रश्न ये उठता है कि सजदा करने का आदेश तो फरिश्तों को था फिर इब्लीस तो जिन्नों में से था उस पर वो आदेश लागू कैसे हो सकता है?
तो इसका जवाब ये है कि जब वहां पर बहु-संख्या में फरिश्ते मौजूद थे तो फरिश्तों के साथ साथ यह आदेश जिन्न पर भी लागू होगा । और एक बात ये की अगर उसके लिए हुकुम नही था तो फिर उसने यही बात क्यों नही कही की मुझे तो आदेश था ही नहीं फिर में सजदा क्यों करता? अल्लाह क्या मुझे भी हुकुम है इसमें? उसने पूछा क्यों नही? लेकिन जब अल्लाह ने उससे पूछा तो उसने अपने आग से होने की वजह को बताया और घमंड ज़ाहिर किया।
फिर यह भी कहा जाता है कि जिन्न की रचना आदम से श्रेष्ठ थी यह बात वही लोग कह रहे हैं जो खुद मिट्टी के हैं और खुद को श्रेष्ठ(आर्य) मानते हैं। इस्लाम मे जीवों में सबसे श्रेष्ठ मनुष्य को ही माना गया है।
जिन्न को चाहिए था कि ईश्वर का आदेश मानता जो कि सर्वोपरी है। अल्लाह को यह अधिकार है कि वो हर किसी का इम्तेहान ले, और अल्लाह ने उसका इम्तेहान लिया जिसमे वो विफल हो गया। और उसने विद्रोह किया अल्लाह के विरुद्ध यह सबसे पाप उसने किया। अगर वो चाहता तो क्षमा मांग कर वापस फरमाबरदार बन सकता था आदम अलै. की तरह जैसे आदम अलै. से गलती हुई और उन्होंने तौबा की तो वो भी तौबा कर सकता था लेकिन उसे तो विद्रोह करना था यही उसका सबसे बड़ा गुनाह था।
उसे इंसानियत को गुमराह करने की इजाज़त इसी लिए दी गयी क्योंकि उसने इजाज़त मांगी थी अल्लाह चाहता तो उसको इजाज़त न देता लेकिन यह उसकी फ्री विल के साथ नाइंसाफी होती और यह एक चुनौती थी सारी इंसानियत के लिए इब्लीस की तरफ से जिसे अल्लाह ने अपने बंदों के लिये रखा और आख़िरत में, अल्लाह के बंदों को इसका सवाब मिलेगा जो इससे बच जाएगा।
फिर एक प्रश्न ये भी आता है कि अल्लाह ने सजदा करने का आदेश अपने सिवा किसी को नही दे रखा है तो फिर अल्लाह ने अपने आदेश के विरुद्ध ही आदम को सजदा करने का आदेश क्यों दिया?
तो इसका उत्तर ये है कि अल्लाह ने अपने लिए जो सजदा करने का आदेश दिया हुआ है वो अल्लाह को पूज्य मान कर सजदा करने का आदेश दिया हुआ है। आदम के लिए जो सजदा करवाया है वो अल्लाह के लिए जो सजदा होता है इससे भिन्न है। यह बात इब्लीस को मालूम थी। अगर इब्लीस को इस बारे में शंका थी तो फिर इसके बारे में अल्लाह से सवाल करता कि इस सजदे का क्या मतलब है ? सजदा तो तुझे ही किया जा सकता है फिर यह आदम को क्यों? फिर अल्लाह जवाब देता । लेकिन उसने तो सीधे ही विद्रोह कर दिया अपने मालिक के खिलाफ अपनी सृष्टि(तख़लीक़) पर घमंड करते हुए जबकि सर्वोपरि तो ईश्वर का आदेश है।
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