आपत्ति

Thursday, 11 June 2020

आपत्ति नंबर 21
क़ुरआन सूरह बक़रह
आयत : 89
शुभ सूचना ईनानदारों को । अल्लाह, फरिश्तों, सन्देष्टाओं जिबरील और मीकाईल का जो दुश्मन है अल्लाह भी ऐसे काफिरों का दुश्मन है । 
आपत्ति - 21

जब मुसलमान कहते हैं कि अल्लाह किसी का साझी नहीं है फिर ये फौज की फ़ौज कहां से कर दी ? क्या जो औरों का दुश्मन है वह खुदा का भी दुश्मन है ? यदि ऐसा है तो ठीक नहीं । क्योंकि खुदा किसी का दुशमन नहीं हो सकता । 

आपत्ति का जवाब 

इस उपरोक्त अनुवाद को देखने वाले भली प्रकार समझ सकते हैं कि दयानन्द जी को भ्रम में कहां तक आनन्द मिलता है । अनुवाद ऐसा प्रस्तुत किया है जिसका सर है न पावं है क्यों न हो स्वामी का कहना क्या ही सच है 
आगे पीछे न देखने वाले अज्ञानियों को ज्ञान कहा ।
 (भूमिका पृष्ठ 52)

मगर खैर हमें तो इनके सवाल का जवाब देना है । समाजी मित्र तो गला फाड़ फाड़ कर परमेश्वर अकेला सर्वशक्तिमान कहते हैं। फिर क्या कारण है कि वेद बताता है ।

परमात्मा के इस खजानए कुदरत को जिसकी देवता रक्षा करते हैं कौन नहीं जान सकता है ।

(अथर्ववेद कांड 10 प्रफाटक 23 अनुवादक 4 मंत्र 23 )

देवता  उसके सेवक (नौकर) और कुछ दूत (सन्देश पहुंचने वाले) बाकि उसके पास बैठ गए !

वेद यह भी आज्ञा देता है । 

तैंतीस देवता उस परमात्मा के बांटे गए कर्तव्यों को पूरा कर रहे हैं । वे उसकी कुदरत के आंशिक द्योतक हैं जो लोग इस ब्रह्म अर्थात वेद या सव्र ब्रहमांड ईश्वर को पहचानते हैं वेद उन तैंतीस देवताओं को जानते और उनको इसी ब्रहम के सहारे स्थापित मानते हैं ।
(उपरोक्त हवाला मंत्र 27 )

जब परमेश्वर एक बिना किसी साझी के है तो पंडित जी यह फौज (साझी) कहा से आ गयीं ? यह है स्वामी जी की योग्यता । इतना भी नहीं जानते कि प्राणी को अल्लाह के नाम के साथ मात्र जिक्र आना जाना शिर्क नहीं हुआ करता बल्कि इसी हैसियत से आए जिस हैसियत से ईश्वर का नाम आया है तो शिर्क होता है । भला यदि कोई कहे कि ईश्वर इस पापी को नष्ट करे जिसने दयानन्द जी को विष से मार डाला तो क्या यह भी शिर्क है ?

प्रिय पाठको पंडित जी के इसी वाक्य पर आप चकित न हों । आगे भी बहुत से अवसर_1 आप सुनेंगे कि स्वामी जी शिर्क से ऐसे भागते हैं जैसे मासाहारी से । अतएव लाइला है इल्लल्लाहु के साथ मुहम्मदरसू लुल्लाह को मिलाना भी शिर्क समझोगे । क्यों न हो बेचारे सांपों के डसे हुए रस्सियों से डरते हैं । लम्बी अवधि के शिर्क और मूर्ति पूजा में फंसे हुए, मुसलमानों की आपत्तियां सुन-सुन कर इस मार्ग पर आए हैं इसलिए थोड़ा बहुत मजबूर भी हैं मगर अफ़सोस ।

हां, यह खूब कही कि "खुदा किसी का दुश्मन नहीं हो सकता।” हम पंडित जी की स्म्रण शक्ति की कहां तक शिकायत करें । ईश्वर का आदेश भी सुनिए - और तनिक ध्यान से सुन लीजिए । 
"मैं व्यभिचार अत्याचारियों को कभी आशीर्वाद नहीं देता ।"


बताइए ये कौन लोग हैं जिनको आशीर्वाद नहीं मिलता, वही है जिन को कुरआन में अल्लाह का दुश्मन या सूरह बकरा 98 में । फइनल्लाह अदुवुन लिल काफिरीन कहा गया है । स्वामी जी यह समझ बैठे होंगे कि जिस तरह हम अपने दुश्मन को हो सके तो दम भर जीने नहीं देते । ईश्वर भी ऐसे ही करता होगा मगर उनको मालूम नहीं ।


  1. वय 52 वाक्य 55 आदि । 

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