आपत्ति नंबर 22
क़ुरआन सूरह बक़रह
आयत : 58
और कहो कि माफी मांगते हैं । हम माफ़ करेंगे तुम्हारे गुनाह और अधिक नेकी करने वालों के ।
(आयत - 58)
आपत्ति 22
भला यह ईश्वर का पथ प्रदर्शन सब को गुनहगार बनाने वाला है या नहीं क्योंकि जब गुनाह माफ हो जाने का सहारा आदमी को मिलता है तब गुनाहों से कोई भी नहीं डरेगा । इस वास्ते ऐसा कहने वाला ईश्वर और यह ईश्वर की बनाई हुई किताब नहीं हो सकती । वह न्याय धीश (न्याय करने वाला) है । अन्याय कभी नहीं करता और गुनाह माफ करने से तो अन्यायी हो जाता है मगर जैसी गलती हो जैसी सजा देने से ही न्याय करने वाला हो सकता है ।
आपत्ति का जवाब
यह मसला स्वामी का विचार करने योग्य है । इसे पंडित जी ने कई एक अवसरों पर लिखा है सबका मतलब यह है कि तौबा स्वीकार नहीं होती । हम वायदा अनुसार पहले वेद मन्त्र स्वामी जी बयान करके इसकी मन्शा समाजियों से पूछते हैं । मन्त्र से पहले स्वयं पंडित जी भूमिका में एक प्रस्तावना लिखते हैं वह भी विचार योग्य हैं । आप लिखते हैं
इस ईश्वर की हिदायत किए हुए धर्म को मानना हर मनुष्य पर फर्ज हैं और चूकि उसकी मदद के बिना सच्चे धर्म का ज्ञान और उसकी पूर्ति सफल नहीं हो सकती । इसलिए हर मनुष्य को ईश्वर से इस तरह मदद मांगनी चाहिए ।
"ऐ अग्नि (परमेश्वर) प्रतीज्ञा व सत्य के स्वामी व रक्षक ! मैं सच्चे धर्म पर चलूगा अर्थात उसकी पाबन्दी करूँगा । ऐ परमेश्वर मुझे सच्चे नेक रास्ते और धर्म पर अमल करने की ताकत दे । आप मुझे साहस दीजिए कि मेरी सच्चे धर्म की प्रतीज्ञा आप की कृपा से पूरी हो (प्रतीज्ञा यह है) में आज से सच्चे धर्म की पाबन्दी और झूट खोटे चलन और अधर्म से दूरी अपनाता हूं ।”
अब सवाल यह है कि इस प्रतीज्ञा के अनुसार जिसे इस्लामी मुहावरे में तौबा कहते हैं इस प्रतीज्ञा (तौबा) करने वाले का क्या लाभ ? ईश्वर के सामने तो ऐसी विनम्रता से अपनी नेक नीयती को व्यक्त किया और वहां जो जवाब मिला कि तेरे पिछले गुनाह तो बराबर मौजूद हैं । जिनके नतीजे में तू एक बार पाखाना का करम या जंगल का बन्दर या सुअर बनेगा क्योंकि बिना इसके द्वारा उसूल और दया बिगड़ती है हां, आगे को यदि तूने कुछ सदकर्म किये तो तुझे बदला मिलेगा । फिर बताईए ऐसे ईश्वर से तो मामूली बनिया दुकानदार भी कई गुना अच्छा है या नहीं ? जिनके नौकर यदि सच्ची नीयत से तौबा करें और आगे को आज्ञा पालक बनने और नया काम करने की प्रतीज्ञा करें तो वे भी एक दो बार उनको क्षमा कर ही देते हैं मगर परमेश्वर ऐसा दयालु है कि उसे बन्दे के दिलों का हाल मालूम हैं इसके बावजूद वह मात्र नेक नीयती के साथ मेरे आगे गिड़ गिड़ाता है फिर भी उसके हाल पर दया खाकर उसकी गलतियों को माफ नहीं करता । सच पूछो तो परमेश्वर भी सच्चा है । वह (आर्य समाज के कथनानुसार) इसी तरह तौबा करने पर गुनाह माफ़ करता जाए तो उसके देश और शासन में खलल आता है क्योंकि उन्ही बदकारों को तो उसने हैवानी जानवरों के शरीरों में ढाल ढाल कर दुनिया को आबाद रखना है यदि यही बटेरे हाथ से निकल गयी तो वह लाएगा कहां से ?
हैरत तो यह है कि स्वामी जी के मुंह से भी कभी कभी आप से आप सच्ची बात निकल जाती है मगर यद्यपि किसी खाने में निकले । आप स्वयं सत्यार्थ प्रकाश अध्याय 7 न0 13 में मानते हैं कि न्याय व ईश्वरीय दया में आपसी विभेद नहीं अतः हम भी पंडित जी की तकरीर की व्याख्या करने को उन्हें और उनके चेलों को बताते हैं कि न्याय का अर्थ हरेक वस्तु को ठीक ठीक उसके स्थान पर रखना भलाई का इरादा है या किसी की दुखद हालत पर तरस खाना । यह ''गुण'' भलाई का इरादा पंडित जी भी ईश्वर के बारे में मानते हैं ( देखो सत्यार्थ प्रकाश पृष्ठ 235 , अध्याय 7 न0 19 ) तो आप बताइए कि एक व्यक्ति जो दिल की निष्ठा के साथ ईश्वर के आगे बिना किसी यातना देखने के गिड़गिड़ाता है तौबा करता है तो उसका न्याय (जिसके मायना थे हरेक वस्तु को ठिकाने पर रखना) इस तौबा के लिए भी कोई अवसर प्रस्तावित करेगा और उसका रोना धोना और बे देखे हाय तौबा भी कोई जरूरत है ? बन्दों के हरेक कर्म के लिए जब कोई न कोई कारण हो तो कोई वजह नहीं कि इस काम (तौबा) का कोई औचित्य नहीं है तो बताइए कि कुबूल तौबा ठीक ठीक न्याय और दया दोनों है या नहीं ? बल्कि तौबा का कुबूल न होना और गुनाहों का माफ न होना सरासर जुल्म और न्याय के विरुद्ध है क्योंकि यह बात चीजों को अपने ठिकाने पर रखने के भी विरुद्ध है।
असल में स्वामी जी को बन्दों के अधिकारों और अल्लाह के अधिकारों के बीच भ्रम हो गया । स्वामी जी की तकरीर से जो पृष्ठ 350 सत्यार्थ प्रकाश अध्याय 7 पर है यहीं मालूम होता है कि आप को दोनों में तमीज़ नहीं । तो हम अपने समाजी दोस्तों को बताते हैं । कि इनमें बहुत बड़ा फर्क है और हम भी पहली बार में ही तौबा के काइल नहीं जब तक वह व्यक्ति जिसकी कुछ हानि की हो माफ न कर दे क्योंकि इससे विश्व व्यवस्था बिगड़ती है और दूसरी किस्म में तौबा के स्वीकार होने को मानते हैं । बशर्ते कि सच्चे दिल से और नेक नीयत से मात्र अल्लाह के अजाब से और अपनी बुराइयों के भय से तौबा करे और यह भी शर्त है कि तौबा करते समय आइन्दा (भविष्य) का पक्का ध्यान जी में इस काम के न करने का करे । सुनो
अल्लाह के निकट तोबा उन्हीं लोगों की कुबूल होती है जो नफस के हमले में फंस कर बुरे काम करते हैं फिर झट से तौबा करते हैं।
माफी उन लोगों के लिए जो गुनाह करके ईश्वर को याद करते हैं और अपने गुनाहों पर क्षमा याचना मांगते हैं और (जानते हैं) कि ईश्वर के सिवा कोई गुनाह बख्श नहीं सकता और अपने किए पर जान बूझ कर अड़े नहीं रहते ।
स्वामी जी ने इस पर भी ध्यान से काम नहीं लिया कि जितनी उच्च विशेषताएं दुनिया में हैं उन सब का स्त्रोत अल्लाह के गुण ही हैं जैसे दानवीरता एक उत्तम कमाल है तो असल उसी स्त्रोत का एक निशान है । ऐसा ही न्याय, दया, मुहब्बत आदि उत्तम गुण सब के सब उसी स्त्रोत के निशान हैं जिसको अल्लाह, परमेश्वर, गॉड और खुदा आदि कहते हैं अतः जब हम दुनिया में बहुत से मुकदमों में दावा करने वाले, फ़रियाद करने वालों और मोहताजों को माफ करते भी देखते हैं और उनकी प्रशंसा करते हैं और कभी कभी इसकी सराहना भी करते हैं ।
तो ईश्वर के बारे में कौन सी दलील इस उत्तम गुण के मानने से हमें रोकती है, हां स्वामी जी का यह कहना कि तौबा से गुनाहों का साहस होता है बड़ी विचित्र बात है पंडित जी को यह भी मालूम नहीं कि सांसारिक कारोबार में जिसमें बन्दों को अपने गलत कामों की माफी का पता भी हो जाता है माफी से साहस और बहादुरी नहीं होती तो ईश्वरीय माफ़ी में जिसका पता भी दुनिया में कदापि नहीं हो सकता क्यों कर साहस बढ़ेगा ? हां, ऐसे लोगों की तौबा इस्लाम में भी स्वीकार्य नहीं जो गुनाह करते हुए यह साहस रखें कि तौबा से गुनाह माफ करा लेंगे तो हम अल्लाह का आदेश सुनाकर इस वाक्य को समाप्त करते हैं | जरा ध्यान से सुनो
तो मेरे गुनाहगार बन्दों को कह दे कि मेरी दयालुता से निराश न हो बेशक अल्लाह (तौबा करने पर) सारे गुनाह माफ कर देगा वही है जो अपने बन्दों की तौबा स्वीकार करता है और गुनाह माफ करता है ।
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