Saturday, 16 May 2020


आपत्ति नंबर 1
क़ुरआन सुरह फ़ातिहा आयत : 1


 "आरंभ अल्लाह के नाम के साथ क्षमा करने वाले कृपालु के" 
                                                            (आयत : 1) 

आपत्ति - 1

मुसलमान लोग ऐसा कहते हैं कि यह कुरआन अल्लाह का कलाम है लेकिन इस कथन से मालूम होता है कि इसका बनाने वाला कोई दूसरा है क्योंकि यदि खुदा का बनाया हुआ होता तो "आरंभ अल्लाह के नाम के साथ ऐसा न कहता बल्कि" आरंभ वास्ते हिदायत मनुष्यों के ऐसा कहता । 

यदि मनुष्यों को नसीहत करता है कि तुम कहो तब भी ठीक नहीं क्योंकि उससे गुनाह का शुभारम्भ भी अल्लाह के नाम से होना सादिक आएगा और उसका नाम भी बदनाम हो जाएगा यदि वह क्षमा और दया करने वाला है तो उसने अपने प्राणियों में मनुष्यों के आराम के लिए दूसरे जानदारों को मारकर कठोर यातना देकर और जबह कराकर गोश्त खाने की (मनुष्य को) इजाज़त क्यों दी ?

क्या वे जानदार, बे गुनाह और ईश्वर के बनाए हुए नहीं हैं ? और यह भी कहना था कि “ईश्वर के नाम पर अच्छी बातों का शुरारंभ" खराब बातों का नहीं । ये शब्द उलझे हुए हैं । क्या चोरी, व्याभिचार, झूठ बोलना अधर्म कामो का शुभारम्भ भी ईश्वर के नाम पर किया जाए ? इसी कारण देख लो कि कसाय आदि मुसलमान गाय आदि की गर्दन काटने में भी "बिस्मिल्लाह" पढ़ते हैं (अर्थात ईश्वर का नाम लेते हैं ) जब इसका यही मतलब है तो बुराइयों को भी मुसलमान ईश्वर के नाम पर करते हैं और मुसलमानों का ईश्वर दयावान भी साबित नहीं होता क्योंकि उसकी दया उन जानवरों व जान दारों के लिए नहीं है और यदि मुसलमान इसका मतलब नहीं जानते तो इस कलाम का उतारा जाना बेकार है । यदि मुसलमान इसका अर्थ और करते हैं तो फिर इसका असल अर्थ क्या है ?


आरंभ अल्लाह के नाम के साथ ऐसा न कहता बल्की आरंभ वास्ते हिदायत मनुष्यों के ऐसा कहता" मेरी बात पर गौर करे इससे पहले की हम सनाउल्लाह साहब का जवाब रखें कुछ बातें साफ कर देता हूं। पहली बात यह की अगर स्वामी दयानन्द सरस्वती को यह एहतराज़ है की अल्लाह का कलाम अल्लाह के नाम से शुरु नही होना चाहीए क्योंकी अल्लाह किस अल्लाह का नाम लेकर शुरु करेगा ? अल्लाह का तो कोई अल्लाह नही हो सकता क्योंकी अल्लाह एक ही हैं  तब जबकी आर्य समाज भी एकेश्वर वादी हैं तो वेद भी परमेश्वर की स्तुति (तारीफ,गुणगान, प्रशंसा) से शुरु नही होने चाहीए ! यदि वेद ईश्वर ने बनाए हैं तो वेदिक ईश्वर किस ईश्वर की स्तुति कर रहा है?

अल्लाह शब्द का अर्थ अल्लाह अल और ईलाह से बना हैं ईलाह का अर्थ हैं ईश्वर, परमात्मा,या उपसना योग्य अल अरेबी भाषा में किसी को निश्चित या विशिष्ट करने के लिए लगाया जाता हैं। तब अल और ईलाह मिला कर अल्लाह का अर्थ होगा वही एक उपासना योग्य परमेश्वर।

ऋग्वेद वेद अष्टक १ अध्याय १वर्ग १-२ मण्डल १ सुक्त १ अनुवादक १ मंत्र 

हम लोग विद्वानों के सत्कार संगम महिमा और कर्म के देने तथा ग्रहण करने वाले उत्पत्ति के समय से पहले परमाणु आदि सृष्टि कायनात) के धारण करने वाले (अपनाने वाले) बारंबार उत्पत्ति के समय स्थूल सृष्टी के रचने वाले तथा रितु-रितु यानी मौसम दर मौसम मे उपासना (इबादत) करने योग्य और निश्चय करके मनोहर पृथ्वी(जमीन अरेबी का अर्द शब्द और उर्दू का जमीन शब्द पृथ्वी के लिए भी आता हैं और पृथ्वी के ऊपरी सिरे के लिए भी और सुवर्ण सोना) आदि रत्नों(जवाहरात) के धारण करने वा देने तथा सब पदार्थ (चीजों) के प्रकाश करने वाले (पैदा करने वाले) परमेश्वर (खुदा) की हम स्तुति (तारीफ) करते हैं।
ऋग्वेद मंडल 1 सूक्त 1 मंत्र 1


पंडित हरिशरण सिद्धान्तलंकार जी का अनुवाद

ऋग्वेद मंडल 1 सूक्त 1 मंत्र 1
मैं अग्नि - पुरोहित - यज्ञ के देव ऋत्विज् - होता  व  रत्नधाता  प्रभु  की  स्तुति करता हूँ ।

नोट - यहां इस मंत्र को प्रस्तुत करने से सनाउल्लाह साहब का मतलब यह था की अगर वेद ईश्वरीय ग्रंथ हैं तो ऋग्वेद का पहला ही मंत्र यूं होना चाहीए था:- 

"हे मनुष्यों मुझ सत्कार संगम महिमा और कर्म के देने तथा ग्रहण करने वाले उत्पत्ति के समय से पहले परमाणु आदि सृष्टी(कायनात) के धारण करने वाले (अपनाने वाले) बारंबार उत्पत्ति के समय स्थूल सृष्टी के रचने वाले तथा ऋतु- ऋतु यानी मौसम दर मौसम में उपासना इबादत) करने योग्या (लायक) और निश्चय करके मनोहर पृथ्वी(जमीन अरेबी का अर्द शब्द और उर्दू का जमीन शब्द पृथ्वी के लिए भी आता हैं और पृथ्वी के ऊपरी सिरे के लिए भी) और सुवर्ण (सोना) आदि रत्नों(जवाहरात) के धारण करने वा देने तथा सब पदार्थों (चीजों)के प्रकाश करने वाले (पैदा करने वाले) मुझ परमेश्वर (खुदा) की तुम लोग स्तुति (तारीफ़) करो"

लेकीन जो ऋग्वेद  के पहले ही मंत्र में लिखा हैं परमेश्वर की हम स्तुति करते हैं, से स्पष्ट होता है कि ऋग्वेद एवम अन्य वेद ऋषियों द्वारा लिखे गए हैं नाकी यह ईश्वर की तरफ से  हैं।

इसके अलावा ऐसे मंत्र और भी जगह है। जैसे यजुर्वेद अध्याय 2 मंत्र 18 (हिन्दी हक़़ प्रकाश मे गलत छप गया हैं यजुर्वेद अध्याय 21 मंत्र 18)

अब आगे सनाउल्लाह साहब का जवाब दर्ज होगा।

आपत्ति का जवाब 

स्वामी जी यदि ऋग्वेद मंत्र (1) को देख लेते तो यह बेजा आपत्ति न कर पाते । समाजियो ! तनिक ध्यान से सुनो !

"हम लोग इस अग्नि की प्रशंसा करते हैं जो कि हमारा पूरा हित करने वाली, यज्ञों का हवन करने वाली,  रौशन मौसमों को बदलने वाली, समस्त तत्वों को पैदा करने वाली है।"


बताओ ! यदि अग्नि से (आप के कथनानुसार) ईश्वर ही तात्पर्य है और वेद भी अल्लाह का कलाम है तो उस कलाम को मानने वाला कौन है ? इसके अलावा यजुर्वेद अध्याय 2 मन्त्र 18

और अथर्ववेद कांड 6 सूक्त 98 मंत्र 1


यजुर्वेद अध्याय 32 मन्त्र 14


यजुर्वेद अध्याय 20 मन्त्र 50


ऋग्वेद मण्डल 8 सूक्त 1 मंत्र 1


यजुर्वेद अध्याय 15 मन्त्र 54


अब इसका शोधपूर्ण जवाब सुनिए । 
अब उपरोक्त मन्त्रों को देखकर बताइए की यहां ईश्वर किस ईश्वर की स्तुति कर रहा है यदि वेद ईश्वर की वाणी है?
ईश्वरीय किताबों का मुहावरा और कलाम की शैली कई प्रकार की होती है कभी तो ईश्वर स्वयं बात कहने के रूप में अपना आदेश स्पष्ट करता है और कभी गायब से और कभी कोई ऐसा मतलब जो दुआ या निवेदन के रूप में बन्दों को सिखाना अपेक्षित हो उसे बंदे की जबान से व्यक्त कराया जाता है । सूरह फातिहा भी इसी आखिरी किस्म से है जिस पर स्वामी जी ने अनभिज्ञता के कारण ईश्वरीय ग्रन्थ पर आपत्ति कर दी हा, यह भली कही कि गुनाह का शुरारंभ भी ईश्वर के नाम से होगा जिसका जवाब यही काफी है, कि

नांच न जाने आंगन टेढ़ा

न जाने आपको इतनी जल्दी क्या थी कि कुरआन शरीफ और अन्य ईश्वरीय किताबों का रद्द करने बैठ गए । पहले किसी अरबी मदरसा में रहकर कुरआन को समझ लेते मगर वाह री सच्चाई, कि अपना विचार व्यक्त किए बिना नहीं रह सकती, स्वामी जी वाक्य न0 73 में लिखते हैं । 

जो धर्म दूसरे धर्मों को, कि जिनके हजारों करोड़ों आदमी श्रद्धालु हों झूठा बता दे और अपने को सच्चा स्पष्ट करे । इस से बढ़कर झूठा धर्म और कौन हो सकता । 
(पहले पैराग्राफ की पांचवी लाइन से पढ़ें)

अतः स्वामी जी महाराज और उनके चेलों के लिए तो इतना ही काफी है कि कुरआन शरीफ के मानने वाले करोड़ों लोग हैं फिर जो तुम उसकी शिक्षा को झूठा और गलत कहो तो तुम से अधिक . . . . . . कौन है ? 

समाजियो ! मुंह न छुपाओ । हुआ क्या ? यदि चेले बनने का इकरार करो तो हम तुम्हें एक जवाब सिखाते हैं । सुनों ! साफ कह दो स्वामी जी कोई ईश्वरीय न थे कि उनकी सारी बातें मानने योग्य हों बल्कि वे समाज के एक सदस्य थे जिनसे गलती भी संभव थी । इस कथन में भी वे गलत चाल चले कि अधिसंख्यक वाली राय को हकीकत के विरुद्ध समझा तो यदि तुम यह कह दोगे तो तुम मुक्त हो जाओगे लेकिन चूंकि हम इस समय स्वामी जी के मुकाबिल हैं । उनके जवाब देने को उनके कथनों को नकल करना काफी होगा । 

मतलब आयत का साफ है कि हम ईश्वर की प्रशंसा को जो आगे कलाम में आती है ईश्वर के नाम से आरंभ करते हैं, हां यदि कोई काम भी नेक या वैध हो और ईश्वर के नाम से आरंभ हो जाए तो यह अच्छी ही बात है और पुण्य का कारण है । 
हराम काम को बिस्मिल्लाह ( ईश्वर के नाम से ) से आरंभ करना या हराम चीज़ बिस्मिल्लाह पढ़ कर खाने से आदमी काफिर हो जाता है, हां जानवरों के जबह की ओर भी मौके पर इशारा किया है ।

स्वामी जी ! निश्चय ही यह बड़ी दया की बात है कि बेजबान जानवरों को जबह करके उनकी कैद के दिन पूरे कराए जाएं जिससे दो लाभ अपेक्षित हैं । एक तो वे आत्माएं जो (आपके कथनानुसार) बुरे कर्मों से उन हैवानी शरीरों में आकर फंस रही हैं (देखो उपदेश मंजरी पृष्ठ - 60) कैद से छुटकारा पाएं । दूसरे यदि वे मनुष्य की भान्ति बीमार रह कर अपनी मौत मरें तो कितने कष्टों के बाद उनकी आत्मा निकले । स्वामी जी के हमें कहीं दर्शन हो जाएं तो हम उनसे पूछे मौत की सख्ती कितनी कठिन काम है अतः इस सख्ती के मुकाबले में जबह की सख्ती कोई चीज नहीं । मनुष्य को बीमारी और आत्मा के निकलने से जो तकलीफ होती है स्वामी जी उसका अनुमान लगाते तो यह आपत्ति कभी अपनी जबान पर न लाते बल्कि समाज का पहला उसूल यही ठहराते कि सुबह उठकर हर समाजी का कर्तव्य है कि बन्दूक लेकर दस पांच चिड़यों को या मक्खियों ही को मारा करे यद्यपि मनुष्य अपनी तकलीफों को स्वयं ही व्यक्त कर सकता है और हकीमों के मशवरों से उन तकलीफों में कभी-कभी कमी भी संभव है मगर बेचारे बेजबान जानवर क्या कहें और किस को कहें ? 
हां कोई साहब यह सवाल करें कि इसी तरह मनुष्य को भी ज़बह करके मौत की सख्ती से बचा लेना चाहिए तो हम कहेंगे - - 'नहीं' इसलिए कि मनुष्य सारे प्राणियों में सर्वश्रेष्ठ है इस लिए हर जमाने में हर हुकूमत मनुष्य की हत्या करने पर दंड देती है इसके अलावा मनुष्य के सगे संबंधी और दोस्त कभी इस बात की इजाजत नहीं दे सकते क्योंकि उसके मरते दम तक उनको जिन्दा रहने की उम्मीद होती है जिससे उनकी बहुत सी आशाएं व मनोकानमाएं जुड़ी होती हैं अतः इन कारणों से मनुष्य को मारने में दंगा फसाद का खतरा है इस लिए न किसी समय के शासक ने न किसी धर्म शास्त्र ने इसकी अनुमति दी, हां हैवानात के जबह में चूंकि कोई फसाद नहीं इसलिए सामान्य विश्वसनीय धर्मों में जानवरों के जबह की अनुमति पायी जाती है यहां तक कि हिन्दू धर्म शास्त्र (मनु स्मृति आदि) में भी । 

स्वामी जी ! विश्व व्यवस्था से बढ़कर कोई सद कर्म नहीं । यह व्यवस्था हमें शिक्षा दे रही है कि इस संसार में ईश्वर ने अपने प्राणियों को दो ही प्रकार पर पैदा किया है । बरतने वाली और इस्तेमाल योग्य । कुछ सन्देह नहीं कि मनुष्य सब चीजों को बरतने वाला है और सारी वस्तुएं उसके बरतने योग्य हों । स्वामी जी ! क्या यह ईश्वर की दया नहीं कि उसने हमारी सवारी के लिए हाथी, ऊंट, घोड़ा आदि और हल चलाने को बैल, भैंस आदि पैदा किए । क्या उससे अधिक भी कोई व्यक्ति दया खाकर अपनी सवारी पर दस कोस चलकर दो कोस के लिए उसे अपने ऊपर बिठाना चाहे तो सारे विद्धान और मूर्ख लोग उसे मूर्ख न समझेंगे यद्यपि आपकी समझ के अनुसार यह क्या दया है कि एक जानदार दूसरी जानदार वस्तु को अकारण इतना दबाए कि सारा दिन रात उस पर सवारी करे । आप एक कदम न चलें और वह बेचारा उसको उठाए फिरे और सवार दया न करे । 
समाजियो ! कायनात की व्यवस्था से शिक्षा ग्रहण करो जो सब गुरुओं का गुरू है । बनावटी गुरुओं से गलती संभव है इसमें कण भर गलती न पाओगे । 

इसके अलावा यदि हम इन हैवानों को जबह न करें तो क्या करें । रखने से हमें लाभ ही क्या । कुछ हैवान तो दूध आदि भी दें मगर कुछ ऐसे हैं कि दूध नहीं देते और दूध देने वाले भी एक आयु को पहुंच कर नहीं देते यद्यपि हम उनको खाना दें और रक्षा भी करें जैसे मुर्गी मुर्गा आदि । यदि इनके अंडे खाएं तो आप इसकी भी अनुमति नहीं देते और यदि अंडों से बच्चे निकलवाएं तो फिर क्या यही प्रमाण देंगे । अतः या तो स्वामी जी ऐसे जानवरों के खाने की इजाजत दें जिनसे मानव जाति को कुछ लाभ न हो या कोशिश करके उनसे कोई लाभ दिलवाएं । मगर याद रहे कि प्रकृति का मुकाबला करके लाभ तो दिलवा नहीं सकते, हां यदि दबी जबान से खाने पीने की अनुमति दें तो वही सवाल पैदा होगा कि वे जानदार और ये गुनाह ईश्वर के बनाए हुए नहीं ? और यदि यह भी न करें और जानवरों को मनुष्यों के बराबर ही अधिकार दिलाना चाहें तो कृपा करके पहले दूसरी प्रकार के अधिकारों में समानता कराएं फिर उसका नाम लें ।

हमारे पास वेद मंत्रों के हवाले भी हैं जिनसे साबित होता है कि पहले जमाने में हवन में गाय घोड़े आदि जबह किए जाते थे मगर चूंकि वह अनुवाद स्वामी जी का किया हुआ नहीं बल्कि यूरोपीन विद्वानों का किया हुआ है । खतरा है कि हमारे समाजी दोस्त जो स्वामी जी के श्रद्धालु हैं उस अनुवाद से इन्कारी हो जाएं । इसलिए बजाए उन मंत्रों के स्वामी जी के कलाम का हवाला देना भी बेहतर है । आप इस किताब के चौदहवें अध्याय में लिखते हैं . . . . . कि . . 

जो धर्म दूसरे धर्मों को, कि जिनके हजारों करोड़ों आदमी श्रद्धालु हों झूठा बता दे और अपने को सच्चा स्पष्ट करे । इस से बढ़कर झूठा धर्म और कौन हो सकता । 
(पहले पैराग्राफ की पांचवी लाइन से पढ़ें)

अतः समाजियो ! बताओ, मांसाहारियों की संख्या गिन सकते हो ? गिनते हुए पहले अपनी मांस पार्टी1 से आरंभ करना।

स्वामी जी के मददगार

1 - मौलवी साहब! आपने स्वामी जी की आपत्ति को क्या समझा जिसका जवाब दिया । स्वामी जी ने जो आपत्ति की थी वह यह थी कि कुरआन चूंकि मुहम्मद के कथनानुसार ईश्वरीय कलाम होने से सर्वकालिक और अनादिकालिक है अतः उसका आरंभ नहीं हो | सकता फिर आरंभ करने का कलिमा निरर्थक है । 
2 - अल्लाह का यह कलाम ईश्वर के नाम पर आरंभ करना और भी आश्चर्य जनक है क्योंकि इसकी ज़रूरत अल्लाह को नहीं बल्कि मनुष्य को है और मनुष्य के लिए ईश्वर का कलाम मार्ग दशर्क के रूप में होता है अतः मार्गदर्शन मनुष्यों के लिए होना चाहिए था । 
3 - मौलवी साहब आपने शायद यह समझा कि स्वामी जी ने उसके स्वयं संबोध करने न करने पर आपत्ति की है कदापि नहीं उनकी आपत्ति थी कि अल्लाह को यह कलाम अपने नाम से आरंभ करने की क्या जरूरत थी । अल्लाह के नाम से तो मनुष्य आरंभ किया करते हैं । ( आर्य मुसाफिर मार्च 1902 ई0 ) 

आपत्ति का जवाब 

अब ऐसे ज्ञान पर कोई कैसे न कुरबान हो जाए । पूरा मतलब तो इस वाक्य का इन मददगार साहब ही ने समझा होगा हमने तो कुछ आर्यों को भी यह वाक्य दिखाया मगर वे भी कानों पर हाथ रख गए । मतलब यह कि कुछ भी हो स्वामी जी के असल सवाल पर किसी व्याख्या या समीक्षा करने की आवश्यकता नहीं अतएव वे स्वयं ही । लिखते हैं

"क्योंकि यदि ईश्वर का बनाया होता तो आरंभ साथ अल्लाह के न कहता बल्कि आरंभ वास्ते हिदायत मनुष्यों के ऐसा कहता।"

देखिए स्वामी जी को "आरंभ" के शब्द पर कोई आपत्ति नहीं क्योंकि यदि "आरंभ'' के शब्द पर कोई आपत्ति होती तो अपनी इस्लाह में आरंभ का शब्द क्यों लाते जिससे यह साफ समझा जाता है कि आपकी पुष्टि या समर्थन का नम्बर अव्वल अथति अनादिकालिक होने की वजह से आरंभ न होना बिल्कुल बे समझी की पुष्टि है । 

मददगार साहब के समर्थन का नम्बर (2) भी हैरत से खाली नहीं है इसका मतलब भी वे स्वयं ही समझे होंगे । खैर कुछ भी हो मतलब वही है जो हम बतला आए हैं कि बन्दों के प्रदर्शन के लिए ऐसा किया गया । हां स्वामी जी की यह आपत्ति कि गुनाह का आरंभ भी अल्लाह के नाम से अवश्य आएगा इसका जवाब भी हो चुका कि यहां सब कामों का आरंभ करना तात्पर्य नहीं बल्कि उसी काम का जो बिस्मिल्लाह के आगे है अर्थात अलहम्दु लिल्लाह या कोई और इसी प्रकार का भला काम ।

मददगार साहब ने यह भी आपत्ति की है कि यह बिस्मिल्लाह पारसियों के कलाम से लिया गया है अर्थात "बनाम बखशाइन्दा दाद गर"  अफसोस है कि उन लोगों को आपत्ति करने की राल क्यों ऐसी टपका करती है कि दूसरे कलाम के अर्थ समझने से पहले ही अनेक आपत्तियां जमा देते हैं यद्यपि स्वामी जी भूमिका सत्यार्थ प्रकाश में बड़ी ताकीद से लिखते हैं कि

"हर कलाम का मतलब कहने वाले की मन्शा पर होना चाहिए।" 

यदि यह बात मान भी ली जाए कि बिस्मिल्लाह पारसियों के कलाम का अनुवाद है तो मुसलमानों के धर्म के अनुसार इसके ईश्वरीय होने पर क्या आपत्ति ? हमारा तो यह धर्म नहीं कि ईश्वरीय कलाम वह होता है जिससे पहले न तो वह और न उसका अनुवाद दुनिया में कहीं हुआ हो न हो । देखिए कुरआन मजीद स्पष्ट शब्दों में इस्लाम से पूर्व की ईश्वरीय किताबों की तसदीक करता है और स्पष्ट शब्दों में कहता है ।
"तुम मुसलमानों को और तुम से पहले किताब वालों को यही आदेश दिया गया था कि ईश्वर का भय दिल में रखो ।'' 
चूंकि आर्यों की गलती का मौलिक पत्थर यहीं ना समझी है कि ईश्वरीय कलाम का गुजरा हुआ न होना उनके निकट शर्त है अर्थात यह कहते हैं कि ईश्वरीय वाणी वहीं है जो दुनिया के प्रारंभ में उसके बाद कोई ईश्वरीय वाणी  नही इसी लिए तौरेत और इंजील और कुरआन आदि को ईश्वरीय नहीं मानते । अतः हम चाहते हैं कि उनकी इस गलती का सुधार इसी जगह कर दें। 
        यद्यपि यह दावा उनका वेद_2 के ईश्वरीय होने पर भी मुश्किल पैदा करता है क्योंकि वेद में भी लिखा है कि

"जिस प्रकार प्राचीन काल के विद्वान तुम्हारे पूर्वज समस्त विद्याओं के माहिर गुजर चुके हैं मुझ कादिर मुतलक ईशवर के आदेश का पालन करते रहे हैं तुम भी उसी धर्म के पाबन्द रहो ताकि वेद में बताए हुए धर्म का तुम को निस्संदेह ज्ञान हो जाए।”  
(वृग वेद अशटक - 8 अध्याय 8)
इस वाक्य से साफ़ समझ में आता है कि वेद किसी ऐसे युग में बना है कि उस दौर में दुनिया की आबादी इतनी अधिक हो चुकी थी कि उस समय के मौजूदा लोगों को बुजुर्गों के हाल से शिक्षा ग्रहण करने की या यूं कहिए कि वेद के लेखकों को आवश्यकता पड़ती थी और वे उनका उदाहरण लोगों को बताते थे यदि कहे कि दुनिया का सिलसिला चूंकि हमारे (आर्यो के) निकट प्राचीन काल से है तो इस दुनिया के आरंभ ही में उस समय के वर्तमान लोगों को पहले लोगों की जो पहली दुनिया में गुजर चुके थे चाल अपनाने की प्रेरणा दी गयी है तो इसका जवाब यह है कि ऐसा कलाम जैसा कि वेद का उपरोक्त आदेश है इस अवसर पर बोला जाया करता है जहां सम्बोधित लोगों को पहले बुजुर्गों का ज्ञान और जान कारी हो यद्यपि इस दुनिया के पैदा हुए लोगों को पहले बुजुर्गों की कोई खबर नहीं थी किसी को यदि हो तो बताइए । 

इसके अलावा बड़ी परेशानी यह है कि आर्यो के धर्म में वेद में वेद ईश्वर के ज्ञान का नाम हैं तो जब से ईश्वर है तब से वेद है यद्यपि वेद के शब्द वर्तमान संसार के नष्ट होने से नष्ट हो जाते हैं मगर उसके मायना ईश्वर के ज्ञान में मौजूद रहते हैं इस दुनिया से पहली दुनिया में भी होगा बल्कि जब से ईश्वर है तब से होगा यद्यपि ईश्वर से पहले कोई ज़माना नहीं जिसमें वे बुजुर्ग गुजर चुके हैं। जिनकी चाल अपनाने का उन मौजूद लोगों या हमें आदेश होता है।_3 मगर मुसलमानों और ईसाइयों का धर्म यह नहीं कि ईश्वरीय संकेत दुनिया के आरंभ ही में होगा तो सही वर्ना गलत । बल्कि असल यह है कि ईश्वर की ओर से एक विचार का बिना कुछ किए दिल में डाला जाना ईश्वरीय संकेत है । किसी लेखक के दिल में किसी का आ जाना भी यद्यपि एक मायना से इलहाम है मगर यहां पर जिस ईश्वरीय संकेत से बहस है वह यह नहीं । बल्कि वह तात्पर्य है जो किसी अभ्यास या सोच या चितन का नतीजा न हो बल्कि मात्र अल्लाह की ओर से इलका (हिदायत) हो चाहे वह विचार इस इलहाम से पहले तमाम लोगों को मालूम हो या न हो चाहे दुनिया के आरंभ में हो या मध्य में या अन्त में हो । 
क्योंकि इस बात से कोई दलील बाधा नहीं कि एक किताब या एक विषय जो पहले किसी नबी को इलहाम हुआ था उसके बाद भी किसी नबी को इलहाम हो जाए । इसका उदाहरण ऐसा समझो कि किसी व्यक्ति को परीक्षा पास होने की खबर किसी ज़रिए से बिना सरकारी गुजट के पहुंच गयी मगर इसके बाद उसी सरकारी गजट में भी ख़बर आ गयी । 
ठीक इसी तरह नबियों को किसी पूर्व नबी के ईश्वरीय संकेत द्वारा कोई बात मालूम हो जाया करती है लेकिन नए सिरे से भी वही विचार ईश्वरीय संकेत के रूप में मिल जाता है । ठीक यही समस्त पूर्व किताबों और कुरआन शरीफ की मिसाल है । मुसलमानों में जो यह मशहूर है कि तोरात और इंजील कुरआन से निरस्त है इसके भी यह अर्थ हैं कि कुरआन द्वारा वे विचार पूरी तरह पहुंच कर मानो रजिस्टर्ड पत्र की तरह सुरक्षित हो चुके हैं ऐसे कि इससे पहले न थे क्योंकि बाद में इन किताबों में बहुत कुछ मिला लिया गया था मगर जो जो बातं, पथ प्रदर्शन कुरआनी ईश्वरीय संकेत द्वारा पहुंची तो उसके बारे में यह संदेह बिल्कुल दूर हो गया । और यही अर्थ है कुरआन शरीफ़ की आयतों का । 
"कुरआन पहली किताबों की पुष्टि करता है और उनपर निगहबान भी है तो तुम लोगों के बीच उसके अनुसार फैसला करो जो अल्लाह ने उतारा है ।"
 (सूरह माइदह - 43) 

तो बिस्मिल्लाह से पहले बिस्मिल्लाह का अनुवाद दुनिया में मौजूद होना उसके ईश्वरीय होने के खिलाफ नहीं । मगर जब पैगम्बरे इस्लाम (सल्ल0) को यह पथ प्रदर्शन ईश्वर की ओर से मिल गयी तो ईश्वरीय हो गयी । शुक्र है कि जो वेद मन्त्र हमने आरंभ में जवाब में नक्ल किए थे उनके बारे में मददगार साहब ने भी कुछ न कहा और खामोश होकर पास से गुजर गए और खामोशी मान लेना सहमत होने के दर्जे में है । 

मददगार साहब ने मांसाहारी पर एक और आपत्ति भी की है कि अच्छे से अच्छा जानवर तो खा लेते और भयानक दरिन्दों (शेर, चीता आदि) को हराम समझते हो । यह सवाल मददगार साहब का उस समय उचित था जब वे मांसाहारी को वैध मान लेते और उसके विवरण पर उनको आपत्ति होती लेकिन जिस सूरत में वे पूरी तरह मांसाहारी के इन्कारी हैं तो फिर उसे विस्तार में जाकर प्रस्तुत करने का उनको क्या हक है ? क्या यदि हम एक प्रकार के जानवरों को खा लिया करें तो आर्य लोग हम से सहमत हो जाएंगे ? कदापि नहीं । 

चूंकि लाला साहब और उनके अन्य साथियों के कलम से यह सवाल हमेशा निकला करता है इसलिए मुनासिब है कि इसका जवाब भी दे दिया जाए । गाय का सम्मान क्यों न हो । लाला साहब यदि चिकित्सा संबंधी और मेडिकल उसूलों को अपने समक्ष रखते तो कभी यह आपत्ति न करते । चिकित्सा संबंधी विषय पर छोटी छोटी किताबों में यह बात मिलती है कि जो आहार मनुष्य खाता है वह शरीर का अंश बन कर अपना प्रभाव दिखाता है । इस तिब्बी तहकीक से बढ़कर शरई तहकीक है क्योंकि तिब्ब तो केवल शरीर की रक्षक है मगर शरीअत शरीर और आत्मा दोनों की रक्षक है । लेकिन इन दोनों में आत्मा की रक्षा सर्वोपरि है जिसकी रक्षा का अर्थ तो सब जानते हैं कि बाहरी कष्ट व तकलीफ़ से रक्षा की जाए । आत्मा की रक्षा का अर्थ यह है कि उसे बुराइयों से बचाया जाए जो उसके लिए दूसरे जीवन में तबाही का कारण होती है । 

अतः जो चीजें या जानवर शरीअत ने हराम किए हैं वे उसी उसूल की दृष्टि से किए हैं । इन दरिन्दे जानवरों को तो आप भी खूख्वार मानते है । जिनके खाने से निश्चय ही आदमी पूरा नहीं तो आधा खूख्वार हो जाएगा । क्या आप बता सकते हैं कि चोरी के माल से पूरी कचौरी या भाजी खरीदना क्यों हराम है प्रत्यक्ष में शारीरिक हानि तो उसमें कोई नजर नहीं आती मगर चूंकि दूसरे जीवन में इसकी हानि सामने आ जाएगी इसलिए हराम है अतः इसी तरह सारे कामों को समझ लीजिए जो शरीअत में हराम हैं कि जो चीज़ मनुष्य के दूसरे जीवन या उसी जीवन में उसके आचरण पर बुरा प्रभाव डालती हो उसे शरीअत ने हराम ठहराया है । 

आप लोग नैतिक प्रभाव के विवरण से परिचित न होंगे । नैतिक प्रभाव कभी तो यह होता है कि उसके काम के करते समय आदमी कोई अनुचित हरकत कर गुजरता है जैसे शराब की मसती में नाजायज हरकतें करता है । एक नैतिक प्रभाव यह होता है कि उसकाम के करने से या उस चीज़ के खाने से भविष्य में उसकी आत्मा को हानि पहुंचती है उस पर बुरा प्रभाव पड़ता है और नतीजा यह निकलता है कि उसकी नेक कामों में तबियत नहीं लगती । 
फिर यदि वह इसका जल्दी इलाज न करे तो धीरे धीरे उसकी नौबत यहां तक पहुंच जाती है कि वह बिल्कुल मूर्ख या पागल की तरह ला इलाज हो जाता है फिर उसे किसी नेक काम को करने का सौभाग्य प्राप्त नहीं होता कुरआन से इस दावे का सबूत चाहो तो हर सूरह व आयत से मिल सकता है । एक आयत सुनो 
   “जब वे लोग टेढ़े हुए तो अल्लाह ने उनके दिलों को टेढा कर दिया" 
( सूरह सफफ - 5 )

यदि अपने स्वामी जी के कलाम से सनद चाहो तो सुनो-स्वामी जी बौद्धों के बारे में क्या लिखते हैं

"उन्होंने (बौद्ध धर्म वालों ने) किस दर्जा अपनी अज्ञानता में प्रगति की है जिसका उदाहरण उनके सिवा दूसरा नहीं हो सकता । विश्वास तो यही है कि वेद और ईश्वर का विरोध करने का उन्हें यही नतीजा मिला ।" 
( सत्यार्थ प्रकाश 541 - - अध्याय 12 न0 17 )

इस वाक्य से साफ़ मालूम हुआ कि एक गुनाह दूसरे गुनाह का कारण बन जाता है अतः जिस दर्जा में कोई आहार रूहानी तौर पर बुरा प्रभाव करने वाला होता है उसी अन्दाज़ से शरीअत में मनाही होती है यही कारण है कि शरीअत इस्लाम में कुछ चीजें सख्त हराम हैं और कुछ किसी दर्जा कम जिनको मकरूह कहते हैं । 
दरिन्दे जानवरों की हुरमत भी इसी उसूल पर आश्रित हैं मतलब यह है कि एक उसूल है कि समस्त काम इसी नियम के मोहताज हैं । हा इस बात का पता लगाना कि कौन सी चीज़ या काम अनैतिक हैं । और वह आध्यात्मिक जीवन में बुरा प्रभाव डालने वाली है और कौन | ऐसी नहीं है यह हरेक के बस का काम नहीं बल्कि उनका काम है । जिनको ईश्वरीय संकेत मिला करता है जिससे आपको भी इन्कार न होगा क्योंकि ईश्वरीय संकेत की जरूरत तो आप लोग भी मानते हैं बल्कि आप स्वयं अपने आपको किताब वालों के रूप में जानते हैं । इसी उसूल से नुबुवत की जरूरत मालूम होती है । 


  1. आर्यों की दो पार्टियां हैं । एक मांस खाते हैं उनको मांस पार्टी एक नहीं खाते उनको घास पार्टी कहते हैं उनकी आपसी लड़ाई अखबार आर्य गजट और प्रकाश से अच्छी तरह स्पष्ट हो सकती है ।
  2. इस मसला का विवरण हमारे रिसाला "हदूस वेद" में मिलता है । 
  3. इसका विवरण हमारे रिसाला "हदूस वेद" में है । 

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