Sunday, 31 May 2020

आपत्ति नंबर 14
क़ुरआन सूरह बक़रह
आयत : 53 व 65
हमने मूसा को किताब और चमत्कार दिए । हमने उनको कहा तुम अपमानित बन्दर हो जाओ  यह एक डर दिखाया जो उनके सामने और पीछे थे उनको और पथ प्रदर्शन ईमानदारों को।

(आयत : 53 व 65)
आपत्ति 14

यदि मूसा को किताब दी थी तो कुरआन का होना बेकार है यह बात जो बाइबिल और कुरआन में लिखी है कि उसे चमत्कार दिखाने की ताकत दी थी मानने योग्य नहीं क्योंकि यदि ऐसा हुआ था तो अब भी होता । यदि अब नहीं होता तो पहले भी नहीं हुआ था जैसे स्वामी लोग आजकल भी जाहिलों के बीच विद्वान बन जाते हैं इसी तरह उस जमाने में भी धोखा किया होगा । 
क्योंकि ईश्वर और उस की पूजा करने वाले अब भी मौजूद हैं । तब भी इस समय ईश्वर चमत्कार दिखाने की ताकत क्यों नहीं देता ? और न वे चमत्कार दिखा सकते हैं । यदि मूसा को किताब दी थी तो दोबारा कुरआन के देने की क्या जरूरत थी ? क्योंकि यदि भलाई बुराई करने में करने का उपदेश सब जगह समान है तो दोबारा विभिन्न किताबों के बनाने से पिसे हुए के पीसने का उदाहरण लागू होता है । क्या ईश्वर उस किताब में जो कि मूसा को दी थी कुछ भूल गया था । यदि ईश्वर ने अपमानित बन्दर हो जाना मात्र डराने के लिए कहा तो उसका कहना झूठा हुआ या उसने धोखा दिया या जो ऐसी बातें करता है वह ईश्वर नहीं और जिस किताब में ऐसी बातें मौजूद हों वह ईश्वर की ओर से नहीं हो सकती ।

आपत्ति का जवाब

चमत्कारों के बारे में बड़ा अच्छा प्रश्न किया । स्वामी जी ! आप ही के कथनानुसार दुनिया के आरंभ में यदि मनुष्य जवान जवान पैदा हुए थे (सत्यार्थ प्रकाश अध्याय 8)_* तो क्यों जवान जवान पैदा नहीं होते । यदि आप कहें कि वे बच्चे पैदा होते तो उनके लालन पालन के लिए दूसरे मनुष्यों की जरूरत पड़ती जिससे आप का मतलब यह है कि अब जवान जवान पैदा होने की ज़रूरत नहीं तो ठीक इसी तरह चूंकि पैगम्बर कोई नहीं इसलिए चमत्कार दिखाने की जरूरत नहीं ।

आपने यह सवाल तो किया कि चमत्कार दिखाने की अब ताकत क्यों नहीं मगर यह न सोचा कि पहले जो ताकत थी वह किन को थी ? आज पंडित जी होते तो हम उनसे पूछते कि बताइए आपके जीवन में तो आर्य समाज को वेदों की टीका लिखने की ताकत अब क्यों नहीं ? क्यों आप ही की लकीर के फकीर बने हुए हैं क्यों आपके पौने दो वेदों की टीका को पूरे दो भी नहीं कर दिखाते लाला साहब ।

इससे अधिक जानकारी के लिए तफसीर सनाई तीसरा भाग देखें । बाइबिल के होते कुरआन की जरूरत के बारे में हम पहले वाक्य 05 में लिख आए हैं । और सुनिए आप ही के शब्दों में सुनाते |
"ईश्वर का ज्ञान असीम है या नहीं ? तो फिर काम के लिए ? यदि कहो कि अपने ही लिए ले ली है तो क्या ईश्वर उपकार नहीं करता । तुम यह कहोगे करता है फिर इससे क्या ? इससे यह कि ज्ञान अपने लिए होता है और दूसरों के लिए भी क्योंकि इसके यही दो उद्देश्य हैं । यदि ईश्वर उपदेश न देता तो ज्ञान का दूसरा उद्देश्य अपनी मौत मर जाता । इसलिए ईश्वर ने अपने ज्ञान (कुरआन मजीद)_1 के उपदेश से इस दूसरे मतलब को पूरा किया है परमेश्वर बड़ा दयावान है यदि ऐसा न करता तो सदैव अज्ञानता का सिलसिला स्थापित रहता और मनुष्य धर्म, अर्थ काम, मोक्ष की प्राप्ती से वंचित रहकर परम आनन्द न पा सकता ।"
(वृग वेद आदि भाषा भूमिका पृष्ठ - 8 ) 

बताइए यदि कुरआन न आता तो अरब जैसे लड़ाकू वहशी और बहुदेव वाद से लिप्त देश को कौन पथ प्रदर्शन करता । वेद दानव को तो वह रास्ता भी मालूम न था वह गैरों को पथ प्रदर्शित करके अपने में मिलाते थे । न वेद में यह कशिश थी कि गैरों को खींच लेता जिसका पक्का सबूत है कि आपके कथना नुसार 2 अरब साल वेद को बने हो गए आज तक कहीं किसी देश में हिन्दुस्तान के अलावा कोई भी इस का नाम लेने वाला नहीं कोई इतना भी तो नहीं जानता । 
अभी इस राह से गुजरा है कोई 
कहे देती है शोखी नक्शे पा की
तौरात, इंजील वालों का हाल यह था कि एकेश्वरवाद की बजाए तसलीस (तीन ईश्वरों का अकीदा) में आज तक डुबे हुए हैं । सुनिए
 कुरआन अपने बयान में विवश नहीं है वह अपनी वजह बताता है । वेद की तरह "मुरीदां हमें परानन्द” का मोहताज नहीं । ईश्वर अरबों को संम्बोध करके फरमाता है कि । 
अरबी में कुरआन इसलिए उतारा है ताकि तुम न कहने लगो कि हम से पहले लोगों पर किताब उतरी थी और उनकी तालीम से अनभिज्ञ थे ।
(अन्नाम : 155)
निश्चय ही उनको बन्दर बनाया था झूठ क्यों होता । मगर ऐसे नहीं कि आपको आवागमन की सूझे बल्कि उनके इसी शरीर को जिसमें वे थे बन्दर बना दिया था न कि सामान्य तरीके मां के गर्भ में जाकर जैसे वेदिक मत वाले बनते हैं और कहते हैं । विस्तार से देखो रिसाला बहस तनासुख में । 

  1. स्वामी जी की तहरीर में वेद है।

*(प्रश्नसृष्टि की आदि में एक वा अनेक मनुष्य उत्पन्न किये थे वा क्या?

(उत्तरअनेक। क्योंकि जिन जीवों के कर्म ऐश्वरी सृष्टि में उत्पन्न होने के थे उन का जन्म सृष्टि की आदि में ईश्वर देता है। क्योंकि मनुष्या ऋषयश्च ये। ततो मनुष्या अजायन्त’ यह यजुर्वेद में लिखा है। इस प्रमाण से यही निश्चय है कि आदि में अनेक अर्थात् सैकड़ों, सहस्रों मनुष्य उत्पन्न हुए । और सृष्टि में देखने से भी निश्चित होता है कि मनुष्य अनेक माँ बाप के सन्तान हैं।

सत्यार्थ प्रकाश समुल्लास 8

प्रश्न

यहां पर एक प्रश्न और मन में उठता है कि स्वाम जी ने लिखा है कि "मनुष्या ऋषयश्च ये। ततो मनुष्या अजायन्त" यह मंत्र यजुर्वेद में लिखा है। लेकिन स्वामी जी ने इसका पूर्ण प्रमाण नही लिखा। और महत्वपूर्ण बात ये है कि आज तक इसका सही प्रमाण मिल भी नही पाया है। आज तक किसी भी आर्य समाजी ने इस मंत्र को यजुर्वेद में नही पाया है। तो क्या यह मान लिया जाए कि स्वामी जी ने यह मंत्र मन से बना लिया है ? और लोगों(आर्य समाजियों) को बेवकूफ बना दिया है? और यह बहुत से जवान जवान लोगों के पेड होने की बात कोरी कल्पना है ?



आपत्ति नंबर 13
क़ुरआन सूरह बकरा
आयत : 48
उस दिन से डरों कि जब कोई आत्मा किसी आत्मा पर भरोसा न रखेगी न उसकी सिफारिश कुबूल की जाएगी न उससे बदला लिया जाएगा और न वे मदद पावेंगे ।_1
     (आयत : 48) 

 आपत्ति - 13

क्या मौजूदा दिनों में न डरें । बुराई करने से सदैव डरना चाहिए जब सिफारिश न मानी जाएगी तो फिर यह बात कि पैगम्बर (दूत) की गवाही या सिफारिश से ईश्वर जन्नत देगा, किस तरह सच हो सकेगी ? क्या ईश्वर जन्नत वालों ही का मददगार है । जहन्नम वालों का नहीं ? यदि ऐसा है तो ईश्वर पक्षपाती है । 

आपत्ति का जवाब

स्वामी जी ! अनादर कर रहा हूं क्षमा करें . . . . . . बुद्धि शायद काम नहीं करती आपकी । “किसी दिन से डरना" और "किसी दिन में डरना” इन दोनों वाक्यों में अन्तर है । आपको कौन कहता है कि उस दिन से मौजूदा दिनों में न डरें । ईश्वर आपको भलाई प्रदान करे क्योंकि बुराई करने से सदैव डरना चाहिए । 

पंडित जी ! “से" का शब्द जज़ा पर आया है अतएव आपने भी । बुराई करने से लिखा है चूंकि मुसलमानों के निकट पूर्ण सजा व इनाम उस दिन में होगी । इसलिए कहा गया कि उस दिन से डरो । जिसके साफ मायना हैं कि बुराई करने से डरो ! स्वामी जी ! | 
मैं इलज़ाम उनको देता था कुसूर अपना निकल आया

इसलिए हम बार बार कहते हैं कि कुरआन को भी किसी अरबी पाठशाला में रहकर पढ़ लेते तो तस्वीर का रुख दूसरा होता । 

सिफारिश चूंकि ईश्वर की अनुमति के बिना नहीं होगी अर्थात किसी नबी, वली का व्यक्तिगत हक या लिहाज नहीं होगा कि अपराधी की सिफारिश करे । जब तक ईश्वर उसे खास अनुमति न दे । इसलिए यह कहना पूरी तरह मुनासिब है कि किसी की सिफारिश स्वीकार न होगी अर्थात कोई सिफारिशी, सिफारिश ही नहीं करेगा । 
"खूब कही . . . जहन्नम वालों का हामी नहीं तो तरफदार है।"
(सूरह निसा - 35)

स्वामी जी को औरों की तो क्या याद होती ऐसे भोले हैं कि अपनी | भी भूल जाते हैं । सुनिए....
मेरा आशीर्वाद उन्हीं लोगों के लिए है जो सद कर्म और भले हैं न उनके लिए जो जनता के लोगों पर अत्याचार करने वाले हैं । मैं दुराचारी अत्याचारियों को कभी । आशीर्वाद नहीं देता ।

समाजियो ! बताओ परमेश्वर पक्षपाती है या नहीं ? 
                   
हाथ ला उस्ताद क्यों कैसी रही । 
 

Saturday, 30 May 2020

आपत्ति नंबर 12
क़ुरआन सूरह बक़रह
आयत : 35-37
और कहा हमने ऐ आदम तू और तेरी पत्नी जन्नत में रहकर खाओ तुम आराम से घूमों जहां चाहो और मत निकट जाओ उस पेड़ के कि पापी हो जाओगे । शैतान ने उनको गुमराह किया और उनको जन्नत के सुख वैभव से खो दिया । तब हमने कहा कि उतरो तुम में कुछ तुम्हारे दुश्मन हैं और तुम्हारा ठिकाना धरती पर है और एक समय तक फायदा है अतः सीख लीं आदम ने अपने पालनहार से कुछ बातें तो वह धरती पर आ गया ।
(आयत : 35-37 ) 
आपत्ति - 12 

देखिए खुदा का अल्पज्ञान अभी तो जन्नत में रहने की दुआ दी और अभी कहा कि निकलो । यदि आगे की बातों को जानता होता तो दुआ ही क्यों देता ? और मालूम होता है कि बहकाने वाले शैतान को सजा देने से विवश भी है । वह पेड़ किसके लिए पैदा किया था ? क्या अपने लिए या दूसरे के लिए । यदि दुसरों के लिए तो क्यों आदम को रोका ? इसलिए ऐसी बातें न अल्लाह की और न उसकी बनाई हुई किताब की हो सकती हैं ।

आदम साहब ईश्वर से कितनी बातें सीख कर आए थे ? और जब धरती पर आदम साहब आए तो किस तरह से आए, क्या वह जन्नत पहाड़ पर है या आसमान पर ? इससे क्यों कर उतरे क्या पक्षी की तरह उड़कर या पत्थर की तरह गिर कर ?

यह स्पष्ट होता है कि जब आदम साहब खाक से बनाए गए तो उनकी जन्नत में खाक होगी और जितने वहां फरिश्ते आदि हैं वे भी खाक ही होंगे क्योंकि खाक के शरीर बिना अंगों के नहीं बन सकते और ख़ाकी शरीर होने के कारण मरना भी निश्चित होगा । यदि वहां मौत होती है तो वहां से मौत के बाद कहां जाते हैं ? और यदि मौत नहीं होती तो उनका जन्म भी नहीं होना चाहिए । जब जन्म है तो मौत भी जरूरी है ऐसी सूरत में कुरआन का यह लिखना कि बीवियां सदैव जन्नत में रहती हैं झूठा हो जाएगा क्योंकि उन्हें मरना भी होगा । जब यह हालत है तो जन्नत में जाने वालों की भी मौत अवश्य होगी । 

आपत्ति का जवाब

स्वामी जी ! देखिए आपका अल्पज्ञान - कि अनुमति को आप दुआ समझे बैठे हैं । ऐ साहब ! जो शब्द कुरआन में इस बारे में आया है वह सम्बोधन करने का कलिमा है जिसका अर्थ है रहों जन्नत में फिर इसी के साथ फ़रमा दिया कि उस पेड़ के निकट न जाना वर्ना तुम अवज्ञाकारी हो जाओगे जिससे स्पष्ट रूप से यह नतीजा निकलता है कि यह आदेश वैसा ही है जैसा परमेश्वर की ओर से आपको हुक्म होता है कि मैंने तुमको कर्म जूनी (अमल का घर) मानव ढांचा दिया है इसमें रहना और दुराचार व बदकारी न करना वर्ना तुम बन्दर और सुअर बनाए जाओगे । अतएव बहुत से आर्यों को वह दिन देखना नसीब होता है । कहिए क्या परमेश्वर को ज्ञान नहीं है ? जन्नत निस्संदेह किसी समतल मकान पर होगी शायद वहां ही हो जहां पर जीव आत्मा (आप ही के कथना नुसार) मुक्ति के बाद रहती है । देखो सत्यार्थ प्रकाश अध्याय न0 9

हैरत है आप पूछते हैं कि आदम को कितनी बातें सिखायीं भोले पंडित जी ! सारी बातें जिनकी मानव जाति को जरूरत है सिखाय कुरआन में 'कल्हा' का शब्द देखिए स्वामी जी के टेढ़े सवाल देखिए कि आदम जमीन पर किस प्रकाईश्वर की रक्षा में आए । यदि अधिक कुरेदो तो सुनो ।

जिस प्रकार गुब्बारे बाज़ उतर आते हैं इसी तरह भी उतरना संभव है । जज किसी अपराधी को दंड देने से तब विवश हुआ करता है कि उसके दंड का समय आ चुका हो और पकड़ न सके और यदि समय पर नहीं पहुंचा तो समय से पहले विवश कहना आपकी बुद्धि व समझ का दोष है वर्ना बताइए सुलतान महमूद गज़नवी और मुहम्मद गौरी ने इतने कम समय में उन्होंने हिन्दुस्तान की काया पलट दी । परमेश्वर ने उन्हें सजा क्यों न दी । बेशक जो खाकी (मिट्टी की) चीज़ है वह एक दिन नष्ट भी हो सकती है लेकिन यदि ईश्वर की ओर से उसकी कमी की पूर्ति होती रहे_2 और ईश्वर उसकी मौत न चाहे तो कोई जरूरी नहीं कि धींगा धेगी मर ही जाए जबकि हम देखते हैं कि कुछ आदमी एक दिन बल्कि एक सांस का जीवन बिताकर ही चल देते हैं और कुछ सौ साल से ऊपर हो जाते हैं तो यह अन्तर हमें सचेत करता है । कि उनकी मौत की तारीख परमेश्वर के हाथ में है अतः इसी तरह जन्नतियों की मौत की तारीख अल्लाह ने असीम जमाना पर डाल दी हो या बिल्कुल मौत को उनसे उठा ही दिया हो तो क्या खराबी है ? 


1 - दैनिक आहार जो खाया जाता है यह आहार मनुष्य के अंगों में मिल कर बदल बनती इसी को भी की पूर्ति करते हैं ।

आपत्ति नंबर 11
क़ुरआन सूरह बक़रह
आयत : 34
जब हमने फ़रिश्तों से कहा सज्दा करो आदमी को तो सबने सज्दा किया पर शैतान ने न माना और घमंड किया क्योंकि वह भी एक काफिर था ।
(आयत : 34) 
आपत्ति - 11

इससे साबित हुआ कि ईश्वर सर्वज्ञाता नहीं अर्थात अतीत, वर्तमान और भविष्य की बातें पूरे तौर पर नहीं जानता तो शैतान को पैदा ही क्यों किया ? और ईश्वर में कुछ प्रताप व तेज भी नहीं है क्योंकि शैतान ने उसका आदेश ही न माना और ईश्वर उसका कुछ भी न कर सका और देखिए एक काफ़िर शैतान ने ईश्वर के भी छक्के छुड़ा दिए । मुसलमानों की नज़र में जहां करोड़ों काफिर है । वहां मुसलमानों के खुदा और मुसलमानों की थोड़ी बहुत चल सकती है ? कभी कभी ईश्वर भी किसी की बीमारी बढ़ा देता है और किसी को । भटका देता है । ईश्वर ने यह बातें शैतान से सीखी होगी और शैतान ने ईश्वर से । क्योंकि सिवाए ईश्वर के शैतान का उस्ताद और कोई नहीं, हो सकता । 

आपत्ति का जवाब

भोले पंडित जी ! किस आयत से मालूम हुआ कि खुदा को पता नहीं । यदि शैतान के पैदा करने से ईश्वर बे इल्म साबित होता है तो परमेश्वर ने जैनियों को क्यों पैदा किया ? जो आपके कथनानुसार मूर्ति पूजा को आरंभ करने वाले हुए जिनके बारे में सत्यार्थ प्रकाश में आप लिखते हैं ।
   
मूर्ति पूजा का जितना झगड़ा चला है वह सब जैनियों के घर से निकला है और पाखन्डियों की जड़ यही जैन धर्म है।

और सुनिए - ईश्वर ने गाजी महमूद को क्यों पैदा किया जिसने आर्यव्रत की काया पलट दी ? और बताइए ईश्वर ने पुरानों के लेखकों को क्यों पैदा किया जिन्होंने (आपके कथनानुसार) सारे पुरान गप्पों से भरकर आर्यव्रत को गुमराह कर दिया । 
और सुनिए . . . . . . . ईश्वर ने मुसलमान क्यों बनाए कि वेदिक धर्म का सारा ताना बाना ही बिखर कर रह गया । जब आप इन सवालों के जवाब देंगे तो हम भी बताएंगे कि शैतान को क्यों पैदा किया ? 

असल बात यह है कि शैतान किसी की गुमराही के लिए कोई तर्क या कारण नहीं है बल्कि वह केवल एक बुरे सलाहकार की तरह बुरे विचारों और कामों का सुझाव देने वाला और लुभाने वाला है । अतएव उसका यह बयान पूरे का पूरा कुरआन में मौजूद है तनिक ध्यान से सुनिए ।

 
मेरा तुम पर जोर न था मैंने केवल तुमको बुलाया था । तुमने कुबूल कर लिया ।
(सूरह इब्राहीम 22)

जैसे दुनिया में और बहुत सी बुरी संगतें होती हैं ऐसे ही शैतान भी एक बुरा साथी है इससे अधिक कुछ नहीं । इस बुरी संगत के प्रभाव से बचने के लिए ईश्वर ने एक इलाज बताया है बड़ा ही शक्ति शाली जो हकीकत में बड़ा प्रभावी है वह है अल्लाह का जिक्र (गुण गान करना) अतएव क़ुरआन में इसका भी उल्लेख है - अर्थात 
ईश्वर के भले बन्दों पर शैतान का कोई दावं नहीं चल सकता । जो लोग अल्लाह के जिक्र में समय गुजारते हैं । और बुरे कामों से बचते हैं शैतान उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकता । हां जो लोग बेहूदा बकवास और बुरी संगत में समय नष्ट करते हैं उन्हीं पर शैतान अपना जोर चला पाता है।
 (सूरह हिज्र)

(सत्यार्थ प्रकाश पृष्ठ 541 को ज़रा ध्यान से पढ़े) अतः शैतान का उदाहरण बिल्कुल विष का सा समझो । जैसा कि ईश्वर ने विष पैदा करके उसका इलाज भी बता दिया है । ऐसा ही शैतान पैदा करके उसका प्रभाव बताकर इलाज (तौबा और रसूल का अनुसरण) बता दिया है । शैतान की विस्तार से बहस की जानकारी के लिए तफसीर सनाई भाग 1 हाशिया खतमुल्लाह में देखें । 
हां याद आया कि दुनिया में इस समय करोड़ों मुसलमान, करोड़ों ईसाई, बौद्ध, यहूदी आदि कौमें ईश्वर के ज्ञान (वेद) को नहीं मानते बल्कि उसे मूर्ति का स्त्रोत जानते हैं तो परमेश्वर कैसा विवश हैं कि इनको सीधा नहीं कर सकता । उसके तेज में कोई फर्क तो है । आखिर किस किस से बिगाड़े और किस किस को पकड़े ? | 
स्वामी जी ! जीव आत्मा अपनी इच्छा की मालिक है (देखो सत्यार्थ प्रकाश , अध्याय 7 - पृष्ठ 48) धार्मिक मामलों में ईश्वर ने छूट दी हुई है जिसका जी चाहे आज्ञा पालक हो जो चाहे न हो, सुनो ! कुरआन मजीद बताता है । 
जो चाहे ईमान लाए और जो चाहे काफ़िर बने।
(सूरह कहफ़ - 29)
अतः एक शैतान क्या सामान्यता दुनिया के सारे काफिर इस समय खुदा की किताब पर मुंह चिढ़ाते हैं मगर वह सब को सुख शान्ति और आराम देता है लेकिन बकरे की मां कब तक खैर मनाएगी खुदा के गुमराह करने और बाकी शैतानी बातों के जवाब नंबर 6 में देखो ।

Wednesday, 27 May 2020

आपत्ति नंबर 10
क़ुरआन सूरह बकरा
आयत : 32-34
आदम को सारे नाम सिखाए फिर फ़रिश्तों के सामने करके कहा । जो तुम सच्चे हो मुझे इनके नाम बताओ । कहा ऐ आदम बता दे उनको नाम उनके । तो जब बता दिए उनके नाम तो ईश्वर ने फरिश्तों से कहा कि क्या मैंने तुम से न कहा था कि निस्संदेह मैं धरती और आकाश की छुपी चीजें और जाहिर और गायब कर्मों को जानता हूं ।
(आयत : 32-34)
आपत्ति - 10

भला इस तरह फरिश्तों को धोखा देकर अपनी बड़ाई करना ईश्वर का काम हो सकता है ? यह तो एक धब्बे की बात है, इसे कोई विदान मान नहीं सकता और न ऐसा मजाक व बकवास कर सकता है । क्या ऐसी बातों से ईश्वर अपनी करामात जमाना चाहता है ? हां जंगली लोगों में कोई कैसा ही पाखंड चला ले तो चल सकता है । सुशील व सज्जन लोगों में नहीं । 

आपत्ति का जवाब 

स्वामी जी को असल मतलब से तो कोई लेना देना है नहीं मगर अपने पाठकों को इस आयत का मतलब बताते हैं वह यह है कि ईश्वर ने हज़रत आदम को पैदा करने और दुनिया में खलीफा (अपना नायब) बनाने की फरिश्तों को सूचना दी । फ़रिश्तों ने अपनी इच्छा को गुप्त रख कर कुछ विनती की जिसका मतलब यह था कि हम खिलाफत के पद के हकदार हैं क्योंकि हम तेरी उपासना में लगे रहते हैं और दिल में यह बात भी रखी कि हम को सब_1 चीजों का ज्ञान भी है जो खिलाफत के लिए जरूरी भी है चूंकि यह दावा उनका गलत न था इसलिए अल्लाह ने उनकी परीक्षा लेने हेतु ।

आदम को सारी चीजों का ज्ञान (नाम एवं गुण) प्रदान किया जिस प्रकार ईश्वर ने 
प्रथम सृष्टि की आदि में परमात्मा ने अग्नि, वायु, आदित्य तथा अंगिरा इन ऋषियों के आत्मा में एक-एक वेद का प्रकाश किया।
[सत्यार्थ प्रकाश सातवां समुल्लास पेज 234, वैदिक पुस्तकालय, दयानन्द आश्रम, अजमेर संस्करण 2005]
इसके बाद फ़रिश्तों से उनके दावे की पुष्टि कराने को उन सब चीजों के नाम पूछे वे न बता सके । अन्त में अपने दोष को स्वीकारे । यह बात पूरी तरह साफ है मगर स्वामी जी न समझे तो किस की गलती ? अफसोस स्वामी जी हर बार अपना उसूल भूल जाते हैं ।
जो धर्म दूसरे धमाँ को, कि जिनके हजारों करोड़ों आदमी श्रद्धालु हों झूठा बता दे और अपने को सच्चा ज़ाहिर करे उससे बढ़कर झूठा और धर्म कौन हो सकता।
(पहले पैराग्राफ की पांचवी लाइन से पढ़ें)


  1. विस्तार से जानने के लिए तफसीर सनाई देखो ।

आपत्ति नंबर 9
क़ुरआन सूरह बकरा
आयत : 25
और शुभ सूचना दे उन लोगों को कि ईमान लाए और काम किए अच्छे यह कि वास्ते उनके जन्नत हैं बहती हैं नीचे से नहरें । जब दिए जाएंगे उसमें से मेवों से अजीविका खाएगे । यह वह चीज है जो दिए गए थे हम पहले उससे और वारते उनके पत्नियां हैं सुथरी और सदैव वहां रहने वाली हैं ।
(आयत: 25)
आपत्ति - 9 

भला इस कुरआन की जन्नत में दुनिया से बढ़कर कौन सी अच्छी वस्तु हैं ? जो वस्तुएं दुनिया में हैं वही मुसलमानों की जन्नत में हैं और इतनी अधिक हैं कि यहां जैसे आदमी मरते हैं और पैदा होते और आते जाते हैं इसी तरह जन्नत में नहीं मगर यहा औरतें सदैव नहीं रहतीं और वहा बीबियां सदैव रहती हैं । जब तक कयामत की रात_1 न आएगी तब तक उन बेचारियों के दिन किस प्रकार गुजरते होंगे, हा ईश्वर की उनपर कृपा होती होगी और ईश्वर के सहारे समय गुजारती होंगी । यही ठीक हो सकता है मुसलमानों की जन्नत यद्यपि कलिए गोसाइयों के गोलोक मन्दिर की तरह मालूम होती है जहां कि औरतों का आदर सम्मान बहुत अधिक है आदमियों का_2 नहीं । इसी प्रकार ईश्वर के घर में औरतों का महत्व है और उनसे ईश्वर की मुहब्बत भी पुरूषों के मुकाबले अधिक है क्योंकि ईश्वर ने बीवियों को जन्नत में सदैव के लिए रखा है न कि पुरुषों को । वे बीबियां बिना ईश्वर की इच्छा व अनुमति जन्नत में कैसे ठहर सकती हैं ? यदि यही बात है तो ईश्वर भी औरतों में उलझा हुआ है ।

आपत्ति का जवाब

स्वामी जी ! जिस कलाम को आदमी न समझे उस पर आपत्ति करने से नदामत होती है । आप स्वयं भूमिका में गैर धर्म पर सोच विचार अत्यन्त आवश्यक बता आए हैं क्या वह औरों के लिए है आपके लिए नहीं ? हम ने तो जितनी आपत्तियां आपकी देखी हैं उनसे यही साबित होता है कि आप स्वयं इस उसूल का अपवाद हैं । जन्नत में सब कुछ आराम और हर प्रकार के सुख वैभव (परन्तु सभ्य तरीके का) के सामान अल्लाह की ओर से होंगे । आप उसे दुनिया का सा समझते है क्या आपने गुरू नानक जी का कथन भी नहीं सुना . . . . . . "नानक दुखया सब संसार” फिर आम दुनिया को जन्नत की तरह समझें तो इसमें किसकी गलती है ? 

स्वामी जी ! दुनिया में कोई व्यक्ति भी किसी हालत में सुखी और ऐशो आराम में नहीं हो सकता । कोई न कोई दुख, कष्ट उसे लगा ही रहता है । माल से हो सन्तान से हो , दोस्तों से हो या शत्रुओं से हो, शारीरिक हो या आध्यात्मिक, मगर जन्नत में पूरी तरह सुख ही, सुख होगा । सुनो 
"न जन्नत में कोई तकलीफ होगी और न उससे बाहर किए जाएंगे।" 
(सूरह हिज्र - 48) 

उन बेचारियों की चिंता तो जब करते कि कुरआन की किसी आयत से दिखाते कि वे अभी से पैदा भी हो चुकी हैं और पतियों की चाहत में व्याकुल हैं । 
स्वामी जी ! झूठ बोलना हर धर्म में बुरा है । पुरूषों से महिलाओं का कम महत्व कौन सी आयत से आपने समझा है इसी ज्ञान के बल पर आप स्वामी बने हैं कि आपको इतनी भी खबर नहीं कि कुरआन में पुल्लिंग का कालिमा आया है अर्थात "खालिदून" जिसका अर्थ है नेक मर्द सदैव जन्नत में रहने वाले होंगे । आपको किसी ने "वाले'' का शब्द "वाली" करके सुनाया तो आपके कान में वाली (बाली) पड़ गयी । अफ़सोस आप के सारे धार्मिक ज्ञान की पोल खुल गयी । कुरआन के मुहावरे में औरतें मर्दो के आदेश के तहत होती हैं अर्थात जो आदेश या हुक्म मर्दो को होता है वह औरतों को भी होता है उसके सिवा जो खास किया जाए ।

  1.  यह शब्द नहीं मालूम स्वामी जी को किस ने सिखा दिया है हर जगह यही बोलते हैं । 
  2. उर्दू जानने वाले सज्जन औरत और आदमी का मुक़ाबला ध्यान से देखें । 

Tuesday, 26 May 2020

आपत्ति नंबर 8
क़ुरआन सूरह बक़रह
आयत : 23-24
जो तुम इस वस्तु से सन्देह में हो जो हमने अपने सन्देष्टा के ऊपर उतारी तो इस जैसी एक सूरह के और अपने मददगारों को पुकारो सिवाए अल्लाह के यदि हो तुम सच्चे और कदापि न करोगे तुम उस आग से डरो कि जिसका इंधन आदमी हैं और काफिरों के लिए पत्थर_1 तैयार किए गए हैं ।
(आयत : 23-24) 

आपत्ति - 8

भला यह कोई बात है कि उसके जैसी कोई सूरह न बने ? क्या अकबर बादशाह के जमाने में मौलवी फैजी ने बे बिन्दू (नुक्ता) का कुरआन नहीं तैयार किया था । वह कौन से जहन्नम की आग है ? क्या इस दुनिया की आग से न डरना चाहिए । इस आग में भी जो कुछ पड़े वह उसका ईंधन है जैसे कुरआन में लिखा है कि काफिरों के लिए पत्थर तैयार किए गए हैं वैसे पुरानों में लिखा है किमलीछों के लिए घोर नरक बना है । अब कहिए किस की सच्ची मानें ? अपने कथनों से तो दोनों स्वर्ग में जाने वाले हैं और एक दूसरे के धर्म के अनुसार दोनों जहन्नमी होते हैं अतः इन सबका झगड़ा झूठा है हां जो धार्मिक हैं वे सुख और जो पापी हैं वे दुख पाएंगे । यह सारे धर्मों का मानना हैं । 

आपत्ति का जवाब 

शोध कर्ता व आपत्ति कर्ता को यह तो खबर नहीं कि बे बिन्दू वाक्य क्या होता है और उत्तम शैली क्या है । उन्होंने सुन लिया कि फ़ैज़ी ने बिना बिन्दू (नुक्ता) की टीका लिखी थी तो वे समझे कुरआन का मुकाबला हो गया । भला स्वामी जी ! यदि फैजी की टीका कुरआन की भान्ति बे मिसाल होती तो पहले फैजी ही को क्यों कुरआन के बारे में सन्देह न होता और वह क्यों इस घमंड में इस्लाम से विमुख न होता कि मैंने कुरआन की जैसी किताब लिख डाली है बस आपके जवाब में यही काफी है । आप मालिक हैं आप इस आग से भी डरें । कौन आप को कहता है कि न डरें । बात तो केवल यह है कि जहन्नम की आग चूंकि बहु देव वादियों और हठ धर्मियों की सजा है इसलिए उससे डरने का यह अर्थ है कि ऐसे काम छोड़ दो । यह स्वामी जी की जानकारी है । लिखते हैं कि कुरआन में काफिरों के लिए पत्थर तैयार किए गए हैं । आगे भी कई जगह स्वामी जी ने अपनी योग्यता का सबूत दिया है । जरा सोच विचार करो तो यह इस्लाम का चमत्कार है कि आप जैसे ज्ञानी भी ऐसी बहकी बहकी बातें करने लग जाते हैं । यदि क़ुरआन और पुरान की बातों पर अमल करने वाले अपने अपने कथनों से जन्नती हैं तो आप दोनों के कथनों से जहन्नमी ही होते हैं स्वामी जी ! अपनी चिन्ता कीजिए ।

"तुझको पराई क्या पड़ी अपनी नबीड" 

देखना यह है कि दोनों में से कौन हक पर है तो उसकी पहचान कीजिए बाकी बातों से क्या लाभ ? यह ठीक है कि जो पापी है वे सारे धर्मों में दुख ही पाएंगे मगर इससे अधिक पाप क्या होगा ?

"जो धर्म दूसरे धमाँ को, कि जिनके हजारों करोड़ों आदमी श्रद्धालु हों झूठा बता दे और अपने को सच्चा ज़ाहिर करे उससे बढ़कर झूठा और धर्म कौन हो सकता।
                 
(पहले पैराग्राफ की पांचवी लाइन से पढ़ें)


  1. समाजियो इस आयत का यह अनुवाद कहीं किसी ने किया हो तो हमें दिखाओ और इनाम लो ।

Monday, 25 May 2020

आपत्ति नंबर 7
क़ुरआन सूरह बकरा
आयत : 22
जिसने तुम्हारे वास्ते जमीन को बिछौना और आसमान की छत बनायी ।  
( आयत - 22 )
आपत्ति - 7

भला आसमान छत किसी की हो सकती है ? यह अज्ञानता की बात है आसमान को छत की भान्ति मानना उपहास की बात है यदि किसी और ग्रह की धरती का आसमान मानते हों तो उनके घर की बात है । 

आपत्ति का जवाब 

आसमान नीला छत की भान्ति नजर आ रहा है अरबी में हर ऊची वस्तु को जो सर से ऊपर हो सकफ कहा करते हैं । इसी आधार पर आसमान को सकफ (छत) कहा गया । स्वामी जी की बला को क्या पड़ी थी कि ऐसी तहकीक करते और उनको अपने मामूली मसखरे पन से समय भी नहीं था बाकी न0 18 में देखो।


Wednesday, 20 May 2020

आपत्ति नंबर 6
क़ुरआन सूरह बक़रह 
आयत : 10

उनके दिलों में बीमारी है। अल्लाह ने उन की बीमारी बढ़ा दी।_1
(आयत : 10) 

आपत्ति - 6

भला बिना गलती अल्लाह ने उनकी बीमारी बढ़ा दी । दया न आयी, उन बीमारों को कितनी बड़ी तकलीफ हुई होगी । क्या यह शैतान से बढ़कर शैतानियत का काम नहीं है किसी के दिल पर ठप्पा लगाना किसी की बीमारी को बढ़ाना खुदा का काम नहीं हो सकता । क्योंकि बीमारी का बढ़ना अपने गुनाहों का नतीजा हैं । 

आपत्ति का जवाब 

अल्लाह किसी के दिल पर अकारण ठप्पा नहीं लगाता । सुनिए इस कलाम के वही मायना है जो आपने सत्यार्थ प्रकाश में वेदों की बेदीनी और गुमराहों के बारे में लिख चुके हैं ।
"उन्होंने किस दर्जा अपनी जिहालत की तरक्की की है जिसका उदाहरण इसके सिवा दूसरा नहीं हो सकता । विश्वास तो यही है । कि वेद और ईश्वर से विरोध करने का उनको यही नतीजा मिला ।। 
             
(सत्यार्थ प्रकाश समुल्लास 12 पेज नंबर 333)

[और जो मांस खाना है यह भी उन्हीं वाममार्गी टीकाकारों की लीला है । इसलिये उन को राक्षस कहना उचित है परन्तु वेद में कहीं मांस का खाना नहीं लिखा । इसलिये मिथ्या बातों का पाप उन टीकाकारों को और जिन्होंने वेदों के जाने सुने विना मनमानी निन्दा की है ; निःसन्देह उन को लगेगा । सच तो यह है कि जिन्होंने वेदों का विरोध किया और करते हैं । और करेंगे वे अवश्य अविद्यारूपी अन्धकार में पड़ के सुर के बदले दारुण दुःख जितना पावें उतना ही न्यून है । इसलिये मनुष्यमात्र को वेदानुकूल चलना समुचित है ।११ 
(सत्यार्थ प्रकाश समुल्लास 12 पेज नंबर 330)
 
ऐसी ही इनकी लीला वेद , ईश्वर को न मानने से हुई । अब भी सुख चाहैं तो वेद ईश्वर का आश्रय लेकर अपना जन्म सफल करें।
(सत्यार्थ प्रकाश समुल्लास 12 पेज नंबर 334)]

और जिस को यजुरवेद अध्याय 25 मन्त्र 13 में यूं बयान किया
"जो परमेश्वर ज्ञान आदि प्रदान करने वाला और जिसकी छत्र छाया से व कृपा से वंचित होना ही मौत अर्थात निरंतर जीने मरने के चक्कर में पड़ना है ।" 

कुरआन ने तो अपनी टीका दूसरी आयत में स्वयं कर दी है । सुनिए 
"अल्लाह घमंड करने वालों की गर्दन कशों के दिलों पर मुहुर लगा देता है ।"  
(कुरआन)
बल्कि इसी आयत में एक शब्द ऐसा भी है जिसको आप ध्यान से देखते तो यद्यपि आपको आपत्ति करने का शौक है फिर भी यह शौक किसी और जगह पूरा करते । सुनिए . . . . . ।
इन्नल्लजी न क फ रू सवाउन अलैहिम अ अन्जर तहुम अम लम तुन्जिर हुम0  
[जिन लोगों ने इनकार किया उनके लिए बराबर है डराओ या न डराओ, वह मानने वाले नहीं हैं। ]  
(सूरह बकरा - 6 )

इसी का अनुवाद आपने नकल किया है । इसमें सवा उन अलैहिम सिला से बदल है यदि ज्ञान है । तो समझो या किसी अरबी पाठशाला में पढ़ो अतः आयत का अर्थ बिल्कुल स्पष्ट है कि अल्लाह के हुकमों से गर्दन कशी करने का नतीजा यह होता है बाकी जवाब वाक्य 5 में आ गया । स्वामी जी को अधिक नम्बर लेने का शौक है इसी जवाब में शैतानी बातों का जवाब भी मिलेगा ।
आपत्ति कर्ता जी ! ऋग्वेद अशटक  अध्याय 3 वरग 18 मंत्र 2 को ध्यान से देखिए जो इसके अर्थ हैं वही इस आयत के हैं यदि आप को या आपके चेलों को देखने का अवसर न मिले तो सुनिए हम बतलाए देते हैं ध्यान से सुनिए । परमेश्वर कहता है । मैं बदकार, जालिमों को कभी आशीर्वाद (भली दुआ) नहीं देता।(अर्थात उनको पथ प्रदर्शन । या अनुकम्पा नहीं करता )


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  1. पूरी आयत का अनुवाद
"उनके दिलों में (निफ़ाक़) की बीमारी है तो अल्लाह ने उनकी बीमारी को बढ़ा दिया और उनके लिए दर्दनाक अज़ाब है, इस वजह से कि वे झूठ कहते थे।" 
आपत्ति नंबर 5
क़ुरआन सूरह बकरा 
आयत : 2-7

यह किताब जिसमें शक नहीं परहेजगारी (संयम) की राह दिखाती है जो कि ईमान लाते हैं साथ परोक्ष के और स्थापित करते हैं नमाज को और उस चीज़ को जो कि हमने दी खर्च करते हैं । वे लोग जो इस किताब पर ईमान लाते हैं जो रखते हैं । तेरी ओर या तुझसे पहले उतारी गयी और विश्वास कियामत पर रखते_1 हैं । ये लोग अपने पालन हार के निर्देश पर हैं और यही हैं छुटकारा पाने वाले । निस्संदेह जो लोग काफिर हुए और उनको तेरा डराना न डराना बराबर है । वही ईमान न लाएंगे । मुहर की अल्लाह ने ऊपर दिलों के उनके और ऊपर कानों उनके और उनकी आंखों पर पर्दा है और उनके वास्ते बड़ी यातना है ।

(आयत : 2-7)

आपत्ति - 5

क्या अपने ही मुंह से अपनी किताब की प्रशंसा करना ईश्वर के धब्बे की बात नहीं । जो परहेज़गार संयमी लोग हैं वे तो स्वयं सीधी राह पर हैं और जो झूठी राह पर हैं उनको यह कुरआन राह ही नहीं दिखा सकता तो फिर किस काम का रहा ? क्या पाप और पुन और मेहनत के बिना ईश्वर अपने ही खजाने से खर्च करने देता है ? यदि देता है तो सब को क्यों नहीं देता है ? और मुसलमान लोग मेहनत क्यों करते हैं ? यदि बाइबिल, इन्जील आदि पर विश्वास रखना अनिवार्य है तो मुसलमान इन्जील आदि पर ईमान कुरआन की तरह क्यों नहीं लाते ? और यदि लाते हैं तो फिर कुरआन उतरना किस लिए ? यदि कहें कि कुरआन में अधिक बातें हैं तो क्या पहली किताब में अल्लाह लिखना भूल गया था और यदि नहीं भूला था तो कुरआन का बनाना बेकार है । हम देखते हैं कि बाइबिल और कुरआन की कुछ बातें आपस में नहीं मिलतीं और बहुत सी मिलती हैं । एक ही सम्पूर्ण किताब जैसी कि वेद है क्यों न उतारी ? क्या कियामत ही पर विश्वास रखना चाहिए और किसी चीज़ पर नहीं, क्या ईसाई और मुसलमान ही अल्लाह के निर्देशों पर चलने वाले हैं और इनमें कोई गुनहगार नहीं है ? क्या वे ईसाई और मुसलमान जो दीनदार नहीं वे मुक्ति प्राप्त कर पाएंगे और दूसरे जो दीनदार हैं वे नहीं ? क्या यह बड़ी भारी ना इन्साफी और अंधेर की बात नहीं है ? क्या जो लोग मुसलमानी धर्म को नहीं मानते उनको काफिर कहना एक तरफा डिग्री नहीं है ? यदि ईश्वर ही ने उनके दिल में और कानों में डाट लगाई और इसी कारण वे गुनाह करते हैं तो उनका कुछ भी दोष नहीं है यह दोष ईश्वर ही का है । ऐसी हालत में उनको सुख या दुख या गुनाह व सवाब नहीं हो सकता । फिर ईश्वर उनको बदला व दंड क्यों देता है ? क्योंकि उन्होंने गुनाह या सवाब अपने अधिकार से नही किया ।

आपत्ति का जवाब

अफसोस ! इस भोले पन पर जो हर घड़ी अपमान का कारण बने । स्वामी जी को इतना भी मालूम नहीं कि वेद स्वयं अपनी प्रशंसा इससे कई दर्जा बढ़कर करते हैं । सुनो 
"पवित्र करने वाले कर्मों को खोलने वाला जिसमें प्रशंसा योग्य ज्ञान का गुण है ऐसे उच्च ज्ञानों को देने वाला जो वेद का कलाम है वह समस्त कलाओं के स्वरूप से हम को सूचित करता है ।"
 (वृग वेद अंकित आर्ग मुसाफ़िर पृष्ठ 18 सितम्बर 1899 ई0)
और सुनिए ।
     
"गलती से मुक्त सम्पूर्ण ज्ञानों का स्त्रोत जो वेद शास्त्र है अपार शक्ति से परमेश्वर ने जाहिर किया ।"
(महा यज्ञ दोही पृ0 11 लेखक स्वामी जी) 

स्वामी जी मुत्तकियों (डरने वालों) के लिए पथ प्रदर्शन होने का वह मतलब है जिस मतलब से आप सत्यार्थ प्रकाश अध्याय 10 में लिखते हैं कि जिद्दी और अन्यायी को जवाब न देना चाहिए ।
"कभी विना पूछे वा अन्याय से पूछने वाले को कि जो कपट से पूछता हो उस को उत्तर न देवे। उन के सामने बुद्धिमान् जड़ के समान रहें।" 7

सुनिए, कुरआन स्वयं अपनी टीका करता है । ईश्वर कहता है 
"हम (खुदा) कुरआन को सब लोगों की बीमारियों के लिए शिफ़ा और ईमानदारों के लिए दयालुता बनाकर उतारते हैं और जालिमों (इन्कारियों) को हानि उठाने के कोई फायदा नहीं देता ।"  
(सूरह इसरा - 82 )
स्वामी जी ! यदि कोई रोगी हकीम के नुसखे और बताए हुए परहेज़ पर अमल न करे तो दोष किसका है ? सब को वह अपने खजाने से मात्र अपनी मेहरबानी से देता है । बन्दों का उस पर कोई हक नहीं । वह हकीम भी है जितना उचित समझता है देता है । सुनो
“क्या इन्कारी नहीं सोचते कि ईश्वर जिसे चाहता है आजीविका को बढ़ा देता है और जिसको चाहता है तंग कर देता है निः सन्देह इसमें बहुत सी कुदरत की निशानियां हैं ।”
 (सूरह रूम - 37)

कुरआन को यदि आपने किसी पाठशाला (मदरसा) में पढ़ा होता तो बाइबिल का सवाल न करते । सुनिए  

कुरआन मानता है कि पहले ईश्वरीय किताबें आयी हैं मगर इसी के साथ यह भी कहता है कि टेढ़ करने वालों ने इसमें टेढ़ मिला दी जो बात कुरआन सही बता दे उसे सही समझो और जो गलत कहे उसे गलत जानो । अल्लाह फरमाता है ।

"हम (ईश्वर) ने तेरी तरफ (ऐ नबी) कुरआन उतारा है जो अपने से पहली किताबों की पुष्टि करता है और उनपर रक्षक भी है। अर्थात गलत को सही से अलग करता है ।"
(सुरह मायदा 5:48)

कियामत पर ईमान का जिक्र इसलिए किया है कि जिसे आगे की सजा व इनाम का विश्वास होता है वही सद कर्म करता है और व्यभिचार से बचता है । जो निडर हो उसे क्या गरज पड़ी है कि अपने सर बला दे । ईसाई पथ प्रदर्शन पर नहीं हैं । बल्कि केवल मुसलमान वह भी भला मुसलमान जिनका इस आयत में बयान है । वही हिदायत पर है । क्या जो वेद को नहीं मानते उनको नास्तिक और अधर्मी कहना न्याय है ?
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1 - प्रिय पाठको आपत्ति कर्ता जी का अनुवाद गौर से पढ़िए जो टिटीरा और डेरा बसती की तरह हैं ।






आपत्ति नंबर 4
क़ुरआन सूरह फातिहा
आयत : 6-7

राह उन लोगों की कि नेमत की है तूने ऊपर उनके सिवा उनके जो क्रोध किया गया है ऊपर उनके और न पथ भ्रष्टों के रास्ते हम को दिखा ।
आयत : 6-7
आपत्ति - 4

जब मुसलमान लोग आवागमन और पहले किए हुए गुनाह और सवाब को नहीं मानते तो कुछ लोगों पर दयालुता करने और कुछ पर न करने से ईश्वर पक्षपाती ठहरता है क्योंकि गुनाह व सवाब के बिना दुख व कष्ट का देना केवल अन्याय की बात है और अकारण किसी पर दया और किसी पर प्रकोप की नजर करना भी उसकी प्रकृति से सुदूर है । अकारण वह दया या प्रकोप नहीं कर सकता और जब उनके पूर्व संक्षिप्त गुनाह व सवाब ही नहीं तो किसी पर दया और किसी पर प्रकोप करना यह बात ही नहीं बन सकती और इस सूरह की शरह (धर्म शास्त्र) में ये शब्द - यह सूरह ईश्वर ने मनुष्यों के मुंह से कहलवाई कि हमेशा इस तरह से कहा करें । अंकित हैं । यदि यह बात सही है तो वह ''अ ब" अक्षर भी अल्लाह ही ने पढ़ाए होंगे । यदि कहो कि बिना अक्षर जाने इस सूरह को कैसे पढ़ सकते तो सवाल यह है कि क्या हलक ही से बुलाए और बोलते गए । यदि यह बात सही है तो सारा कुरआन ही ज़बानी पढ़ाया होगा । यह समझना चाहिए कि जिस किताब में पक्षपात की बातें पायी जाएं वह किताब ईश्वर की बनाई हुई नहीं हो सकती जैसे अरबी भाषा में उतारने से अरब वालों को इसका पढ़ना आसान और दूसरी भाषा बोलने वालों को मुश्किल हो जाता है इससे ईश्वर पक्षपाती ठहरता है और जिस तरह की ईश्वर ने सारे दुनिया में रहने वाले लोगों पर न्याय की नजर से सारे देशों की भाषाओं से निराली भाषा संस्कृत में जो कि सारे देशों के लिए समान मेहनत से हासिल होती है वेदों को उतारा है ऐसी ही भाषा में यदि कुरआन उतरता तो यह आपत्ति या खराबी पैदा न होती । 

आपत्ति का जवाब

क्या ही नयी लौजिक है आपत्ति कर्ता जी ! क्या पहले कर्मों की वजह ही से दया और इनाम हो सकता है । इस जन्म के कर्मों का कोई मूल्य नहीं ? सुनिए और ध्यान से सुनिए ! इस जन्म के सदकर्म । उनके लिए इनाम का कारण बने थे । दूसरी आयत इस बात की व्याख्या करती है जहां अल्लाह ने उन इनाम पाने वालों को ईश्वर को स्वयं बताकर आपके बेकार के सवाल को हल कर दिया है । जरा सोच विचार करके पढिए । 
"जिन पर अल्लाह ने इनाम किया वे नबी और बड़े सच्चे और नेक लोग हैं ।"
( सूरह निसा - 69 )

हां यह भली सूझी कि अल्लाह ने अक्षर पढ़ाए होंगे । आपत्ति कर्ता जी के भोले भाले बच्चों के से सवाल सुनकर आप से आप हंसी आती है फिर जब ऐसे व्यक्ति को एक कौम का लीडर सुनते हैं तो तुरन्त जबान से निकलता है ।

बुत भी खुदाई करते हैं कुदरत खुदा की है।

स्वामी जी ! जिस तरह वेद आपके ऋषियों को बताए गए थे उसी तरह कुरआन भी मुसलमानों को सिखाया गया है । तनिक उपरोक्त मंत्र पर ध्यान दीजिए । 
निसंदेह जिस किताब में पक्षपात की बातें हो रही हों वह खुदा की नहीं होती । मगर यह तो बताइए कि शुद्र के घर का पका हुआ खाने से जो आप मना कराते हैं चाहे कैसा ही भला मानस क्यों ने हो ।
  

[प्रश्न - द्विज अपने हाथ से रसोई बना खावें , वा शूद्र के हाथ की बनाई खावें ?
उत्तर - शूद्र के हाथ से रसोई खावें क्योंकि ब्राह्मण, क्षत्रिय , वैश्यवर्णस्थ स्त्रीपुरुष विद्या पढ़ाने, राज्यपालने और पशुपालन, खेती और व्यापार के काम में तत्पर हैं और शूद्र के पात्र तथा उसके घर का पका हुआ अत्र आपत्काल के विना न खावें ।

यह किस किताब का हुक्म है ?  और यह आप की तरफदारी तो नहीं ? 
आपत्ति कर्ता जी ! अरबी भाषा में कुरआन के उतरने का कारण तो कुरआन ने स्वयं ही बता दिया है । सुनो ईश्वर कहता है । 
     
“यदि हम कुरआन को अरबी ( भाषा ) के सिवा किसी और भाषा में उतारते तो अरबी लोग कहते कि इसके आदेशों को स्पष्ट क्यों नहीं किया। कलाम गैर अरबी और सम्बोधित अरबी ।"
(हामीम सदा - 44 ) 
चूंकि कुरआन के प्रथम मुखातिब उसके अरब के लोग थे इसलिए इस भाषा में उतारा गया । उन्होंने इसे समझ कर दूसरे लोगों को समझा दिया यही एक मात्र न्याय है अन्तर केवल आपकी समझ का है ।

अधिक जानकारी के लिए यह पोस्ट पढ़ें।
क्या पवित्र क़ुरआन मात्र अरब वासियों के लिए अवतरित हुआ था ? या फिर सारी मानवता के लिए?

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स्वामी जी का कहना है कि क़ुरआन को भी किसी ऐसी भाषा मे आना चाहिए था जैसे संस्कृत आयी थी। अब संस्कृत कैसे आयी थी? यह भी स्वामी जी ने ही बता दिया है। इसी आपत्ति में लिखा है कि

"जैसे परमेश्वर ने सृष्टिस्थ सब देशस्थ मनुष्यों पर न्यायदृष्टि से सब देशभाषाओं से विलक्षण संस्कृत भाषा कि जो सब देशवालों के लिये एक से परिश्रम से विदित होती है उसी में वेदों का प्रकाश किया है, यह करता तो कुछ भी दोष नहीं होता"

सत्यार्थ प्रकाश में दूसरे स्थान पर किसी ने प्रश्न किया उसी के उत्तर में स्वामी जी ने जो उत्तर दिया वह भी इसी तरह का है।

(प्रश्न) किसी देश -भाषा में वेदों का प्रकाश न करके संस्कृत में क्यों किया?

(उत्तर) जो किसी देश-भाषा में प्रकाश करता तो ईश्वर पक्षपाती हो जाता। क्योंकि जिस देश की भाषा में प्रकाश करता उन को सुगमता और विदेशियों को कठिनता वेदों के पढ़ने पढ़ाने की होती। इसलिये संस्कृत ही में प्रकाश किया; जो किसी देश की भाषा नहीं और वेदभाषा अन्य सब भाषाओं का कारण है। उसी में वेदों का प्रकाश किया। जैसे ईश्वर की पृथिवी आदि सृष्टि सब देश और देशवालों के लिये एक सी और सब शिल्पविद्या का कारण है। वैसे परमेश्वर की विद्या की भाषा भी एक सी होनी चाहिये कि सब देशवालों को पढ़ने पढ़ाने में तुल्य परिश्रम होने से ईश्वर पक्षपाती नहीं होता। और सब भाषाओं का कारण भी है।

[वैदिक पुस्तकालय, दयानन्द आश्रम, अजमेर]
संस्करण 2005

स्वामी जी कहना ये चाह रहे हैं कि जिस तरह संस्कृत किसी भी देश की भाषा नही थी उसी तरह क़ुरआन भी ऐसी ही भाषा मे आता जो किसी देश की भाषा नही होती।

और स्पष्ट करते हैं, जब वेदों को प्रकाशित किया गया तो एक से अधिक देश थे (ऐसा स्वामी जी की बात से ही प्रतीत होता है) और उनकी अलग भाषा थी तो जब वेद प्रकाशित हुए तो वेद ऐसी भाषा मे आये जो किसी देश की भाषा नही थी अर्थात "संस्कृत" में ।

अब जब संस्कृत किसी देश की भाषा नही तो इसमें किसी देश वाले के साथ यह पक्षपात नही हुआ कि उसके देश की भाषा मे तो वेद आये और दूसरे की भाषा मे नही आये तो किसी और को तो वेद पढने में सुगमता हो और दूसरे को पढ़ने में कठिनाई हो।
इसलिए ईश्वर ने वेदों को ऐसी भाषा मे भेजा जो किसी देश की भाषा नही थी अर्थात कोई नही जानता था कि संस्कृत भाषा क्या है? 

जब कोई इस भाषा को जानता ही नही था तो फिर वेद कैसे समझे होंगे?
वेद तो छोड़िए संस्कृत सीखी कैसे होगी?
और किसने सीखी होगी? और किससे सीखी होगी? 
संस्कृत जब किसी भी देश की भाषा नही थी तो फिर क्या यह सभी देश वालों के साथ पक्षपात नही हुआ? क्या वैदिक ईश्वर को बस संस्कृत ही आती है? और किसी देश की भाषा नही आती? 
इन प्रश्नों का उत्तर कोई समाजी दे तो बड़ी कृपा हो जाये।


Tuesday, 19 May 2020

आपत्ति नम्बर 3
क़ुरआन सूरह फातिहा 
आयत : 4-5

खुदावन्द दिन न्याय का तेरी ही उपासना करते हैं हम और तुझी से मदद चाहते हैं हम, दिखा हमें सीधी राह दिखा।
 (आयत : 4-5)
आपत्ति - 3

क्या ईश्वर सदैव न्याय नहीं करता । किसी विशेष दिन न्याय करता है तो अंधेर की बात है । उसी की उपासना करना और उसी से मदद चाहना यह तो ठीक है लेकिन क्या बुरी बात में मदद का चाहना ठीक है और सीधा रास्ता क्या केवल मुसलमानों ही का है ? या दूसरों का भी । सीधे रास्ते को मुसलमान कुबूल क्यों नहीं_1 करते ? क्या सीधा रास्ता बुराई की तरफ का तो नहीं चाहते ? यदि अच्छी बातें सब की सब समान हैं तो फिर मुसलमानों में कुछ विशेषता न रही और यदि दूसरों की अच्छी बातें नहीं मानते तो पक्षपाती हैं । 

आपत्ति का जवाब

ईश्वर सदैव न्याय करता है । कुरआन को पढ़ो तो मालूम हो_2 कुरआन का स्पष्ट इर्शाद है । 
"जो तुम्हें मुसीबत पहुंचती हैं तुम्हारे अपने कर्मों के कारण"
(शूरा - 30) 
         
उसे न्याय का दिन इसलिए कहा कि उस दिन का न्याय सब लोग अपनी आंखों से स्वयं देखेंगे और कोई झूठा उसे झुठला न सकेगा ।
फ ब स रू कल यवमा हदीदुन_3
(सूरह काफ - 22) 

इसे बड़े ध्यान से पढ़ो ।

बुरे कामों में ईश्वर से मदद मांगने का उल्लेख नहीं। यह तो आपकी समझ का फेर है बल्कि भले कामों में ईश्वर से मदद मांगी गयी है, अतएव इस जगह उपासना का सलीका भी मौजूद है, हां स्वामी जी वेद भगवान की तरह चाहते होंगे कि शारीरिक इच्छाओं के (वे भी ऐसी कि असंभव सी हों) पूरा होने की दुआ क्यों नहीं सिखायी ।
  
ऐ भगवान ! आपकी कृपा से हमारी समस्त मनोकामनाएं सच्ची या पूरी हों अर्थात हमारा संसार को वर्शभूत करने और मान व प्रताप हासिल होने की इच्छा पूरी हो प्रभावहीन न हो । 

और सुनिए . . . . . . ।
"ऐ विराट सर्व शक्तिमान ईश्वर, अपनी कृपा से मुझ तुच्छ प्राणी की मुक्ति की इच्छा पूरी करा मुझे सारे सुख या सारे संसार की हुकूमत प्रदान कर ।"

आपत्ति कर्ता जी ! यदि सारे संसार के लोग यही दुआ मांगे कि मुझे दुनिया की हुकूमत  प्रदान कर तो सब की कुबूल हो गयी तो क्या होगा । क्या यह सोचा है ? 

स्वामी जी ! निस्सन्देह इस्लाम ही सीधी और सही राह है । क्या वेदिक मत के सिवा दूसरा कोई धर्म सीधा नहीं जो सत्यार्थ प्रकाश समुल्लास 11 पेज नंबर 255 पर लिख आए हैं कि वेद का इन्कारी नास्तिक और अधर्मी है सच्चाई का रास्ता सदैव एक ही होता है । हम सब धर्मों की अच्छी बातें मानते हैं । किसी धर्म की अच्छी बातों से इन्कार नहीं । मगर आप को मालूम नहीं कि धर्म किस चीज का नाम है शेष मामूली आचरण तो हर धर्म में बराबर मिलते हैं । यदि अपने ही धर्म को सही समझना पक्षपात है तो आप अव्वल दर्जा पक्षपाती हैं जो लिखते हैं ।

"यदि कोई कहे कि तुम्हारा अकीदा क्या है तो यही जवाब देना चाहिए कि हमारा विश्वास वेद है अर्थात जो कुछ वेदों में बयान किया गया है हम उसको मानते हैं"

[ देश निकाले और जाति से बाहर करने का हुक्म भी स्वामी दयानंद जी दे कर गए हैं-
जो वेद और वेदानुकूल आप्त पुरुषों के किये शास्त्रें का अपमान करता है उस वेदनिन्दक नास्तिक को जाति, पङ् क्ति और देश से बाह्य कर देना चाहिये।


यही बात आगे भी है 
जो कोई मनुष्य वेद और वेदानुकूल आप्तग्रन्थों का अपमान करे उस को श्रेष्ठ लोग जातिबाह्य कर दें। क्योंकि जो वेद की निन्दा करता है वही नास्तिक कहाता है।


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  1. महाराज बड़े ही पापी हैं ।
  2. जो कुछ तुम को मुसीबत पहुंचती है तुम्हारी करतूतों ही के कारण ।
  3. अपराधियों की ज्योति (आंख की रोशनी) उस समय तेज होगी । 
  4. यह मुंह और मसूर की दाल ।

Monday, 18 May 2020


आपत्ति नंबर 2
क़ुरआन सूरह फ़ातिहा 
आयत : 2

       
"सारी प्रशंसा वास्ते अल्लाह के जो सारे जगत का पालनहार क्षमा करने वाला कृपालू है"
                                                                    (आयत : 2)
आपत्ति - 2

यदि कुरआन का अल्लाह दुनिया का पालनहार होता और सब पर दया और क्षमा किया करता तो दूसरे धर्म वालों और हैवानात आदि को भी मुसलमानों के हाथ से कत्ल का आदेश न देता । यदि क्षमा करने वाला है तो क्या पापियों पर भी दया करेगा ? और यदि करेगा तो आगे जिक्र आएगा कि "काफिरों को क़त्ल करो” अर्थात जो कुरआन और पैगम्बर को न मानें वही काफिर है । ऐसा क्यों कहता ? इसलिए कुरआन अल्लाह का कलाम साबित नहीं होता ।

आपत्ति का जवाब 

इस वाक्य में आपत्ति कर्ता स्वामी जी ने जिहाद की ओर इशारा किया है और अपनी आदत के अनुसार आगे भी कई एक अवसर पर इशारा करेंगे इसलिए उचित मालूम होता है कि जिहाद की हकीकत वेद और कुरआन से इसी जगह स्पष्ट कर दी जाए और आगे आने वाले अवसरों पर इसी जगह के हवालों से काम लिया जाए । स्पष्ट रहे कि वेद और वेद के अलावा मनुस्मृति आदि में जिनको स्वामी जी प्रमाणिक और विश्वसनीय मानते हैं जिहाद के बारे में विभिन्न प्रकार के निर्देश मिलते हैं । 

वेद की पहली हिदायत जंग में काम आने वाले हथियारों को ठीक करने के बारे में है जो ऋग्वेद मंडल प्रथम सूक्त 39 मन्त्र 2 में लिखा है । 

 "ऐ आज्ञा पालक लोगों ! तुम्हारे हथियार अग्नि आदि तोप व भाले, तीर व तलवार आदि शास्त्र विरोधियों को पराजित करने और उनको रोकने के लिए प्रशंसनीय और सट्टढ़ हों । तुम्हारी सेना सतर्क व होशियार हो ताकि तुम सदैव विजयी होते रहो ।"
एक और स्थान पर दुआ यूं लिखी हुई है ।

 "मैं उसका रक्षक कायनात के स्वामी मान एवं प्रताप वाले अत्यन्त बलवान और विजयी सारी कायनात के राजा सर्व शक्तिमान और सबको शक्ति प्रदान करने वाले परमेश्वर को जिसके आगे समस्त ज़बरदस्त बहादुर आज्ञा पालक सर झुकाते हैं । और जो न्याय से प्राणियों की रक्षा करने वाला इन्द्र है । 
"हर जंग में विजय पाने के लिए आमन्त्रित करता हूं और शरण लेता हूं।”

एक जगह परमेश्वर दुआ देता है ।
"ऐ मनुष्यो ! तुम्हारे हथियार अर्थात तोप बन्दूक_1 आदि अग्नि धावक शस्त्र और तीर व कमान तलवार आदि हथियार मेरी कृपा से शक्ति शाली और साहस वर्धक कार्य वाले हो तुम दुश्मनों की सेना को पराजित करके उन्हें पछाड़ो । तुम्हारी सेना विश्व व्यायी हुकूमत इस धरती पर स्थापित हो और तुम्हारा शुत्र (घणात्मक खतरनाक तलवार म्यान वाली) पराजित हो और नीचा देखे। (जैसा गाजी महमूद गजनवी और मुहम्मद गौरी ने नीचा देखा ?)
(उपरोक्त ऋग्वेद मंत्र भी यही है)

एक स्थान पर लिखा है ।
       
"ऐ दुश्मनों के मारने वाले जंग के नियमों में माहिर निडर, साहसी, प्रिय, प्रतापी और जवां मर्द तू सब प्रजा को प्रसन्न रख । परमेश्वर के आदेश पर चलो और घ्रणित शुत्र को ( हे महाराज इतनी नाराजी ) पराजित करने के लिए लड़ाई का कार्य पूरा करो । तुमने पहले मैदानों में शत्रुओं की सेना को पछाड़ा है । तुमने इन्द्रियों को पराजित और धरती को विजयी किया है । तुम शक्तिशाली बाजू वाले हो । अपनी बाजू की ताकत से दुशनों को समाप्त करो ताकि तुम्हारे बाजू का जोर और ईश्वर की दया व कृपा से हमारी विजय हो ।
(अथर्ववेद कांड 6 , अनुवादक वरग 95 मन्त्र 3)

 मनु जी का आदेश यह है- 
         
"जब जनता प्रेमी राजा कोई अपने से छोटा चाहे बराबर चाहे बड़ा जंग के लिए बुलाए तो क्षत्रियों के धर्म को याद करके जंग के मैदान में जाने से अपने आपको न रोके , बल्कि बड़ी होशियारी के साथ उनसे जंग करे जिससे अपनी विजय हो ।"

 एक स्थान पर आदेश है ।
   
 "किसी समय उचित समझे, दुश्मन को चारों ओर से घेर कर  रोक रखे और उसके देश को तकलीफ पहुंचा कर चारा_1, खुराक पानी और अन्य सामान को नष्ट और खराब कर दे।”
"शत्रु के तालाब, नगर के प्रकोट और खाई को तोड़ फोड़ दे, रात्रि में उनको भय देवें और जीतने का उपाय करें ।"
(धिक्कार है समाजियो ! यह दया कैसी ? देखो मनु महाराज जी) 

एक जगह आदेश है ।
"अपने मतलब की पूर्ति के लिए उचित या अनुचित समय में दुश्मन के साथ जो अपने किसी दोस्त की गलती करने वाला हो लड़ना, अर्थात इसी दो प्रकार के आधार पर जंग करना चाहिए ।'' 

नोट:- यहां से कुछ हमारी तरफ से लिखा जा रहा है जो कि दोनों कोष्ठक [ ] के बीच मे होगा
["हे अन्न वाले! [व वज्र वाले परमेश्वर]। तुझको स्तुति करने वाले लोग अच्छे प्रकार प्रसन्न करें। तू [हमारे लिए] धन कर, वेद द्वेषों को नष्ट कर।" 

"हम लोग जिस से द्वेष करें और जो हम से द्वेष करे, उस को हम शेर आदि पशुओं के मुख में डाल दें।" 

"तू [वेद निंदक] को, काट डाल, चीर डाल, फाड़ डाल, जला दे, फूँक दे, भस्म कर दे।"
  

यजुर्वेद के एक मंत्र में विद्वानों को संबोधित करते हुए लिखा है कि

मैं दुष्ट स्वभाव वाले शत्रुओं के शिरों(Head) को भी छेदन(चीर-फाड़) करता हूँ वैसे तुम भी छेदन करो ।

यहाँ वेद मंत्र ख़ुद दुष्ट स्वभाव वाले शत्रुओं के सिरों को काटने की आर्य समाजियों को आदेश दे रहे हैं। यह वेद मंत्र कितना अमानवीय है कि अपने शत्रु के साथ केसा बर्ताव करने का आदेश दे रहा है। ध्यान रहे आर्यों का शत्रु आर्यों के धर्म को ना मानने वाला हर व्यवक्ति है।

जिस ईश्वर ने वेदों में गैर लोगों से ऐसे भयंकर व्यव्हार की शिक्षा दी है और उनको दस्यु, राक्षस, और असुर के ख़िताब दिए हैं, वह ईश्वर पक्षपाती अवश्य है।

और सुनिए अथर्ववेद कहता है
"वेदानुयायी सत्यवीर पुरुष नास्तिकों का नाश करें"

अब प्रश्न ये है कि नास्तिक कोन हैं? केवल ईश्वर में आस्था न रखने वाले? चलिए देखते हैं कि स्वामी दयानंद सरस्वती नास्तिक किसको कहते हैं.
     "नास्तिक वह होता है, जो वेद ईश्वर की आज्ञा, वेदविरुद्ध पोपलीला चलावे"

इस परिभाषा में वह सारे लोग आते हैं जिन की वेदों में आस्था नहीं है जैसे मुस्लिम, ईसाई, जैनी, बोद्ध आदि. इस से यह स्पष्ट होता है कि वेद अन्य धर्मों के लोगों को नष्ट करने की शिक्षा देता है.
स्वामी दयानंद सरस्वती सत्यार्थ प्रकाश में ब्रह्मोसमाज और प्रर्थ्नासमाज की आलोचना करते हुए लिखते हैं,
"जिन्होंने अँगरेज़, मुसलमान, चंडाल आदि से भी खाने पीने का अंतर नहीं रखा। उन्होंने यही समझा कि खाने और जात पात का भेद भाव तोड़ने से हम और हमारा देश सुधर जाएगा लेकिन ऐसी बातों से सुधार कहाँ उल्टा बिगाड़ होता हे।"

मुसलमान और ईसाई कितने ही सदाचारी हों, स्वामी जी के अनुसार उनके साथ खाना उचित नहीं। यह पक्षपात नहीं तो और क्या हे? क्या आप अब भी ऐसे 'आर्य समाज' में रहना पसंद करेंगे? ]

क्या इतने हवालों के बाद भी आपत्ति कर्ता और उनके चेले ।  जिहाद को मुंह पर लाएंगे और कहेंगे कि ''यदि कुरआन का ईश्वर संसार का पालनहार होता और सब पर क्षमा और दया किया करता तो दूसरे धर्म वालों और जानवरों आदि को मुसलमानों के हाथ से कत्ल कराने का आदेश न देता । 

पाठक जनो ! यह है स्वामी जी का न्याय और यह है उनकी ईमानदारी और फिर कौम का लीडर ।
अल्लाह रे ऐसे हुस्न पे ये हैं तेरी बे नियाजियां
बन्दा  नवाज  आप  किसी  के   खुदा  नहीं  | 

हमारे इन वेदिक हवालों से जहां जिहाद का मसला हल हो गया । वेद की प्राचीनता और दुनिया का आदिकाल से होना भी असत्य हुआ । पाठक गण तनिक ध्यान से देखें । 

अब इस आपत्ति का जवाब सुनियेः कुरआन में कहीं लिखा कि काफिरों को उनके कुफ्र के कारण मारो और कत्ल करो , बल्कि साफ इर्शाद है ।
     
"जो तुम से लड़े तुम उनसे लड़ो और लड़ने में अत्याचार न करो, निस्सन्देह अल्लाह अन्याय करने वालों से मुहब्बत नहीं  करता ।
(सूरह बकरा - 19)

स्वामी जी । यदि काफिरों को कुफ्र के कारण मारने का आदेश होता तो काफिरों को जनता के रूप में क्यों रखा जाता । यह मसला हमारी किताबों में अनेक अवसरों पर आया है । आगे भी स्वामी जी को जिन-जिन आयतों में से सन्देह होगा दूर किया जाएगा इन्शा अल्लाह । 

पाठको ! आपत्ति करने वालों का न्याय देखिए कि यह आयत (पूरी सूरह फातिहा अन्त तक) ऐसी पाकीज़ा शिक्षा से भरी हुई है । मगर आपत्ति कर्ता को भलाई भी हलक से नहीं उतरी, क्यों न हो मुसलमानों के हाथ से छूत है । 

मददगार साहब से यह तो न हो सका कि इन वेदिक हवालों से इन्कार करते या हमारे शोधपूर्ण जवाब ही को देखते । झट से लिख  मारा कि । 
"आपने जितने भी मन्त्र प्रस्तुत किए हैं उनमें से किसी एक में भी यह निर्देश नहीं कि तुम स्वयं अपना धर्म फैलाने के लिए दूसरों से लड़ो या उनको कत्ल करो वहां तो मदनी राजनीति के बारे में न्याय पर आधारित है रंग व कौम, धर्म व समुदाय भेद भाव के बिना समस्त मानव जाति के लिए समान विश्वव्यायी निर्देश हैं जिनका किसी विशेष कौम या धर्म से तनिक भर भी संबंध नहीं, हां यही_1 विषय कुरआन में मौजूद है जिस पर हमारी आपत्ति है और तुम्हारा चू चरा करना गलती है ।"
(आर्य मुसाफिर सितम्बर 1902 ई०)
मददगार साहब यदि न्याय के साथ हमारे शोध पूर्ण जवाब को देखते तो यह बातें मुंह पर न लाते कि कुरआन में धर्म फैलाने के लिए जिहाद हैं और वेद में देशों पर कब्जा करने व राजनीति के लिए । हम प्रतीक्षा में थे कि लाला साहब कुरआन से दावा का सबूत देंगे । मगर प्रतीक्षा ही प्रतीक्षा रही । मददगार साहब लीजिए ! हम और भी स्पष्ट शब्दों में बताते हैं कि कुरआन शरीफ ईमान लाने को किन शब्दों में ना पसन्द करता है । ध्यान से सुनिए . . . . . . । 
”क्या तू ऐ रसूल लोगों को मबूर करेगा कि वे मुसलमान हो जाएं।" 
(सूरह यूनुस – 100) 

(अर्थात ऐसा करना किसी तरह जायज़ नहीं) इसके अलावा यह भी गलत है कि वेद के मन्त्र धार्मिक लड़ाई के लिए नहीं बल्कि मदनी राजनीति के लिए हैं क्योंकि इन मन्त्रों में जिन लोगों को सम्बोध किया है अर्थात जिन लोगों की हुकूमत दुनिया पर स्थापित करने की इच्छा व्यक्त कि गयी है वे कौन लोग हैं या तो वे जो वेदिक धर्म के पाबन्द होंगे या कोई भी हो जो उस समय दुनिया में शासक थे चाहे मूर्ति पूजक हों या सलीब पूजने वाले, मुसलमान हों या यहुदी लेकिन ईश्वरीय और धार्मिक किताबों से यह मतलब कोसों दूर बल्कि असंभव है कि ऐसे आदेश उन्हीं लोगों के लिए होते हैं जो इस किताब के पाबन्द होते हैं । अतः इन मायनों को ध्यान में रखकर वेदिक मंत्रों को ध्यान से देखें कि कैसे वेदिक धर्म का साम्राज्य अन्य सारे देशों में करने के निर्देश है । 

भला यदि दो देशों जैसे पंजाब और बंगाल में वेदिक धर्म के अनुयायी रहते हैं और उनमें यदि किसी बात पर बिगाड़ हो जाए तो दोनों कौम इन मन्त्रों को पढ़ पढ़कर एक दूसरे पर आक्रमण करेंगी और मददगार साहब की व्याख्या प्रस्तुत करेंगी ? कि यह मन्त्र राज्य की राजनीति से संबंधित है । बंगाली कहेंगे कि पंजाबी हमारे विरुद्ध दंगा फ़साद भड़काने की कोशिश करते हैं और पंजाबी कहेंगे कि बंगाली ऐसा करते हैं जिस तरह हो सके हम उनको नष्ट किए बिना  न रहेंगे क्योंकि पवित्र वेद में ईश्वर ने हमारी हुकूमत को संसार में स्थापित किया है । 

कुछ सन्देह नहीं कि ऐसे अवसर के लिए न तो मददगार साहब और न स्वामी जी इन मन्त्रों का ताल्लुक बताएंगे । फिर बताइए ये मन्त्र धार्मिक लड़ाई से संबंधित न हुए तो किस से हुए ? हां एक बात में कुरआन शरीफ की वास्तव में गलती है कि उसने इसके विपरीत तमाम कौमों और हुकूमतों को दुनिया में शान्ति व सुख से रहने का एक निराला प्रस्ताव बताया है ।

सारी कौमों और हुकूमतों में यह दस्तूर है कि जब तक मुकाबले वाला पक्ष अपना सर न झुका दे अर्थात अधीन न हो जाए लड़ाई बन्द नहीं करते चाहे वे एक ही कौम व धर्म के ही क्यों न हों । अग्रेजों और बोइरो, जर्मनी व फ्रांस आदि की लड़ाइयां उदाहरण स्वरूप मौजूद हैं । इस्लाम और कुरआन ने यह प्रस्ताव तो स्वीकार किया कि . . . . . । 
"यदि काफिर समझौता (सुलह) चाहें तो तुम भी सुलह (संधि) पसन्द करो और अल्लाह पर भरोसा करो।" 
 (सूरह अन्फाल - 61)

इसके अलावा दूसरा रास्ता भी बताया जिसका हम इस अवसर पर उल्लेख करते हैं जिससे अधिकांश विरोधियों को भ्रम पैदा हुआ है वह यह कि यदि विरोधी मुसलमान हो जाएं तो जंग को समाप्त कर दिया जाए । ध्यान से सुनो ।
"यदि काफिर मुसलमान हो जाएं और इस्लामी आदेशों के पाबन्द हो जाएं तो उनका मार्ग छोड़ दो ।"
(सूरह तौबा)
यही आयत है जिससे वे समझे बूझे विरोधियों को सन्देह होता है । कि इस्लामी जंगें लोगों को जबरदस्ती मुसलमान बनाने के लिए थीं । मगर वास्तविकता ऐसी नहीं है । यह तो कुरआन शरीफ का महान उपकार और एक आधुनिक तरीका है सुलह सफाई का जो आज तक किसी सभ्य कौम को प्रदान नहीं हुआ कि मुकाबले वाले पक्ष का एक ही धर्म का हो जाने पर जंग समाप्त कर दी जाए । क्या 1900 ई० की अंग्रेजों और बोइरों की जंग को दुनिया भूल गयी है । कि जब तक अंग्रेजों ने देश को अपने अधीन नहीं कर लिया, नहीं  छोड़ा चाहे वे हजार बार मसीह और सलीब को सज्दा करते रहे ।

हां कुरआन पर यह आरोप इस सूरत में लग सकता था कि केवल यही एक तरीका सुलह सफाई का होता लेकिन जिस सूरत में इस तरीके के अलावा दूसरा तरीका भी मौजूद है कि मुकाबले वाले बेशक अपने धर्म बल्कि मूर्ति पूजा पर जमे रहें मगर सन्धि की प्रार्थना करें (यह भी शर्त नहीं कि वे इस्लामी खलीफा को बादशाह मानें) तो तुरन्त जंग बन्द कर दी जाएगी जिसका सबूत ऊपर आ चुका है । अब उस पक्ष को अख्तियार है कि वह जिस में अपना लाभ समझे अख्तियार करे लेकिन इस्लाम और इस्लामी खलीफा की ओर से उसपर जोर जबरदस्ती न होगी कि वे मुसलमान ही हों तो जंग समाप्त होगी , ऐसा नहीं है बल्कि प्रार्थना पत्र देकर वे स्वतंत्र रूप से जनता (जिम्मी) बनकर भी सुलह कर सकते हैं मगर शर व फ़साद से नहीं । जरा ध्यान से पढ़िए । 
   "लड़ो उन से जब तक फितना न खत्म हो जाए।"
( सूरह बकरा - 193 ) 
सारांश यह कि सभी कौमों में सुलह सफाई का एक ही तरीका है । मगर कुरआन मजीद में दो तरीके हैं और यही कुरआन की बड़ी श्रेष्ठता है । इसलिए कुरआन अपने बारे में यह कहता है । 

मुझ  में  एक  ऐब  बड़ा  है  कि  वफादार हूँ मैं
उनमें दो वस्फ़ हैं बदखूं भी हैं खुद काम भी है
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  1. तोप बन्दूक स्वामी जी के शब्द है हम इनके जिम्मेदार नहीं ।
  2. मराज गऊ माता क्या खाएगी ?
  3. इसमें यही के इशारे को हम नहीं समझे कि इशारा किधर को है ।

क्या अल्लाह मुहम्मद ‎ﷺ ‏ के लिए सलाह(नमाज़) ‏कायम करता है?? ‏Quran ‎33:56 – ‏Myth: ‏Allah Prays To Muhammed ‎PBUH

क्या अल्लाह मुहम्मद ﷺ के लिए सलाह(नमाज़) कायम करता है?? इस्लाम के विरोध में आलोचक इतने अंधे हो जाते हैं कि वो बस किसी भी तरह से इस्लाम की आल...