Sunday, 14 June 2020

स्वामी दयानन्द सरस्वती के विचार मूर्ति पूजा और मूर्ति पूजकों के सम्बन्ध में


हम इस लेख में मूर्ति पूजा पर स्वामी दयानन्द सरस्वती के क्या विचार थे इस विषय पर प्रकाश डालेंगे। मूर्ति पूजा का खंडन स्वामी जी ने किस स्तर पर किया है और  स्वामी जी ने मूर्ति पूजकों को कैसे शब्दों की उपमा दी है इस पर भी दृष्टि डालेंगे। 

स्वामी जी के सभी कथनों का सन्दर्भ, आर्य समाज की प्रामाणिक पुस्तकों से दिया जाएगा और आर्य समाज की प्रमाणिक वेबसाइट से उनका लिंक भी सलग्न किया जाएगा। 

सर्व प्रथम ये ज्ञात होना आवश्यक है कि आर्य समाज संगठन 150 साल पहले स्वामी जी द्वारा बनाया गया एक संघटन मात्र है और कुछ समय पश्चात स्वयं यह घोषणा कर दी कि यह आर्य धर्म ही वैदिक काल से निरंतर चला आ रहा आर्य धर्म है। स्वामी जी और उनके चेलों ने यह भी कहा है कि उन्होंने जिस संघटन की स्थापना की है वो बाकी सब धर्म से अलग है और यह उन्होंने सभी धर्मों की आलोचना करके सिद्ध कर दिया है। 

आर्य समाजी स्वयं को आर्य समाजी ही कहते हैं और ये खुद को हिन्दू धर्म या सनातन धर्मी भी नही कहते हैं। इसका प्रमाण स्वामी जी के जीवन चरित्र में लिखित है: 

जीवन चरित्र महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती पृष्ठ संख्या 127


यहाँ से सर्वविदित है कि जो भी स्वामी जी के मत के अनुसार अनुसरण करता है उसे वैदिक धर्मी या सनातन धर्मी या हिन्दू धर्मी नही कहते हैं। आर्य समाजी या आर्य धर्मी कहते हैं। 

स्वामी जी ईश्वर के अवतारवाद में भी विश्वास नही करते थे और इसका खंडन भी किया करते थे जीवन चरित्र में ही स्वामी जी का कथन है कि ईश्वर अवतार नही ले सकता क्योंकि वह निराकार है

जीवन चरित्र महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती पृष्ठ संख्या 100


हिन्दू धर्म के पवित्रतम ग्रंथ उपनिषदों का भी खंडन करते थे स्वामी जी, जीवन चरित्र में ही लिखा है कि उपनिषद की कथा और मूर्तिपूजा का खंडन करते थेऔर मूर्ति पूजा का खंडन भी करते थे

जीवन चरित्र महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती पृष्ठ संख्या 57


जीवन चरित्र के पृष्ठ संख्या 52 पर लिखित है कि स्वामी जी श्रीमद्भगवद का भी खंडन करते थे स्वामी जी ने सुना कि यहाँ कथा बड़ी तैयारी के साथ होने वाली है तो स्वामी जी ने भागवत का खंडन करना शुरू किया कथन का आशय यह है कि जब दूसरे लोगों ने भागवत की कथा पढ़ने की तैयारी की तो स्वामी जी ने उसके विरोध में भागवत का खंडन करना आरंभ कर दिया।


जीवन चरित्र महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती पृष्ठ संख्या 52


शिवलिंग की पूजा का भी खंडन करते थे स्वामी जी और क्यों करते यह एक घृणास्पद कृत्य है, स्त्रियों का लिंग की पूजा करना कोनसा सभ्य कर्म हो सकता है भला?
इसीलिए स्वामी जी ने 


जीवन चरित्र महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती पृष्ठ संख्या 118


इसीलिए स्वामी जी ने कि कैसी लज्जा की बात है कि तुम लिंग की पूजा करते हो फिर जब लिंग प्रथक होकर यहाँ आ गया तो शिव कैलाश में हिजड़ा रह गया!

यह स्वामी जी के कथन है जो उनके जीवन चरित्र में वर्णित हैं भला इस तरह का घृणास्पद कार्य स्वामी जी कैसे सहन कर सकते थे इसलिए ताव में आकर स्वामी जी ने शिव जी को ये सब कह दिया।

स्वामी जी एक कठिन परिश्रमी मानव थे वो सदैव अपने कार्य मे आगे रहते थे। इसी तरह एक पृष्ठ पर लिखा है कि स्वामी जी निरन्तर मूर्ति पूजा का खंडन करते रहते थे

जीवन चरित्र महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती पृष्ठ संख्या 50


हिन्दू धर्म में जो जो भी मान्यता स्वामी जी को कपोल कल्पित लगी आप ने सब का खंडन किया इसी तरह लम्बा तिलक निकालने की मान्यता है । जिसका स्वामी जी ने खंडन किया।
जीवन चरित्र महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती पृष्ठ संख्या 50


स्वामी जी, पंडित रामधन वशमालि पंडा से कहते थे कि तुम ऊंचा तिलक मत निकालो; साधारण लगाया करो और कंठी तोड़ डालो; अंतः हमने तोड़ डाली। इस तरह से स्वामी जी हिन्दू धर्म में झूठी मान्यता का अंत करते थे

स्वामी जी मूर्ति पूजा का खंडन करने में इतने उत्सुक रहते थे कि मूर्ति पूजा का दावा करने वालों का पीछा तक करते थे। एक मूर्ति पूजक ने दावा किया कि वो मूर्ति पूजा को सिद्ध करेंगे। तो स्वामी जी ने इनको बुलाया तो वो नही आये फिर उनके कहीं जाने की सूचना स्वामी जी को मिली तो स्वामी जी स्वयं ही पीछे गए और उन्हें पकड़ लिया और बैठ कर चर्चा कि तो स्वामी जी ने कहा कि मूर्ति पूजा सिद्ध करने वाला मंत्र कहा हैं बोलो ! वह चुप हो गए। घण्टा भर हो गया तब स्वामी जी ने कहा झूठ ने तुम्हारे मुह पर कुहर लगा दी है ।


जीवन चरित्र महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती पृष्ठ संख्या 114


स्वामी जी से रामचंद्र जी के बारे में किसी व्यक्ति ने प्रश्न किया कि
रामचंद्र जी कैसे थे?
स्वामी जी ने उत्तर दिया कि : प्रतापी राजा थे ।
उसने कहा कि : अवतार या ईश्वर ओ नहीं थे?
स्वामी जी ने उत्तर दिया कि : नहीं ।

फिर कृष्ण जी के विषय मे प्रश्न किया तो कहा कि वह भी ईश्वरावतार नही थे केवल राजा थे । और आगे कहा कि कृष्ण जी ईश्वर नहीं प्रत्युत एक साधारण मनुष्य सिद्ध होते हैं ।

जीवन चरित्र महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती पृष्ठ संख्या 99


स्वामी जी के कथनों से सिद्ध होता है कि स्वामी जी एक अलग ही सम्प्रदाय का निर्माण करके गए हैं जिसमे हिन्दू धर्म या सनातन धर्म की अधिकतर मान्यताओं को स्वामी जी ने झूठा मना है अथवा इन मान्यताओं के विरोध में हमेशा खंडन करते हुए प्रतीत हुए हैं।
इसी के प्रभाव में स्वामी जी ने रामचंद्र जी को एक प्रतापी राजा तक कह दिया और कृष्ण जी को साधारण मनुष्य कह दिया। परंतु आज के आर्य समाजी स्वामी जी का अनुसार नही करते हैं और राम चन्द्र जी और कृष्ण जी को एक महान पुरूष बताते हुए स्वामी जी के कथनों पर झूठ का आवरण चढ़ाने की कोशिश करते हैं।
ऐसे ही प्रमाण सत्यार्थ प्रकाश में भी लिखित है। उन पर बाद में बात करेंगे।

Thursday, 11 June 2020

आपत्ति नंबर 22 
क़ुरआन सूरह बक़रह
आयत : 58
और कहो कि माफी मांगते हैं । हम माफ़ करेंगे तुम्हारे गुनाह और अधिक नेकी करने वालों के ।

आपत्ति 22

भला यह ईश्वर का पथ प्रदर्शन सब को गुनहगार बनाने वाला है या नहीं क्योंकि जब गुनाह माफ हो जाने का सहारा आदमी को मिलता है तब गुनाहों से कोई भी नहीं डरेगा । इस वास्ते ऐसा कहने वाला ईश्वर और यह ईश्वर की बनाई हुई किताब नहीं हो सकती । वह न्याय धीश (न्याय करने वाला) है । अन्याय कभी नहीं करता और गुनाह माफ करने से तो अन्यायी हो जाता है मगर जैसी गलती हो जैसी सजा देने से ही न्याय करने वाला हो सकता है ।

आपत्ति का जवाब 

यह मसला स्वामी का विचार करने योग्य है । इसे पंडित जी ने कई एक अवसरों पर लिखा है सबका मतलब यह है कि तौबा स्वीकार नहीं होती । हम वायदा अनुसार पहले वेद मन्त्र स्वामी जी बयान करके इसकी मन्शा समाजियों से पूछते हैं । मन्त्र से पहले स्वयं पंडित जी भूमिका में एक प्रस्तावना लिखते हैं वह भी विचार योग्य हैं । आप लिखते हैं 

इस ईश्वर की हिदायत किए हुए धर्म को मानना हर मनुष्य पर फर्ज हैं और चूकि उसकी मदद के बिना सच्चे धर्म का ज्ञान और उसकी पूर्ति सफल नहीं हो सकती । इसलिए हर मनुष्य को ईश्वर से इस तरह मदद मांगनी चाहिए ।
"ऐ अग्नि (परमेश्वर) प्रतीज्ञा व सत्य के स्वामी व रक्षक ! मैं सच्चे धर्म पर चलूगा अर्थात उसकी पाबन्दी करूँगा । ऐ परमेश्वर मुझे सच्चे नेक रास्ते और धर्म पर अमल करने की ताकत दे । आप मुझे साहस दीजिए कि मेरी सच्चे धर्म की प्रतीज्ञा आप की कृपा से पूरी हो (प्रतीज्ञा यह है) में आज से सच्चे धर्म की पाबन्दी और झूट खोटे चलन और अधर्म से दूरी अपनाता हूं ।” 

अब सवाल यह है कि इस प्रतीज्ञा के अनुसार जिसे इस्लामी मुहावरे में तौबा कहते हैं इस प्रतीज्ञा (तौबा) करने वाले का क्या लाभ ? ईश्वर के सामने तो ऐसी विनम्रता से अपनी नेक नीयती को व्यक्त किया और वहां जो जवाब मिला कि तेरे पिछले गुनाह तो बराबर मौजूद हैं । जिनके नतीजे में तू एक बार पाखाना का करम या जंगल का बन्दर या सुअर बनेगा क्योंकि बिना इसके द्वारा उसूल और दया बिगड़ती है हां, आगे को यदि तूने कुछ सदकर्म किये तो तुझे बदला मिलेगा । फिर बताईए ऐसे ईश्वर से तो मामूली बनिया दुकानदार भी कई गुना अच्छा है या नहीं ? जिनके नौकर यदि सच्ची नीयत से तौबा करें और आगे को आज्ञा पालक बनने और नया काम करने की प्रतीज्ञा करें तो वे भी एक दो बार उनको क्षमा कर ही देते हैं मगर परमेश्वर ऐसा दयालु है कि उसे बन्दे के दिलों का हाल मालूम हैं इसके बावजूद वह मात्र नेक नीयती के साथ मेरे आगे गिड़ गिड़ाता है फिर भी उसके हाल पर दया खाकर उसकी गलतियों को माफ नहीं करता । सच पूछो तो परमेश्वर भी सच्चा है । वह (आर्य समाज के कथनानुसार) इसी तरह तौबा करने पर गुनाह माफ़ करता जाए तो उसके देश और शासन में खलल आता है क्योंकि उन्ही बदकारों को तो उसने हैवानी जानवरों के शरीरों में ढाल ढाल कर दुनिया को आबाद रखना है यदि यही बटेरे हाथ से निकल गयी तो वह लाएगा कहां से ? 

हैरत तो यह है कि स्वामी जी के मुंह से भी कभी कभी आप से आप सच्ची बात निकल जाती है मगर यद्यपि किसी खाने में निकले । आप स्वयं सत्यार्थ प्रकाश अध्याय 7 न0 13 में मानते हैं कि न्याय व ईश्वरीय दया में आपसी विभेद नहीं अतः हम भी पंडित जी की तकरीर की व्याख्या करने को उन्हें और उनके चेलों को बताते हैं कि न्याय का अर्थ हरेक वस्तु को ठीक ठीक उसके स्थान पर रखना भलाई का इरादा है या किसी की दुखद हालत पर तरस खाना ।  यह ''गुण'' भलाई का इरादा पंडित जी भी ईश्वर के बारे में मानते हैं ( देखो सत्यार्थ प्रकाश पृष्ठ 235 , अध्याय 7 न0 19 ) तो आप बताइए कि एक व्यक्ति जो दिल की निष्ठा के साथ ईश्वर के आगे बिना किसी यातना देखने के गिड़गिड़ाता है तौबा करता है तो उसका न्याय (जिसके मायना थे हरेक वस्तु को ठिकाने पर रखना) इस तौबा के लिए भी कोई अवसर प्रस्तावित करेगा और उसका रोना धोना और बे देखे हाय तौबा भी कोई जरूरत है ? बन्दों के हरेक कर्म के लिए जब कोई न कोई कारण हो तो कोई वजह नहीं कि इस काम (तौबा) का कोई औचित्य नहीं है तो बताइए कि कुबूल तौबा ठीक ठीक न्याय और दया दोनों है या नहीं ? बल्कि तौबा का कुबूल न होना और गुनाहों का माफ न होना सरासर जुल्म और न्याय के विरुद्ध है क्योंकि यह बात चीजों को अपने ठिकाने पर रखने के भी विरुद्ध है।

असल में स्वामी जी को बन्दों के अधिकारों और अल्लाह के अधिकारों के बीच भ्रम हो गया । स्वामी जी की तकरीर से जो पृष्ठ 350 सत्यार्थ प्रकाश अध्याय 7 पर है यहीं मालूम होता है कि आप को दोनों में तमीज़ नहीं । तो हम अपने समाजी दोस्तों को बताते हैं । कि इनमें बहुत बड़ा फर्क है और हम भी पहली बार में ही तौबा के काइल नहीं जब तक वह व्यक्ति जिसकी कुछ हानि की हो माफ न कर दे क्योंकि इससे विश्व व्यवस्था बिगड़ती है और दूसरी किस्म में तौबा के स्वीकार होने को मानते हैं । बशर्ते कि सच्चे दिल से और नेक नीयत से मात्र अल्लाह के अजाब से और अपनी बुराइयों के भय से तौबा करे और यह भी शर्त है कि तौबा करते समय आइन्दा (भविष्य) का पक्का ध्यान जी में इस काम के न करने का करे । सुनो 
अल्लाह के निकट तोबा उन्हीं लोगों की कुबूल होती है जो नफस के हमले में फंस कर बुरे काम करते हैं फिर झट से तौबा करते हैं।
माफी उन लोगों के लिए जो गुनाह करके ईश्वर को याद करते हैं और अपने गुनाहों पर क्षमा याचना मांगते हैं और (जानते हैं) कि ईश्वर के सिवा कोई गुनाह बख्श नहीं सकता और अपने किए पर जान बूझ कर अड़े नहीं रहते ।

स्वामी जी ने इस पर भी ध्यान से काम नहीं लिया कि जितनी उच्च विशेषताएं दुनिया में हैं उन सब का स्त्रोत अल्लाह के गुण ही हैं जैसे दानवीरता एक उत्तम कमाल है तो असल उसी स्त्रोत का एक निशान है । ऐसा ही न्याय, दया, मुहब्बत आदि उत्तम गुण सब के सब उसी स्त्रोत के निशान हैं जिसको अल्लाह, परमेश्वर, गॉड और खुदा आदि कहते हैं अतः जब हम दुनिया में बहुत से मुकदमों में  दावा करने वाले, फ़रियाद करने वालों और मोहताजों को माफ करते भी देखते हैं और उनकी प्रशंसा करते हैं और कभी कभी इसकी सराहना भी करते हैं ।

तो ईश्वर के बारे में कौन सी दलील इस उत्तम गुण के मानने से हमें रोकती है, हां स्वामी जी का यह कहना कि तौबा से गुनाहों का साहस होता है बड़ी विचित्र बात है पंडित जी को यह भी मालूम नहीं कि सांसारिक कारोबार में जिसमें बन्दों को अपने गलत कामों की माफी का पता भी हो जाता है माफी से साहस और बहादुरी नहीं होती तो ईश्वरीय माफ़ी में जिसका पता भी दुनिया में कदापि नहीं हो सकता क्यों कर साहस बढ़ेगा ? हां, ऐसे लोगों की तौबा इस्लाम में भी स्वीकार्य नहीं जो गुनाह करते हुए यह साहस रखें कि तौबा से गुनाह माफ करा लेंगे तो हम अल्लाह का आदेश सुनाकर इस वाक्य को समाप्त करते हैं | जरा ध्यान से सुनो 
तो मेरे गुनाहगार बन्दों को कह दे कि मेरी दयालुता से निराश न हो बेशक अल्लाह (तौबा करने पर) सारे गुनाह माफ कर देगा वही है जो अपने बन्दों की तौबा स्वीकार करता है और गुनाह माफ करता है ।


आपत्ति नंबर 21
क़ुरआन सूरह बक़रह
आयत : 89
शुभ सूचना ईनानदारों को । अल्लाह, फरिश्तों, सन्देष्टाओं जिबरील और मीकाईल का जो दुश्मन है अल्लाह भी ऐसे काफिरों का दुश्मन है । 
आपत्ति - 21

जब मुसलमान कहते हैं कि अल्लाह किसी का साझी नहीं है फिर ये फौज की फ़ौज कहां से कर दी ? क्या जो औरों का दुश्मन है वह खुदा का भी दुश्मन है ? यदि ऐसा है तो ठीक नहीं । क्योंकि खुदा किसी का दुशमन नहीं हो सकता । 

आपत्ति का जवाब 

इस उपरोक्त अनुवाद को देखने वाले भली प्रकार समझ सकते हैं कि दयानन्द जी को भ्रम में कहां तक आनन्द मिलता है । अनुवाद ऐसा प्रस्तुत किया है जिसका सर है न पावं है क्यों न हो स्वामी का कहना क्या ही सच है 
आगे पीछे न देखने वाले अज्ञानियों को ज्ञान कहा ।
 (भूमिका पृष्ठ 52)

मगर खैर हमें तो इनके सवाल का जवाब देना है । समाजी मित्र तो गला फाड़ फाड़ कर परमेश्वर अकेला सर्वशक्तिमान कहते हैं। फिर क्या कारण है कि वेद बताता है ।

परमात्मा के इस खजानए कुदरत को जिसकी देवता रक्षा करते हैं कौन नहीं जान सकता है ।

(अथर्ववेद कांड 10 प्रफाटक 23 अनुवादक 4 मंत्र 23 )

देवता  उसके सेवक (नौकर) और कुछ दूत (सन्देश पहुंचने वाले) बाकि उसके पास बैठ गए !

वेद यह भी आज्ञा देता है । 

तैंतीस देवता उस परमात्मा के बांटे गए कर्तव्यों को पूरा कर रहे हैं । वे उसकी कुदरत के आंशिक द्योतक हैं जो लोग इस ब्रह्म अर्थात वेद या सव्र ब्रहमांड ईश्वर को पहचानते हैं वेद उन तैंतीस देवताओं को जानते और उनको इसी ब्रहम के सहारे स्थापित मानते हैं ।
(उपरोक्त हवाला मंत्र 27 )

जब परमेश्वर एक बिना किसी साझी के है तो पंडित जी यह फौज (साझी) कहा से आ गयीं ? यह है स्वामी जी की योग्यता । इतना भी नहीं जानते कि प्राणी को अल्लाह के नाम के साथ मात्र जिक्र आना जाना शिर्क नहीं हुआ करता बल्कि इसी हैसियत से आए जिस हैसियत से ईश्वर का नाम आया है तो शिर्क होता है । भला यदि कोई कहे कि ईश्वर इस पापी को नष्ट करे जिसने दयानन्द जी को विष से मार डाला तो क्या यह भी शिर्क है ?

प्रिय पाठको पंडित जी के इसी वाक्य पर आप चकित न हों । आगे भी बहुत से अवसर_1 आप सुनेंगे कि स्वामी जी शिर्क से ऐसे भागते हैं जैसे मासाहारी से । अतएव लाइला है इल्लल्लाहु के साथ मुहम्मदरसू लुल्लाह को मिलाना भी शिर्क समझोगे । क्यों न हो बेचारे सांपों के डसे हुए रस्सियों से डरते हैं । लम्बी अवधि के शिर्क और मूर्ति पूजा में फंसे हुए, मुसलमानों की आपत्तियां सुन-सुन कर इस मार्ग पर आए हैं इसलिए थोड़ा बहुत मजबूर भी हैं मगर अफ़सोस ।

हां, यह खूब कही कि "खुदा किसी का दुश्मन नहीं हो सकता।” हम पंडित जी की स्म्रण शक्ति की कहां तक शिकायत करें । ईश्वर का आदेश भी सुनिए - और तनिक ध्यान से सुन लीजिए । 
"मैं व्यभिचार अत्याचारियों को कभी आशीर्वाद नहीं देता ।"


बताइए ये कौन लोग हैं जिनको आशीर्वाद नहीं मिलता, वही है जिन को कुरआन में अल्लाह का दुश्मन या सूरह बकरा 98 में । फइनल्लाह अदुवुन लिल काफिरीन कहा गया है । स्वामी जी यह समझ बैठे होंगे कि जिस तरह हम अपने दुश्मन को हो सके तो दम भर जीने नहीं देते । ईश्वर भी ऐसे ही करता होगा मगर उनको मालूम नहीं ।

Tuesday, 9 June 2020

अथर्ववेद में हिंसक मंत्र

क्या अथर्ववेद एक जंगी किताब है ?


इस पोस्ट में हम बस यह देखेंगे कि वेदों में कितने खतरनाक मंत्र हैं और वो मानवता के लिए कितने कष्टदायक साबित हो सकते हैं।
हर एक मंत्र में अपने शत्रु से ऐसा व्यवहार करने की आज्ञा दी गयी है जो आज तक कहीं नही दी गयी, ना किसी धर्म मे और ना किसी जाति में, और ना किसी देश में।

आइए हम उन मंत्रों को देखते हैं एक एक करके

मंत्र - 1
सेनापति मोहनास्त्र, आग्रेयास्त्र व व्यवयास्त्र के प्रयोग से शत्रुओं को विदुरत कर दें।

इसी तरह का एक मंत्र और है वह भी देखिए 

राजा राष्ट्र के शत्रुओं पर आक्रमण करे आग्रेयास्त्रों से उन्हें भस्म कर दे । मोहनास्त्र से शत्रु सैन्य को मूढ बना दे, उनके हाथ शस्त्रग्रहण में समर्थ न रहें | सूचना - यहाँ इस प्रकार के अस्त्र के प्रयोग का संकेत स्पष्ट है कि जिससे शत्रु - सैन्य चेतना खो बैठता है और उसके हाथों में से अस्त्र शस्त्र गिर पडते हैं ।

अब इस मंत्र में जो शब्द आये हैं उनको अर्थ समझिए

मोहनास्त्र:-  एक प्रकार का प्राचीन काल का अस्त्र जिसके प्रभाव से शत्रु मोह के वश में या मूर्च्छित/ अचेत/ बेसुध हो जाना/ Unconscious हो जाता था.। अर्थात ऐसे पदार्थ अपने शत्रु पर फेंक दो जिससे वो बेहोश हो जाये और फिर उसे आसानी से मार सकते हैं। यह छल कपट से मारने वाली बात है धोखा देकर।

आग्नेयास्त्र(Firearms) :- ऐसे अस्त्र जिनसे आग निकलती हो । जैसे तोप और बंदूक इत्यादि

वायव्य-अस्त्र:- पौराणिक काल के युद्धों में प्रयोग किया जाने वाला एक दिव्य बाण था। इस बाण के प्रयोग से भयंकर तूफ़ान आता है और अन्धकार छा जाता है।

इसका प्रयोग महाभारतकाल में किया जाता था।

दिव्यास्त्र वे आयुध हैं जो मन्त्रों से चलाये जाते हैं- ये दैवीय हैं। प्रत्येक शस्त्र पर भिन्न-भिन्न देव या देवी का अधिकार होता है और मन्त्र-तन्त्र के द्वारा उसका संचालन होता है। वस्तुत: इन्हें दिव्य तथा मान्त्रिक-अस्त्र कहते हैं।

बाकी और कितने तरह के अस्त्र शस्त्र होते थे आप इस लिंक पर क्लिक करके पढ़ सकते हैं।

मंत्र - 2
हिंसा के प्रयोग ! तू शत्रुओं को इस प्रकार निर्मूल कर दे जैसे कि वायु वृक्षों को निर्मूल कर डालता है । इन्हें पाँव तले रौंद डाल - दूर भगा दे । इनके गौ, अश्व व पुरुषों को जीवित मत छोड़ । लौटकर इन हिंसा-प्रयोग करनेवाले पुरुषों को प्रजाहीन हो जाने की चेतावनी दे । उन्हें यह स्पष्ट कर दे कि इन प्रयोगों का परिणाम इतना भयंकर होगा कि तुम्हारा वंश ही उच्छिन्न हो जाएगा । 

अब देखिए इस मंत्र में क्या कहा जा रहा है। अपने शत्रु के प्रति इतनी घृणा है इन मंत्रों में की इसकी मिसाल कहीं नही मिलेगी। 
पांव तले रौंदना कोनसा सभ्य काम है भाई ?
गाय, घोड़े(अश्व) और पुरुष को जिवित मत छोड़, जानवर तक को मानने की शिक्षा दी जा रही है ये कैसी क्रूरता है ? क्या वैदिक ईश्वर इतना क्रूर है कि उसे ना मनाने वाले के प्रति इतनी घृणा भरी है?
गाय तक को मारने की बात की जा रही है क्या गाय माता नही रही अब? क्या अपनी गाय माता और शत्रु की गाय माता नही है ? 

मंत्र - 3
राजा व सेनापति सैनिकों के प्रति उदार वृत्तिवाले होते हुए शत्रु - सैन्य पर आक्रमण करें और उसे भस्म कर दे।

इस मंत्र में कहा जा रहा है कि शत्रु को समाप्त करके ही सुरक्षित बनोगे।

मंत्र - 4
हे आगे बढने वाले वीरो ! खूब आगे बढो, विजयी बनो । तुम्हारी भुजाएँ बड़ी तेजस्वी हों । तीक्ष्ण बाणों वाले, तेजस्वी शस्त्रों वाले व तेजस्वी भुजाओं वाले तुम इन निर्बल धनुषों वाले निर्बल शत्रुओं को विनष्ट कर डालो ।


इस मंत्र में अपने तेजस्वी और नुकीले अस्त्रों से कमजोर तीर वाले दुश्मन पर हमला करने को कहा जा रहा है। 

मंत्र - 5
सेनापति का वभ्र शत्रुओं में इस प्रकार मार-काट करने वाला हो कि वे घबरा जाएँ।

अर्थात इस तरह से मार काट करनी है कि दुश्मन घबरा जाए सहम जाए।

मंत्र - 6
हमारे घर में उत्तम लोहे की बनी हुई तलवारें हैं और हे शत्रुकृत् हिंसा-प्रयोग ! जितने प्रकार के तेरे पर्व हैं उन्हें भी हम जानते हैं । हम अपने यहाँ शत्रुविनाश के लिए अस्त्र - शस्त्रों को तैयार रक्खें तथा शत्रुकृत् हिंसा - प्रयोगों के प्रति सावधान रहें । शत्रुकृत् हिंसा - प्रयोग को सम्बोधित करते हुए हम कह सकें कि तू यहाँ से उठ ही खड़ा हो, यहाँ से सुदूर स्थान में चला जा । हे अज्ञातरूप में रहनेवाली हिंसाक्रिये ! यहाँ तू क्या चाहती है अर्थात् यहाँ तेरा क्या काम है ? तुझे हम समझ गये हैं - अब तू यहाँ से दूर ही रह ।

लोहे की बनी हुई तलवारों को दुश्मन के लिए पहले से तैयार रखें। इस मंत्र से ऐसा लग रहा है वैदिक काल में बहुत घमासान जंगे हुए करती थी। लेकिन वेद तो एक बार मे ही अवतरित हो गए थे, तो क्या वैदिक ईश्वर ने पहले से बता दिया था कि वेदों को ना मानने वालों के साथ केसा व्यवहार करना है? वैदिक ईश्वर है या जंग सिखाने वाले उस्ताद??

मंत्र - 7
यह राष्ट्रपति, गतमन्त्र के अनुसार, प्रबल आक्रमण के द्वारा तुम्हारे हृदयों में ( यानि चित्तानि) जो चित्त हैं, नष्ट करने की भावनाएँ हैं, उन्हें मोह अवस्था में ले जाए । वे चित्त चेतना शून्य हो जाएँ । हमें नष्ट करने के तुम्हारे स्वप्न समाप्त हो जाएँ । 2. यह अग्रि तुम्हारा पीछा करता हुआ तुम्हें तुम्हारे घरों में से भी सन्तप्त करके निकाल दे । तुम्हें सब ओर खूब ही सन्तप्त (वंचित) कर दे । तुममें भाग-दौड़ मच जाए और तुम कहीं भी रुक न पाओ ।

इस मानते को देखिए अपने शत्रु के प्रति कैसी घृणा है खतरनाक आक्रमण करो। उन्हें मोह अवस्ता में ले जाओ अर्थात बेहोशी की दशा में ले जाओ । यहां तक के घरों रक पीछा करके उन्हें घरों से निकाल दे। दुश्मन में भाग दौड़ मच जाए और कहीं भी रुक ना पाओ। खूब ही आक्रमणकारी नीति है ।

मंत्र - 8

राष्ट्रपति शत्रुओं पर ऐसा प्रबल आक्रमण करे कि उन की शत्रुओं में आयुधग्रहण का सामथ्र्य ही न रहे।

अर्थात शत्रु पर इतना खतरनाक आक्रमण करना है कि वो दुबारा उठ खड़ा होने की हिम्मत ही ना करे।

मंत्र - 9
Sandarbh :शत्रु के चुने हुए वीरों का विनाश 
हम समझदारी से अस्त्रवर्षां करके शत्रु के चुने हुए वीरों का विध्वंस कर दें । इनमें से कोई बच न पाये । मुख्य सैनिकों के विनाश से सामान्य सैनिकों का विनाश अनावश्यक हो जाता है । विशेष-विजयी राष्ट्र में तेजस्विता व अभ्युदय की वृद्धि होती है । लोग उत्तम वसुओंवाले, उत्तम निवासवाले ' वसिष्ठ ' बनते हैं । 

यहां वैदिक ईश्वर दुआ सीखा रहा है कि 
अस्र समझदारी से फेका जाए और दुश्मन को चुन चुन कर मारे और उनके श्रेष्ठ योद्धाओं को मारे। इन में से कोई भी ना बच पाए। 

मंत्र - 10

राजा सैनिकों को उत्साहित करे । वीर - प्रेरणा को प्राप्त सैनिक शत्रुओं को पराजित करने वाले हों, राजा स्वयं सेनाओं के नेतृव करे और प्रबल आक्रमण द्वारा शत्रुओं को समाप्त के दें


खतरनाक आक्रमण द्वारा शत्रुओं को समाप्त करो। और राजा शत्रुओं को जंग करने पर उभारे। वाह! शांति संदेश दिया जा रहा है प्रभू।

मंत्र - 11

हे जितेन्द्रियता व सौम्यता के भावों ! (राजा, न्यायाधीश) जितेन्द्रिय राजन व सौम्य न्यायाधीश ! आप दोनों मस्तिष्करूप धुलोक से ज्ञान से पापी के विनाशक आयुध को प्रवृत्त करो । इस प्रकार ज्ञान पूर्वक दण्ड दो कि पापी की पापवृत्ति नष्ट हो जाए । पृथिवी से ऐसे आयुध को उत्पन्न करो जोकि पाप का शंसन करने वाले के लिए विनाशक हो । पार्थिव अस्त्रों से तलवार आदि से शत्रु का विनाश किया जाए । २. पर्ववान मेघों से शब्दपूर्वक सन्तप्त करने वाली विद्युत शक्ति से उत्पन्न शस्त्र को बनाओ, जिससे कि दुष्टता में बहुत बढते हुए राक्षसी वृत्ति के पुरूष को आप हिंसित कर दें ।


Bhavarth . पापी को ज्ञान के अस्त्र से विनष्ट किया जाए समझदार उसके पाप को दूर किया जाए । ऐसा न होने पर पार्थिव अस्त्रों से दण्डित कर उसे पाप निवृत्ति के लिए प्रेरित किया जाए । विवशता में विद्युत शस्त्र से (पर बिठाकर) उसे समाप्त कर दिया जाए ।

अगर शत्रु ना माने तो उसके लिए बिजली से चलने वाला यंत्र बना कर उस पे बिठा कर उसे समाप्त कर दिया जाए।

मंत्र - 12
हे प्राणियों के रक्षक प्रभो ! सबको बराबर कर देनेवाली इस दिव्य अस्वरूप विद्युत् को हमारा लक्ष्य करके मत फेंकिए । हम पर आकाश से यह बिजली न गिर पड़े । गिरती हुई विद्युत् सबको गिराती हुई समीकृत- सा कर देती है । हमारे प्रति आप क्रोध न कीजिए - हम पाप से बचते हुए आपके क्रोध-पात्र न ही । हम आपके लिए नतमस्तक होते हैं । २. इस आकाश में होनेवाली- अलौकिक आकाश में शयन करनेवाली शक्तिशाली विद्युत् को हमसे भिन्न अन्य स्थान में ही कम्पित कीजिए । हम विद्युत्पतन के शिकार न हों ।

वेदीक ईश्वर को गुस्सा भी आता है वो भी इतना भयंकर की अपने मानने वालों पर बिजली गिरा देता है। वेदों के मानने वाले ही वैदिक ईश्वर से इतने डरे हुए हैं कि कह रहे हैं इस बिजली को हमारी तरफ मत फेंकिये। क्या वैदिक ईश्वय भूल गया था जो उसे उसके ही मानने वाले बता रहे हैं कि बिजली किधर गिरानी है ?? 

मंत्र - 13
[हे रुद्र परमात्मन् !] तो न हमारी गौओं में और पुरुषों में और न हमारी बकरी और भेड़ों में [ मारने की ] अभिलाषा कर । (उग्र) - हे बलवान् ! दूसरे [वैरियों] में घूम जा और हिंसकों की प्रजा [जनता] को मार


यहाँ भी वैदिक धर्मी वैदिक ईश्वर से दुआ कर रहे हैं कि हे परमात्मा हमारी गायों,पुरुषों बकरियों को मत मार दूसरों को मार ।
बताओ वैदिक ईश्वर को मारने काटने के अलावा और कोई काम नही है ? वैदिक धर्मी खुदकी गाय बकरी तो अपने ईश्वर से दुआ करके बचा रहे हैं लेकिन दूसरे की गाय बकरी प्रजा को मरवा रहे हैं। 

मंत्र - 14
इस ब्रह्मघाती (वैदविरोधी) के लोमों को काट डाल । इस की त्वचा (खाल) को उतार लो । इसके मांस के लोथड़ों को काट डाल । इसकी नसों को ऐंठ दे - कुचल दे । इसकी हड्डियों को मसल डाल । इसकी मज्जा को नष्ट कर डाल । इसके सर्वाअङ्गों व जोड़ों को विश्रथय ढीला कर दे बिल्कुल पृथक् - पृथक् कर डाल । कच्चे मांस को खा - जानेवाला इस ब्रह्मज्य को पृथिवी से धकेल दे और जला डाले ।

अथर्ववेद 12:5:68-73

अथर्ववेद के 12वें अध्याय के 5वें सूक्त का यह मंत्र है जिसमे वेद को ना मानने वाले के लिए इतना भिभत्स कार्य बताया है कि पूरी दुनिया में आपको ऐसा कार्य कहीं नहीं मिलेगा।

ध्यान रहे ये बात उस व्यक्ति के लिये कही जा रही है जो वेदों का इनकार करता है उन्हें नही मानता है। वेदों का विरोध करता है उसके बनाये नियम को नही मानता है।

मुझे नहीं लगता कि इससे ख़तरनाक मंत्र और भी होगा वेद में।

मंत्र - 15

मैं जो खाता हूँ, उससे बल का सम्पादन करता हूँ । इस प्रकार शक्ति के दृष्टिकोण से ही भोजन करता हुआ, अर्थात् स्वाद के लिए न खाता हुआ वज्रतुल्य दृढ़ शरीर का आदान करता हूँ । अब उस शत्रु के कन्धों को मैं इस प्रकार नष्ट कर डालता हूँ जैसे शक्तियों का स्वामी सूर्य  आच्छादन करनेवाले मेघ के अवयवों को छिन्न - भिन्न कर देता है ।

वैदिक धर्मी खाना इसलिए खाते हैं क्योंकि उनका शरीर एक हत्यार के रूप में काम मे ले सकें। और देखिए क्या कह रहा मंत्र दुश्मन के कंधों को ऐसे तोड़ू जैसे बादल छिन्न भिन्न हो जाते हैं।
अब बताओ ये किताब मानव की शांति के लिए है या मानव को खत्म करने के लिए है??

मंत्र - 16
मैं जो जल पीता हूँ तो शत्रु का निग्रह करके उसके रस को ही पी जाता हूँ, उसी प्रकार समुद्र नदीमुख से सारे जल को लेकर सम्यक् पी जाता है । हम भी उस शत्रु के प्राणापान आदि व्यापार को पीकर उस शत्रु को ही पी जाते हैं । जो कुछ मैं खाता हूँ तो शत्रु को ही निगल जाता हूँ । जैसेकि समुद्र नदी - जल को निगीर्ण कर लेता है । हम भी उस शत्रु के  प्राणों को निगलकर उस शत्रु को ही निगल जाते हैं ।
 
भावार्थ- हम खाते - पीते इस दृष्टिकोण को न भूलें कि इस खान - पान से शक्ति का सम्पादन करके शत्रुओं को ही खा - पी जाना है , स्वाद का दृष्टिकोण तो हमें ही शत्रुओं का शिकार बना देगा 

अब इस मंत्र के संबंध में तो कोई क्या ही बोले कि खाने पीने के साथ भी मारने की सोच रखते हैं ये मंत्र।
जिस तरह समुद्र नदी के जल को अपने समा के नदी के जल का नाम ही खत्म कर देता है ऐसे ही ये भी दुश्मन का नाम निशान खत्म के देते हैं। ये खाते पीते ही इस लिए हैं कि दुश्मन को ही खा पी जाएं।


Monday, 8 June 2020

आपत्ति नंबर 20
क़ुरआन सूरह बक़रह 
आयत : 89
और उससे पहले काफिरों पर विजय चाहते थे जो कुछ काफिरों पर फटकार है अल्लाह की ।

आपत्ति - 20

जिस प्रकार तुम गैर धर्म वालों को काफिर कहते हो उसी प्रकार क्या वे तुम को काफिर नहीं कहते ? और वे अपने धर्म के खुदा की ओर से तुम्हें फटकारते हैं फिर कहो कौन सच्चा और कौन झूठा है ? जब ध्यान से देखते हैं तो सारे धर्म वालों में झूठ पाया जाता है । और जो सच है वह सब में समान है । ये सारे झगड़े अज्ञानता के हैं ।

आपत्ति का जवाब 

इस वाक्य में तो स्वामी जी ने फैसला ही कर दिया जिसका मतलब इन शब्दों में समझने से कोई चीज बाधक नहीं कि सत्यार्थ प्रकाश जिसमें सारे धर्मो का खंडन है बिल्कुल अज्ञानता से भरी हुई है । हम यदि यह बात कहते तो हमारे समाजी दोस्त हमसे नाराज़ होते और हमें पक्षपाती और कौन कौन सी उपाधियां प्रदान करते मगर शुक्र है कि उनके अपने बयान ने फैसला कर दिया ।

हुआ   मुद्दई  का    फेसला    अच्छा  मेरे   हक  में 
जुलैख़ा ने किया खुद पाकदामन माहे किंआं का ।

बाकी रहा गैर कौमों का काफिर कहना । हम इससे नाराज नहीं काफिर का मायना इन्कार करने के हैं । हम स्वयं कहते हैं । 

"हम तुम्हारे दीन का इन्कार करते हैं । धार्मिक कामों में | हमारी तुम्हारी मुखालिफत सदैव के लिए है जब तक तुम अकेले खुदा पर ईमान न लाओ।"

हां स्वामी जी ! जिस प्रकार आप वेद के इन्कारियों को अधर्मी और नास्तिक कहते हैं इसी प्रकार ईसाई और हिन्दू आपको इंजील और पुराणों के इन्कार करने की वजह से अधर्मी कहते हैं फिर कहिए तुम में से कौन झूठा और कौन सच्चा है ? यहां तो स्वामी जी बड़ी समझौते की पालीसी चले हैं । असल यह है कि पंडित जी के कई रंग हैं । लेकिन आप रवयं ही समझ जाइए।

आपत्ति नंबर 19
क़ुरआन सूरह बक़रह 
आयत : 87
और अलबत्ता बेशक दी हमने मूसा को किताब और पीछे हम पैगम्बर (दूत) को लाए और दिए हमने ईसा बेटे मरयम को चमत्कार खुले और शक्ति दी हमने पाक रूह के साथ । तो क्या आया जब तुम्हारे पास साथ उस चीज़ के कि नहीं चाहते जी , तुम्हारे घमंड किया तुमने तो एक सम्प्रदाय को झुठलाया तुम ने और एक समप्रदाय को मार डालते हो ।  
आपत्ति - 19

जब कुरआन में गवाही है कि मूसा को किताब दी तो उसकी मानना मुसलमानों के लिए अनिवार्य ठहरा और जो जो इस किताब में कमी व खराबी है वे भी मुसलमानों के धर्म में आ गगी और चमत्कार की बातें सब बेकार हैं और सीधे सादे लोगों के बहकाने के वास्ते गढ़ी गयी हैं क्योंकि कुदरत के कानून और ज्ञान के विपरीत सारी बातें झूठी ही हुआ करती हैं । यदि उस समय चमत्कार थे तो अब क्यों नहीं होते । चूंकि इस समय नहीं होते इसलिए उस समय भी नहीं होते थे । इसमें तनिक भी संदेह नहीं । 

आपत्ति का जवाब

बाइबिल के मानने के आरोप का जवाब नंबर 5 में दे चुका हूं । पंडित जी की आदत है कि सीधे सादे लोगों के बहकाने को नम्बरों की संख्या बढ़ाते हैं । चमत्कारों का जवाब भी नंबर 14 में आ चुका है ।
आपत्ति नंबर 18
क़ुरआन सूरह बक़रह 
आयत : 86
ये वे लोग हैं कि मोल लिया सांसारिक जीवन परलोक के बदले । तो ने हल्की की जाएगी उनसे यातना और न मद्द किए जाएंगे ।
(आयत - 86
आपत्ति - 18

भला ऐसी घृणा व ईष्र्या की बातें कभी ईश्वर की ओर से हो सकती हैं ? जिन लोगों के गुनाह हल्के किए जाएंगे या जिनको मदद दी जाएगी वे कौन हैं ? यदि वे पापी हैं और पापों के बिना दंड दिए या हल्के किए जाएंगे तो अन्याय होगा । जो दंड देकर भी हल्के न किए जाएंगे तो जिनका बयान इस आयत में है ये भी दंड भोग कर हल्के हो सकते हैं और दंड देकर भी हल्के न किए जाएंगे तब भी अन्याय होगा । यदि गुनाहों से हल्के किए जाने वालों का मतलब ईश्वर से डरने वालों से है तो उनके गुनाह तो आप ही हल्के हैं । ईश्वर क्या करेगा । इससे मालूम हुआ कि यह लिखावट किसी विद्वान की नहीं और वास्तव में धर्मात्माओं को सुख और अधर्मियों को दुख उनके दुष्कर्मों के अनुसार ही सदैव देना चाहिए । 

आपत्ति का जवाब

पंडित जी ! इतनी घृणा कि “मैं बदकार अत्याचारियों को कभी आशीर्वाद नहीं देता" (त्रग वेद अशटक 1 अध्याय 2 वरग 18 मंत्र 2) "अगर मगर" में आपने जितना समय खोया किसी अरबी पाठशाला में जाकर इस आयत का मतलब पूछ लेते कि ये लोग कौन हैं तो इतना कष्ट आपको न होता । न इस्लाम के प्रति भ्रम फैलाने का आपको पाप होता । ये वही लोग हैं जिनको आप भी सत्यार्थ प्रकाश अध्याय 10 में मनु जी के हवाले से कर आए हैं । कि 
 "जो व्यक्ति वेद की निंदा करता है वही नास्तिक है ।"

बल्कि यही हैं जिनके बारे में वेद में कहा गया है ।

वे परमेश्वर की मदद और हिमायत से वंचित रहकर सदैव की मौत अर्थात जीने मरने के चक्कर में रहते हैं ।
सुनों और बड़े ध्यान से सुनो । असल कुरआनी शब्द ये हैं 

उलाइक ल्लाजी नश त र वुल हयातद दुन्या बिल आखिरति फला मुखफुफ्फु अन्हुमुल अज़ाबु वला हुम युन्सन
उन्हीं लोगों ने दीन के बदले दुनिया को पसन्द किया । अतः उनसे यातना में कमी न होगी और न ही उनको किसी से मदद पहुंचेगी । 
 
समाजियो ! यदि अरबी लिखने की योग्यता रखते हो तो इन शब्दों पर सोच विचार करो, नहीं तो अनुवाद ही देख लो और अपने स्वामी की आपत्तियों की दाद दो ।

यह भी पढ़ें
आपत्ति नंबर 6, क़ुरआन सूरह बक़रह आयत : 10




Sunday, 7 June 2020

आपत्ति नंबर 17
क़ुरआन सूरह बक़रह 
आयत : 84-85
और जब ली हमने प्रतीज्ञा तुम्हारी, न डालो तुम रक्त अपने आपस के और न निकाल दो किसी आपस में अपने को घरों अपने से । फिर इकरार किया तुमने और तुम गवाह हो । फिर तुम वे लोग हो कि मार डालते हो आपस में अपने के और निकाल देते हो  एक सम्प्रदाय को आप में से घरों उनके से । 
(आयत : 84-85)
आपत्ति - 17

भला प्रतीज्ञा करना, कराना कोई अल्पज्ञान और मन बुद्धि वाले लोगों की बात है या ईश्वर की ? जब ईश्वर सर्व ज्ञाता है तो ऐसी बेहूदा बातें दुनिया दारों की तरह क्यों करेगा ? आपस में रक्त न बहाना और अपने धर्म वालों को घर से न निकालना और दूसरे धर्म वालों का रक्त बहाना और घरों से उनको निकाल देना भला कौन सी अच्छी बात है ? यह तो मूर्खता और पक्षपात से भरी व्यर्थ की बात है । क्या ईश्वर पहले से ही नहीं जानता था कि यह प्रतीज्ञा मेरे खिलाफ करेंगे ? इससे स्पष्ट होता है कि मुसलमानों का खुदा भी इसाइयों के बहुत से गुण रखता है और यह कुरआन दूसरी किताबों का मोहताज है क्योंकि इसकी थोड़ी सी बातों को छोड़कर शेष सब बाइबिल की हैं ।

आपत्ति का जवाब

ऐसी निरर्थक आपत्तियां यदि कोई और करता तो उसकी शिकायत भी होती । पंडित जी के स्वभाव में तो ऐसी ही बाते भरी थीं । इसलिए वे अपनी आदत से मजबूर हैं । क्या अजीब लाजिक छांटी है कि प्रतीज्ञा कराना भी सीमित व मन बुद्धि वाले लोगों का काम है । पंडित जी ईश्वर की प्रतिज्ञा लेने का मतलब आदेश का होना है यदि आदेश देना भी सीमित बुद्धि वालों का काम है तो सारे वेद भगवान की टीका लिखने का कष्ट क्यों उठाया था ? आखिर उसमें भी तो आदेश ही हैं ।

बाकी मरने मारने का जवाब वाक्य नंबर 2 में आ चुका है हां यह भली कही कि पहले नहीं जानता था कि ये प्रतीज्ञा के विरुद्ध करेंगे ? क्या परमेश्वर नहीं जानता था कि आर्य व्रत के आयों ने मेरे प्रस्तावित निर्देशों पर तो अमल करना नहीं जिसका बदला उनको दुनिया ही में महमूद गजनवी और मुहम्मद गौरी से दिया जाएगा । फिर क्यों हथियारों की सफाई और उनको तैयार रखने का निर्देश देता रहा । (देखो नम्बर 2)

हाथ ला उस्ताद क्यों कैसी कही ?

सच है, बहुत से लोग ऐसे हठ धर्म होते हैं कि बात करने वाले के खिलाफ असल उद्देश्य की तावील करते हैं उनकी बुद्धि अंधेरे में।  फंस कर नष्ट हो जाती है ।
                                                                           

आपत्ति नंबर 16
क़ुरआन सूरह बक़रह
आयत : 82
वे सदैव के लिए जन्नत में रहने वाले हैं।

आपत्ति - 16

चूंकि जीव (आत्मा) असीम गुनाह व सवाब करने की ताकत नहीं रखते इसलिए सदैव के लिए जन्नत या जहन्नम में नहीं रह सकते और यदि ईश्वर ऐसा करे तो वह अन्याय से अनभिज्ञ और बे खबर ठहरे । यदि कियामत की रात न्याय होगा तो मनुष्यों के गुनाह व सवाब समान होने चाहिए यदि कर्म असीम ही नहीं हैं तो उनका फल असीम क्यों कर हो सकता है और मुसलमान लोग दुनिया की पैदाइश सात आठ हजार साल से भी कम बताते हैं क्या इससे पहले खुदा निकम्मा बैठ रहा था ? और क्या कियामत के पीछे भी निकम्मा रहेगा । ये बातें लड़कों की बातों की तरह हैं क्योंकि परमेश्वर के काम सदैव होते रहते हैं और जितना किसी के गुनाह व पुन होते हैं । उसी के अनुसार उसे फल देता है अतः कुरआन की यह बात सच्ची नहीं है ।

आपत्ति का जवाब

स्वामी जी को यदि अदालत मिल जाती तो शायद चोर को इतनी ही मुद्दत कैद करते जितनी उसने चोरी करने में खर्च की होती । पंडित जी यदि कर्मों के समय दंड या इनाम है तो कृष्ण जी । गीता में क्यों कहते हैं कि आत्मा सदकर्म करके आवागमन के चक्कर से छूट जाती है यद्यपि आप इसे किसी खास कारण से न मानते हों लेकिन कृष्ण जी का फरमान आपकी सोच से कहीं । बढ़कर है । आप किसी तर्क से बता दें कि कर्मों के समय समान दंड व इनाम का होना जरूरी है यद्यपि कानून शाही में हम ऐसे अपराध भी देखते हैं कि थोड़े से समय में किए जाते हैं और आजीवन कारावास उनका दंड है । अतएव आप भी बहवाला  मनुजी सत्यार्थ प्रकाश पृष्ठ 201 अध्याय 6 न0 42 पर लिखते हैं 
सरकारी कर्मचारी को रिश्वत लेने पर जायदाद की जती और सारी उम्र के लिए देश निकाला और झूठी गवाही देने पर जबान काट डाली जाए और मरने के बाद सुख वैभव भी नसीब में नहीं।
 
बताइए । मुद्दत के बराबर दंड मिला या अधिक । सच पूछो तो अपनी मन गढ़त बातों का यही नतीजा होता है कि आदमी को नदामत के सिवा कुछ नहीं मिलता । हां यह अच्छी भली दलील है जो पंडित जी ने वाक्य 104 में दी है ।
     
यदि मीठा ही रोज खाया जाए तो थोड़े ही दिनों में जहर की तरह मालूम होने लगता है । 

भला स्वामी जी आपने मीठे की मिसाल दी तो नमकीन की क्यों ने दी । यदि कोई एक मुद्दत तक मीठा खाकर मीठे से घबराता है तो इसलिए कि मीठा उसके जी की मर्जी के अनुसार इतना नहीं होता जितना नमकीन होता है अतः वह मीठे से नहीं बल्कि ना पसन्दीदा चीजों से नफरत कर जाता है । क्या ही समझ का फेर है । भला कोई व्यक्ति यदि दुनिया में बहुत समय तक ऐशो आराम में रहे तो किसी समय उसका मन चाहता होगा कि में कैदखाने में भी कुछ समय गुजारू ? 

समाजियो ! धर्म से कहना, आठ हजार साल दुनिया की उम्र आपने कहीं कुरआन के 31वें_1 पारे में तो नहीं देखी ? किसी आयत या हदीस में यह बात कहीं नहीं मिलती बल्कि मात्र आपका या आप जैसों का ख्याल है ।

हां यह भी खूब कही कि इससे पहले ईश्वर निकम्मा बैठा था । पंडित जी ! लीजिए हम आपको बताते हैं यह तो आपकी मामूली बात है कि मुसलमान दुनिया की उम्र आठ हजार साल मानते हैं हां इसमें संदेह नहीं कि मुसलमान बड़े पापी हैं कि ये अल्लाह की जात को छोड़ कर इस सारी कायनात को हादिस (समाप्त होने वाली) अवश्य जानते हैं क्योंकि सारी कायनात मिश्रित है और मिश्रित अनादि नहीं हो सकता इस बात के स्पष्टीकरण के लिए आप ही के कलाम को प्रस्तुत करना उचित है । आप स्वयं नास्तिकों के जवाब में लिखते हैं ।

बिना कर्ता के कोई भी हरकत या हरकत से पैदा होने वाली वस्तु नहीं बन सकती जो जमीन आदि चीजों की ख़ास तरकीब से मिल कर बनी हुई नजर आती हैं अनादि कालिक कभी नहीं हो सकतीं ।
आर्ष साहित्य प्रचार ट्रस्ट
और पृष्ठ 557 पर लिखते हैं
जो मिलाप से पैदा होता है वह अनादिकालिक व सर्वकालिक कभी नहीं हो सकता ।
(सत्यार्थ प्रकाश अध्याय 12 ) 
आप दुनिया की उम्र चाहे कितनी ही लगा लें और कितने ही इसके कल्प (बार बार पैदा होने) कहें मगर इससे तो आप इन्कार नहीं कर सकते कि दुनिया मुक्कब (मिश्रित) है और जो मिश्रित है । वह नवीन है । नतीजा साफ है कि दुनिया के वजूद में आने का आरंभ है जिससे पहले वह न थी । अतएव आप स्वयं लिखते हैं ।
जो वस्तु मिलाप से बनती है वह मिलाप से पहले नहीं होती और टूट फूट जाने के बाद भी नहीं रहती।
 (पृष्ठ - 288 अध्याय 8 न0 28)

अतः आपके कलाम से भी यह पता चला कि ईश्वर किसी समय निकम्मा बैठा होगा । ऐसा ही किसी समय निकम्मा बैठेगा । यदि आप कहें कि वर्तमान दुनिया का आरंभ व अन्त है मगर इसका सिलसिला अनादिकालिक है । एक दुनिया के बाद दूसरी और दूसरी दुनिया के बाद तीसरी । (सत्यार्थ प्रकाश अध्याय 8 न24)
   
तो यह आपके उसूल के खिलाफ है क्योंकि अनादि पदार्थ आपने केवल तीन ही गिने हैं । परमेश्वर (खुदा) जीव (आत्मा) प्रकृति, अविभाजित अंश । (सत्यार्थ प्रकाश अध्याय 8 पेज 172)

अतः यदि इन चीजों के सिवा दुनिया के सिलसिले को भी आपने प्राचीन और अनादि कालिक माना तो चार चीज़ क्यों अनादिकालिक मानते हो । जिससे नास्तिकता की बुनियाद पक्की हो । यह बात सही है कि बाहरी पदार्थों को सम्पूर्ण पर प्राथमिकता जमानी होती है जिसका साफ मतलब यह है कि एक समय अवश्य ऐसा होता है कि पदार्थ हों मगर कुल (सम्पूर्ण) जो उनसे मिलकर बना है न हो अतएव आप भी मानते हैं कि "जो वस्तु मिलाप से बनती हैं वह मिलाप से पहले नहीं होती।" अतः इस उसूल को मानते हुए भी दुनिया के सिलसिले को प्राचीन कहना विरोध करने वालों के साथ होना है जो बुद्धिमानों के लिए उचित नहीं तो फिर नतीजा साफ है कि दुनिया का सिलसिला किसी खास समय से चला है कि जिसको ईश्वर ने इसके लिए उचित समझा इससे पहले ईश्वर बेकार हो या काम वाला । हम दोनों के सोचने से बाहर हैं | हमारा तो केवल इतना ही कहना है कि
 अल्लाह ने सब चीजों को पैदा किया और हर चीज़ को जानता है।" 
जब कुछ न था तब निराकार था
खिलकृत  का  पैदा करनहार था

[नोट:- सृष्टि रचना के बारे में दयानन्द जी किस तरह विफल हो गए ये जानने के लिए हम अनवर जमाल साहब की लिखी हुई किताब "दयानन्द जी ने क्या खोजा क्या पाया?" मेसे एक छोटा सा अंश सृष्टि रचना और परमाणु पर देखते हैं 

सृष्टि संरचना की ग़लत कल्पना को वैदिक सिद्धान्त समझ बैठे स्वामी जी? 

... सबसे सूक्ष्म टुकड़ा अर्थात जो काटा नहीं जाता उसका नाम परमाणु, साठ परमाणुओं से मिले हुए का नाम अणु, दो अणु का एक द्वयणुक जो स्थूल वायु है तीन द्वयणुक का अग्नि, चार द्वयणुक का जल, पांच द्वयणुक की पृथिवी अर्थात तीन द्वयणुक का त्रसरेणु और उसका दूना होने से पृथ्वी आदि दृश्य पदार्थ होते हैं। इसी प्रकार क्रम से मिलाकर भूगोलादि परमात्मा ने बनाये हैं।
(सत्यार्थ प्रकाश, अष्टम. पृ.152)

हरेक अणु में 60 परमाणु होते हैं। ऐसा कहना विज्ञान के विरुद्ध है।

परमाणु टूटने के साथ ही स्वामी जी का दर्शन मिथ्या सिद्ध हो गया

परमाणु को अविभाज्य मानना भी ग़लत है। दरअसल प्राचीन काल से भारतीय दर्शन में परमाणु का न टूटना बताया गया है और स्वामी जी के काल तक परमाणु को तोड़ना संभव नहीं हुआ था। इसलिए वह परमाणु को अविभाज्य लिख गए हैं परन्तु अब परमाणु को तोड़ना संभव है। विदेशी वैज्ञानिकों ने अपने विज्ञान से परमाणु को तोड़ डाला। भारत के वैज्ञानिकों ने उनसे यह विज्ञान सीखा। आज भारत में कई ‘परमाणु रिएक्टर’ इसी सिद्वान्त के अनुसार ऊर्जा उत्पादन करते हैं। परमाणु के टूटने के बाद स्वामी जी का परमाणु विज्ञान व्यर्थ और कल्पना मात्र सिद्ध हुआ। दरअसल यह कोई वैदिक सिद्धान्त नहीं है बल्कि एक दार्शनिक मत है। विदेशी वैज्ञानिकों ने जैसे अविष्कार बिना वेद पढ़े ही कर दिए हैं, आर्य समाजियों को अपने गुरूकुलों में वेद पढ़कर उनसे बड़े अविष्कार कर दिखाने थे। वे ऐसा कुछ नहीं कर पाए, सिवाए दूसरों की मज़ाक़ उड़ाने और डींग हाँकने के। परमाणु टूट गया लेकिन फिर भी वे दर्शन की उन पुरानी मान्यताओं को नहीं छोड़ पाए, जिन्हें भारतीय वैज्ञानिकों ने त्याग दिया है।

आग, पानी, हवा और पृथ्वी की संरचना का वर्णन भी विज्ञान विरूद्ध है। उदाहरणार्थ चार द्वयणुक अर्थात 8 अणुओं के मिलने से नहीं बल्कि हाइड्रोजन के 2 और ऑक्सीजन का 1 अणु, कुल 3 अणुओं के मिलने से जल बनता है। इसी तरह पृथ्वी भी पांच द्वयणुक से नहीं बनी है बल्कि कैल्शियम, कार्बन, मैग्नीज़ आदि बहुत से तत्वों से बनी है और हरेक तत्व की आण्विक संरचना अलग-अलग है। वायु के विषय में भी स्वामी जी का मत ग़लत है। वायु भी दो अणुओ से नहीं बनती। जो बात स्वामी जी ने जैनियों के विषय में कही है। वह स्वयं उन पर ही चरितार्थ हो रही है। देखिए-
 स्थूल वात का भी यथावत ज्ञान नहीं तो परम सूक्ष्म सृष्टिविद्या का बोध कैसे हो सकता है?
 (सत्याथ प्रकाश, द्वादशसमुल्लास, पृष्ठ 294)]

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 1 - कुरआन के कुल 30 पारे हैं ।
आपत्ति नंबर 15
क़ुरआन सूरह बक़रह
आयत : 73
इस तरह खुदा मुर्दो को जीवित करता है और तुम को अपनी निशानियां दिखाता है ताकि तुम समझो । 

आपत्ति - 15

यदि मुर्दो को ईश्वर जीवित करता था तो अब क्यों नहीं करता ? क्या वह कयामत की रात तक कब्रस्तान में पड़े रहेंगे ? क्या आजकल दौरा सुपुर्द है ? क्या इतनी ही अल्लाह की निशानियां हैं । क्या धरती, सूरज, चांद आदि निशानियां नहीं हैं ? क्या कायनात में जो भिन्न भिन्न प्रकार के प्राणी नजर आते हैं । यह कोई कम निशानियां हैं ?

आपत्ति का जवाब

इस आयत का अनुवाद जो आपने लिखा है गलत है । सही अनुवाद यह है।

इसी तरह ईश्वर मुर्दो को जीवित करेगा

 अतएव शाह अब्दुल कादिर साहब ने अनुवाद यूं किया है । 

इसी तरह ईश्वर जिला देगा मुर्दे ।

तो आपका हर सवाल सिरे से गलत हो गया । जो बिगाड़ का आधार फैलाने वाला था आज कल दौरे सुपुर्द नहीं बल्कि इनाम व दंड भुगत रहा है आपने कुरआन पढा होता तो आप को मालूम होता । सुनिए 

फ़िरऔन और उसके आज्ञा पालक के पक्ष में फ़रमाया (सुबह व शाम फिरऔनियों को आग पर पेश किया जाता है) कियामत में ऐसे ही शरीरों के साथ उठेंगे जैसे शरीरों के साथ वे दुनिया में जीते थे वर्ना इनाम व दंड तो मरते ही आरंभ हो जाता है ।
 (यासीन : 26-27)
निस्सन्देह सारी कायनात ईश्वर की प्रकृति की निशानियां हैं । देखिए अल्लाह फ़रमाता है । (जार्रियात - 20
लेकिन स्वामी जी ! आयत में किस निशानी का नाम लिया है और किसका इन्कार किया है जो आप यह आपत्ति करने बैठ गए ।

Thursday, 4 June 2020

इब्लीस ने अल्लाह का हुक्म नही माना तो क्या इब्लीस बड़ा हो गया?

किस्सा आदम-ओ-इब्लीस

यह क़ुरआन की सूरह आराफ़ 7 की आयत 10 11 12 13 14 15 16 17 18 है जिनमें आदम और इब्लीस का किस्सा बयान हुआ है । 

इस में अल्लाह तआला के कहने पर भी इब्लीस ने आदम अलै• को सजदा करने से मना कर दिया और जब उससे पूछा गया कि, "तुझे किस चीज ने आदम को सज़्दा करने से रोका है ?"
तो उसने अपनी तख़लीक़ (बनावट) पर घमंड करते हुए कहा कि मैं आग से बना हूँ और आदम मिट्टी से, मैं(इब्लीस) आदम से बेहतर हूँ।

बस इसी घमंड की बिना पर उसने ख़ुदा का हुक्म मानने से इनकार कर दिया । और वो गुनहगार बन गया । अल्लाह हमें इस्लाम पर पूरी तरह चलने की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए । 

उसके बाद उसने ये वादा किया कि वो अल्लाह के बंदों को अल्लाह की राह से क़यामत तक भटकाएगा; तो अल्लाह ने उसे मोहलत दी । लेकिन जो अल्लाह का बंदा होगा वो नहीं भटकेगा और अल्लाह की बताई हुई राह पर रहेगा ।

आपत्ति
अब यहाँ पर एक सवाल किया जाता है, वो ये है कि अल्लाह ने सबको सज़्दा करने के लिए कहा था लेकिन इब्लीस ने सज़्दा करने से मना कर दिया और इब्लीस ने अल्लाह की नाफ़रमानी कर दी, तो अल्लाह ने इब्लीस का कुछ किया नहीं, और लोग इससे ये परिणाम (नतीजा/रिजल्ट) निकालते हैं कि चूंकि अल्लाह की नाफ़रमानी करने के बावजूद भी अल्लाह इब्लीस को सजा नहीं दे पाए, तो अल्लाह बड़ा है या इब्लीस ? ये सवाल कुछ लोग करते हैं ।

आपत्ति का जवाब 

पहली बात तो ये हैं कि इब्लीस जिन्नों में से था फरिश्तों में से नहीं । और जिन्नों और इंसानों दोनो को अपनी पसंद चुनने की आजादी दी गयी है यानी इन दोनों मख़लूक़ात को free will दी गई है। इंसानों और जिन्नों को जो अच्छा लगे वो उन्हें करने का इख्तियार है। इस बात की आजादी अल्लाह तआला ने इंसानों और जिन्नों को दी है ।

और यहाँ पर इब्लीस ने अपनी पसंद की आजादी का भरपूर फायदा उठाया और उसने खुदा की बात मानने से इनकार कर दिया (और अवज्ञाकारी हुआ) । याद रहे कि इस वाकिये से पहले वो नेकोकार भी था इबादतगुजार भी था । लेकिन यहाँ उसने अपनी पसंद चुनी । अल्लाह ने पसंद चुनने की आजादी दी हुई है लेकिन अगर इंसान और जिन दोनों मे से कोई भी बुरे अमल करेगा और ख़ुदा की नाफ़रमानी करेगा तो उसका बदला आख़िरत में उसे मिलेगा । जैसा अल्लाह ने कहा कि: जो भी तेरी (इब्लीस) की पैरवी करेगा अल्लाह उसे और उसके पैरोकारों को जहन्नम से भर देंगे ।

नोट :- अल्लाह चाहता तो उसे उसी वक्त सजा दे देता लेकिन बुरे आमाल पर सजा देना और अच्छे आमाल पर जज़ा देना ये आख़िरत तक के लिए रोक दिया है ।

यहाँ एक बात और समझने की है कि अगर अल्लाह, इब्लीस से बड़ा न होता, तो इब्लीस को उस जगह से नहीं निकाल पाता और इब्लीस वहीं डेरा डाल कर बैठा रहता । लेकिन अल्लाह ही सब से बड़ा है तो उसने उसे उस जगह (जन्नत) से निकाल दिया ।

एक बात और यहीं समझ लें कि इब्लीस ने अल्लाह से मोहलत माँगी है यानी इजाज़त माँगी है कि मैं ऐसा काम करूँगा । अगर इब्लीस अल्लाह से बड़ा होता तो इब्लीस इजाज़त नही मांगता बल्कि कहता कि मैं तेरे हर बंदे को गुमराह करूँगा ।

अल्लाह हमें इब्लीस से अपनी पनाह में रखे । 

एक सवाल और उठ सकता है कि इब्लीस ने ही इनकार क्यों किया फरिश्तों ने क्यों नहीं किया ? तो उसके लिए ये बात जान लेनी चाहिए कि फरिश्तों की तख़लीक़ (सृष्टि) में नाफ़रमानी जैसा कोई शब्द है ही नहीं उन्हें बस हुक़्म दिया जाता है और वो उसे पूरा कर देते हैं वो नाफ़रमानी कर ही नहीं सकते हैं ।

एक उदाहरण से समझते हैं कि जिस तरह बाप की नाफ़रमानी बेटा कर देता है तो बाप को अधिकार होता है कि वो उसे सजा दे या छोड़ दे । अब आप इससे ये परिणाम नहीं निकालेंगे की बाप से बड़ा बेटा हो गया, अगर बाप ने बेटे को सजा दिए बगैर छोड़ दिया दिया तो ।


एक प्रश्न ये उठता है कि सजदा करने का आदेश तो फरिश्तों को था फिर इब्लीस तो जिन्नों में से था उस पर वो आदेश लागू कैसे हो सकता है?
तो इसका जवाब ये है कि जब वहां पर बहु-संख्या में फरिश्ते मौजूद थे तो फरिश्तों के साथ साथ यह आदेश जिन्न पर भी लागू होगा । और एक बात ये की अगर उसके लिए हुकुम नही था तो फिर उसने यही बात क्यों नही कही की मुझे तो आदेश था ही नहीं फिर में सजदा क्यों करता? अल्लाह क्या मुझे भी हुकुम है इसमें? उसने पूछा क्यों नही? लेकिन जब अल्लाह ने उससे पूछा तो उसने अपने आग से होने की वजह को बताया और घमंड ज़ाहिर किया।
फिर यह भी कहा जाता है कि जिन्न की रचना आदम से श्रेष्ठ थी यह बात वही लोग कह रहे हैं जो खुद मिट्टी के हैं और खुद को श्रेष्ठ(आर्य) मानते हैं। इस्लाम मे जीवों में सबसे श्रेष्ठ मनुष्य को ही माना गया है।
जिन्न को चाहिए था कि ईश्वर का आदेश मानता जो कि सर्वोपरी है। अल्लाह को यह अधिकार है कि वो हर किसी का इम्तेहान ले, और अल्लाह ने उसका इम्तेहान लिया जिसमे वो विफल हो गया। और उसने विद्रोह किया अल्लाह के विरुद्ध यह सबसे पाप उसने किया। अगर वो चाहता तो क्षमा मांग कर वापस फरमाबरदार बन सकता था आदम अलै. की तरह जैसे आदम अलै. से गलती हुई और उन्होंने तौबा की तो वो भी तौबा कर सकता था लेकिन उसे तो विद्रोह करना था यही उसका सबसे बड़ा गुनाह था।

उसे इंसानियत को गुमराह करने की इजाज़त इसी लिए दी गयी क्योंकि उसने इजाज़त मांगी थी अल्लाह चाहता तो उसको इजाज़त न देता लेकिन यह उसकी फ्री विल के साथ नाइंसाफी होती और यह एक चुनौती थी सारी इंसानियत के लिए इब्लीस की तरफ से जिसे अल्लाह ने अपने बंदों के लिये रखा और आख़िरत में, अल्लाह के बंदों को इसका सवाब मिलेगा जो इससे बच जाएगा। 

फिर एक प्रश्न ये भी आता है कि अल्लाह ने सजदा करने का आदेश अपने सिवा किसी को नही दे रखा है तो फिर अल्लाह ने अपने आदेश के विरुद्ध ही आदम को सजदा करने का आदेश क्यों दिया? 

तो इसका उत्तर ये है कि अल्लाह ने अपने लिए जो सजदा करने का आदेश दिया हुआ है वो अल्लाह को पूज्य मान कर सजदा करने का आदेश दिया हुआ है। आदम के लिए जो सजदा करवाया है वो अल्लाह के लिए जो सजदा होता है इससे भिन्न है। यह बात इब्लीस को मालूम थी। अगर इब्लीस को इस बारे में शंका थी तो फिर इसके बारे में अल्लाह से सवाल करता कि इस सजदे का क्या मतलब है ? सजदा तो तुझे ही किया जा सकता है फिर यह आदम को क्यों? फिर अल्लाह जवाब देता । लेकिन उसने तो सीधे ही विद्रोह कर दिया अपने मालिक के खिलाफ अपनी सृष्टि(तख़लीक़) पर घमंड करते हुए जबकि सर्वोपरि तो ईश्वर का आदेश है।







Tuesday, 2 June 2020

क्या अल्लाह भी नमाज़ पढ़ता है?

क्या अल्लाह भी नमाज़ पढ़ता है?

आज के वक़्त में इस्लाम के विरुद्ध आपत्ति करने वाले भ्रामक जानकारियाँ फैला कर अपना स्वार्थ साधना चाहते हैं और दूसरे लोगों को इस्लाम के विरुद्ध गुमराह करना चाहते हैं।

ऐसी ही एक पोस्ट हमारे पास आई जिसमे लिखा था "क्या अल्लाह भी नमाज़ पढ़ता है?"

हमने जब इसकी तहक़ीक़ की तो मालूम हुआ कि यह जानकारी एक ब्लॉग से फैलाई जा रही है और उस ब्लॉग का नाम है भंडाफोड़ू। 

वह पोस्ट क्या थी हम आपको दिखाते हैं और आप पहले वह पोस्ट पढ़ लें फिर उसका जवाब पढ़िए।


 आपत्ति

4 इमाम  अहमद  का परिचय 

इनका पूरा  नाम "अहमद  इब्न मुहम्मद इब्न  हम्बल अबू  अब्दुल्लाह अश्शेबानी - احمد بن محمد بن حنبل ابو عبد الله الشيباني‎  "  है  ,  इनका  काल ईस्वी 780–855 CE/164–241 AH,यह सुन्नियों  के हम्बली  फिरके के विद्वान्  , और  हदीसों  के ज्ञाता   थे यही नहीं  इन्हों    कई हदीसें   भी   जमा   की  थीं  ,हदीसों के इनके संकलन की किताब  का  नाम  "किताब  अल सुन्नाह   -كتاب السنة   " है  इसी किताब  में एक ऐसी बात दी गयी है  ,  जो अल्लाह के बड़े होने की पोल खोलने के लिए  काफी   है  ,देखिये  हदीस ,

5-मुहम्मद ने अल्लाह को नमाज पढ़ते देखा 

इमाम  अहमद   की "in Kitab Al Sunna by Abdullah bin Ahmad, vol.1, p.27

में लिखा   है  "जब मुहमद   मेराज (जन्नत यात्रा  ) सातवें  आसमान पर  गए तो उनका सामना  जिब्राईल  से  हुआ  ,तो उसने इशारे  से   रोका और कहा  ठहरो  अभी  अल्लाह  नमाज  पढ़  रहे   हैं  ,रसूल  ने पूछा  क्या  अल्लाह भी नमाज  पढ़ता  है   ?जिब्राइल बोलै हाँ  , अल्लाह भी नमाज पढ़ता  है . फिर  रसूल  ने पूछा  ?अल्लाह   नमाज में क्या पढ़ता  है  ?तब जिब्राइल ने  कहा  अल्लाह  कहता है ' स्वामी  की  जय   हो   !या   स्वामी  की बड़ाई  हो 

when Muhammad reached the 7th heaven during the Isra and Mi'raj, he encountered Gabriel, who immediately said “Shh! Wait, for Allah is praying (Sala).” Muhammad asked: “Does Allah pray?” to which Gabriel said, “Yes, he prays.” Muhammad then asked, “What does he pray?” and Gabriel said “Praise! Praise the Lord!"

عندما وصل محمد إلى الجنة السابعة في الإسراء والمعراج ، قابل جبرائيل ، الذي قال على الفور: "ص! انتظر ، لأن الله يصلّي (سالا). سأل محمد: "هل يصلي الله؟" الذي قال جبريل: "نعم ، يصلي." سبح الرب

كتاب السنة ـ الإمام عبد الله بن الإمام احمد-
vol.1, p.27

6-हदीस  का   वाक्य  विश्लेषण 
इस हदीस के मुख्य  वाक्यों को  हम  अलग  अलग  करके    देखते  है जिस से बात   स्पष्ट हो जाये   ,
1-मुहमद   से जिब्राइल ने कहा  " श श  प्रतीक्षा करो  , अल्लाह नमाज  पढ़   रहा  है  -""ص! انتظر ، لأن الله يصلّي-श इंतजर लि इन्नल्लाह यूसल्ली .
2-मुहम्मद  ने पूछा  क्या अल्लाह भी नमाज पढ़ता  है  ?-हल  युसल्ली  अल्लाह   "هل يصلي الله؟" 
3-जिब्राइल ने कहा  हाँ  नमाज पढ़ता  है  .नअम युसल्ली -نعم ، يصلي
4-इस बात को स्पष्ट  करते  हुए  जिब्राइल  बोला "अपने  स्वामी  की  स्तुति   करता   है  - सब्बिह अर्रब -سبح الرب

7-अल्लाह के ईमान वालों  से सवाल 

हमें  पूरा  यकीन है  कि इस  हदीस  के मुताबिक  कोई भी इमान वाला  जिब्राइल  और मुहम्मद को झूठा   कहने  की हिमाकत   नहीं  करेगा   ,  इसलिए   जो भी  मुस्लिम  इसे  पढ़े      बराये मेहरबानी  इन   सवालों  का  जवाब   दे  ,
 1.अल्लाह को नमाज पढ़ने की  जरुरत क्यों  पद  गयी  ?
2.जब  काबा  मक्का  में है ,तो अल्लाह किसकी तरफ नमाज पढ़ रहा  था  ?
3-नमाज में सूरा फातिहा  पढ़ना  जरुरी  है , जिसमे अल्लाह की तारीफ  है  , तो क्या अल्लाह  जन्नत में नमाज के अंदर अपनी  ही तारीफ  कर  रहा  था ?
4-जब  खुद  जिब्राइल ने मुहम्मद को बताया कि अल्लाह  नमाज में  'रब यानि  स्वामी की वंदना करता है  , तो अल्लाह का"  रब - الرب  " कौन  है  ?
5-और अंतिम  सवाल  है  , अगर  इस अल्लाह     या  जन्नत के अल्लाह  का भी कोई  स्वामी   या रब है  तो  अल्लाह  की इबादत करना  और उसकी  तारीफ  करना मूर्खता  नहीं   तो और क्या  है  ?
आप लोगों  की  क्या  राय है कमेंट जरूर करिये  और इस जानकारी को  सब तक भेजिए  .

यह वो पोस्ट है जो भंडाफोड़ू के ब्लॉग पर लिखी गयी है।
जब हमने इस पोस्ट में दिए हुए अरबी टेक्स्ट को गूगल किया तो इसी ब्लॉग के जो रिजल्ट सामने आए जिसे आप यहाँ क्लिक करके देख सकते हैं पांचवे पॉइंट से आप इस पोस्ट को पढ़ सकते हैं।


 आपत्ति का जवाब:

जब आप इस अरबी टेक्स्ट को पढ़ेंगे और इसका अनुवाद करेंगे तो आपको यही लगेगा जैसा इसमे लिखा है। लेकिन असल बात यह है कि यह text इस किताब में बताए गए हवाले पर नहीं है । इस टेक्स्ट की तहक़ीक़ हमने जब इनकी बताई हुई किताब से की तो उस किताब में ऐसा कुछ नहीं लिखा था।

ये इमेज है पढ़ कर देख सकते हैं।

इस पोस्ट लिखने वाले भंडाफोड़ू ने इस किताब का लिंक भी अपनी पोस्ट में दिया है। हमने उस किताब से भी इस टेक्स्ट की तहक़ीक़ की लेकिन जो हवाला भंडाफोड़ू ने दिया है उस पेज पर यह टेक्स्ट तो क्या मेराज या जिब्राईल (अलै.) का नाम तक नहीं है। और अगर ये text इस किताब में मौजूद भी हो तो इसके पीछे क्या मंशा है, इसका context क्या है, ये सनद के लिहाज से सही है या नहीं, वगैरह जैसे कई अहम बिंदु इस पोस्ट से जुड़े हैं।

भंडाफोड़ू की दी हुई किताब से इमेज
मालूम यह हुआ कि यह टेक्स्ट खुद इन्होंने बनाया है या कहीं से नकल किया है।

इसी तरह बहुत सी और भी पोस्ट इंटरनेट पर घूमती रहती है, इस बारे में हमारी जिम्मेदारी ये है कि हम हर उस बात कि तहक़ीक़ कर लें जो इस्लाम से या हमारी ज़िंदगी से जुड़ी हो।

अगर इसका कोई और हवाला है आपत्ति करता के पास तो वो हवाला पेश करें, जिससे कि इसकी सत्यता की जांच हो सके।





क्या अल्लाह मुहम्मद ‎ﷺ ‏ के लिए सलाह(नमाज़) ‏कायम करता है?? ‏Quran ‎33:56 – ‏Myth: ‏Allah Prays To Muhammed ‎PBUH

क्या अल्लाह मुहम्मद ﷺ के लिए सलाह(नमाज़) कायम करता है?? इस्लाम के विरोध में आलोचक इतने अंधे हो जाते हैं कि वो बस किसी भी तरह से इस्लाम की आल...