हम इस लेख में मूर्ति पूजा पर स्वामी दयानन्द सरस्वती के क्या विचार थे इस विषय पर प्रकाश डालेंगे। मूर्ति पूजा का खंडन स्वामी जी ने किस स्तर पर किया है और स्वामी जी ने मूर्ति पूजकों को कैसे शब्दों की उपमा दी है इस पर भी दृष्टि डालेंगे।
स्वामी जी के सभी कथनों का सन्दर्भ, आर्य समाज की प्रामाणिक पुस्तकों से दिया जाएगा और आर्य समाज की प्रमाणिक वेबसाइट से उनका लिंक भी सलग्न किया जाएगा।
सर्व प्रथम ये ज्ञात होना आवश्यक है कि आर्य समाज संगठन 150 साल पहले स्वामी जी द्वारा बनाया गया एक संघटन मात्र है और कुछ समय पश्चात स्वयं यह घोषणा कर दी कि यह आर्य धर्म ही वैदिक काल से निरंतर चला आ रहा आर्य धर्म है। स्वामी जी और उनके चेलों ने यह भी कहा है कि उन्होंने जिस संघटन की स्थापना की है वो बाकी सब धर्म से अलग है और यह उन्होंने सभी धर्मों की आलोचना करके सिद्ध कर दिया है।
आर्य समाजी स्वयं को आर्य समाजी ही कहते हैं और ये खुद को हिन्दू धर्म या सनातन धर्मी भी नही कहते हैं। इसका प्रमाण स्वामी जी के जीवन चरित्र में लिखित है:
जीवन चरित्र महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती पृष्ठ संख्या 127
यहाँ से सर्वविदित है कि जो भी स्वामी जी के मत के अनुसार अनुसरण करता है उसे वैदिक धर्मी या सनातन धर्मी या हिन्दू धर्मी नही कहते हैं। आर्य समाजी या आर्य धर्मी कहते हैं।
स्वामी जी ईश्वर के अवतारवाद में भी विश्वास नही करते थे और इसका खंडन भी किया करते थे जीवन चरित्र में ही स्वामी जी का कथन है कि ईश्वर अवतार नही ले सकता क्योंकि वह निराकार है
जीवन चरित्र महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती पृष्ठ संख्या 100
हिन्दू धर्म के पवित्रतम ग्रंथ उपनिषदों का भी खंडन करते थे स्वामी जी, जीवन चरित्र में ही लिखा है कि उपनिषद की कथा और मूर्तिपूजा का खंडन करते थेऔर मूर्ति पूजा का खंडन भी करते थे
जीवन चरित्र महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती पृष्ठ संख्या 57
जीवन चरित्र के पृष्ठ संख्या 52 पर लिखित है कि स्वामी जी श्रीमद्भगवद का भी खंडन करते थे स्वामी जी ने सुना कि यहाँ कथा बड़ी तैयारी के साथ होने वाली है तो स्वामी जी ने भागवत का खंडन करना शुरू किया कथन का आशय यह है कि जब दूसरे लोगों ने भागवत की कथा पढ़ने की तैयारी की तो स्वामी जी ने उसके विरोध में भागवत का खंडन करना आरंभ कर दिया।
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जीवन चरित्र महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती पृष्ठ संख्या 52
शिवलिंग की पूजा का भी खंडन करते थे स्वामी जी और क्यों करते यह एक घृणास्पद कृत्य है, स्त्रियों का लिंग की पूजा करना कोनसा सभ्य कर्म हो सकता है भला?
इसीलिए स्वामी जी ने
जीवन चरित्र महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती पृष्ठ संख्या 118
इसीलिए स्वामी जी ने कि कैसी लज्जा की बात है कि तुम लिंग की पूजा करते हो फिर जब लिंग प्रथक होकर यहाँ आ गया तो शिव कैलाश में हिजड़ा रह गया!
यह स्वामी जी के कथन है जो उनके जीवन चरित्र में वर्णित हैं भला इस तरह का घृणास्पद कार्य स्वामी जी कैसे सहन कर सकते थे इसलिए ताव में आकर स्वामी जी ने शिव जी को ये सब कह दिया।
स्वामी जी एक कठिन परिश्रमी मानव थे वो सदैव अपने कार्य मे आगे रहते थे। इसी तरह एक पृष्ठ पर लिखा है कि स्वामी जी निरन्तर मूर्ति पूजा का खंडन करते रहते थे
हिन्दू धर्म में जो जो भी मान्यता स्वामी जी को कपोल कल्पित लगी आप ने सब का खंडन किया इसी तरह लम्बा तिलक निकालने की मान्यता है । जिसका स्वामी जी ने खंडन किया।
स्वामी जी, पंडित रामधन वशमालि पंडा से कहते थे कि तुम ऊंचा तिलक मत निकालो; साधारण लगाया करो और कंठी तोड़ डालो; अंतः हमने तोड़ डाली। इस तरह से स्वामी जी हिन्दू धर्म में झूठी मान्यता का अंत करते थे
स्वामी जी मूर्ति पूजा का खंडन करने में इतने उत्सुक रहते थे कि मूर्ति पूजा का दावा करने वालों का पीछा तक करते थे। एक मूर्ति पूजक ने दावा किया कि वो मूर्ति पूजा को सिद्ध करेंगे। तो स्वामी जी ने इनको बुलाया तो वो नही आये फिर उनके कहीं जाने की सूचना स्वामी जी को मिली तो स्वामी जी स्वयं ही पीछे गए और उन्हें पकड़ लिया और बैठ कर चर्चा कि तो स्वामी जी ने कहा कि मूर्ति पूजा सिद्ध करने वाला मंत्र कहा हैं बोलो ! वह चुप हो गए। घण्टा भर हो गया तब स्वामी जी ने कहा झूठ ने तुम्हारे मुह पर कुहर लगा दी है ।
स्वामी जी से रामचंद्र जी के बारे में किसी व्यक्ति ने प्रश्न किया कि
रामचंद्र जी कैसे थे?
स्वामी जी ने उत्तर दिया कि : प्रतापी राजा थे ।
उसने कहा कि : अवतार या ईश्वर ओ नहीं थे?
स्वामी जी ने उत्तर दिया कि : नहीं ।
फिर कृष्ण जी के विषय मे प्रश्न किया तो कहा कि वह भी ईश्वरावतार नही थे केवल राजा थे । और आगे कहा कि कृष्ण जी ईश्वर नहीं प्रत्युत एक साधारण मनुष्य सिद्ध होते हैं ।
स्वामी जी के कथनों से सिद्ध होता है कि स्वामी जी एक अलग ही सम्प्रदाय का निर्माण करके गए हैं जिसमे हिन्दू धर्म या सनातन धर्म की अधिकतर मान्यताओं को स्वामी जी ने झूठा मना है अथवा इन मान्यताओं के विरोध में हमेशा खंडन करते हुए प्रतीत हुए हैं।
इसी के प्रभाव में स्वामी जी ने रामचंद्र जी को एक प्रतापी राजा तक कह दिया और कृष्ण जी को साधारण मनुष्य कह दिया। परंतु आज के आर्य समाजी स्वामी जी का अनुसार नही करते हैं और राम चन्द्र जी और कृष्ण जी को एक महान पुरूष बताते हुए स्वामी जी के कथनों पर झूठ का आवरण चढ़ाने की कोशिश करते हैं।
ऐसे ही प्रमाण सत्यार्थ प्रकाश में भी लिखित है। उन पर बाद में बात करेंगे।






