आपत्ति नंबर 16
क़ुरआन सूरह बक़रह
आयत : 82
वे सदैव के लिए जन्नत में रहने वाले हैं।
(आयत : 82)
आपत्ति - 16
चूंकि जीव (आत्मा) असीम गुनाह व सवाब करने की ताकत नहीं रखते इसलिए सदैव के लिए जन्नत या जहन्नम में नहीं रह सकते और यदि ईश्वर ऐसा करे तो वह अन्याय से अनभिज्ञ और बे खबर ठहरे । यदि कियामत की रात न्याय होगा तो मनुष्यों के गुनाह व सवाब समान होने चाहिए यदि कर्म असीम ही नहीं हैं तो उनका फल असीम क्यों कर हो सकता है और मुसलमान लोग दुनिया की पैदाइश सात आठ हजार साल से भी कम बताते हैं क्या इससे पहले खुदा निकम्मा बैठ रहा था ? और क्या कियामत के पीछे भी निकम्मा रहेगा । ये बातें लड़कों की बातों की तरह हैं क्योंकि परमेश्वर के काम सदैव होते रहते हैं और जितना किसी के गुनाह व पुन होते हैं । उसी के अनुसार उसे फल देता है अतः कुरआन की यह बात सच्ची नहीं है ।
आपत्ति का जवाब
स्वामी जी को यदि अदालत मिल जाती तो शायद चोर को इतनी ही मुद्दत कैद करते जितनी उसने चोरी करने में खर्च की होती । पंडित जी यदि कर्मों के समय दंड या इनाम है तो कृष्ण जी । गीता में क्यों कहते हैं कि आत्मा सदकर्म करके आवागमन के चक्कर से छूट जाती है यद्यपि आप इसे किसी खास कारण से न मानते हों लेकिन कृष्ण जी का फरमान आपकी सोच से कहीं । बढ़कर है । आप किसी तर्क से बता दें कि कर्मों के समय समान दंड व इनाम का होना जरूरी है यद्यपि कानून शाही में हम ऐसे अपराध भी देखते हैं कि थोड़े से समय में किए जाते हैं और आजीवन कारावास उनका दंड है । अतएव आप भी बहवाला मनुजी सत्यार्थ प्रकाश पृष्ठ 201 अध्याय 6 न0 42 पर लिखते हैं
सरकारी कर्मचारी को रिश्वत लेने पर जायदाद की जती और सारी उम्र के लिए देश निकाला और झूठी गवाही देने पर जबान काट डाली जाए और मरने के बाद सुख वैभव भी नसीब में नहीं।
बताइए । मुद्दत के बराबर दंड मिला या अधिक । सच पूछो तो अपनी मन गढ़त बातों का यही नतीजा होता है कि आदमी को नदामत के सिवा कुछ नहीं मिलता । हां यह अच्छी भली दलील है जो पंडित जी ने वाक्य 104 में दी है ।
यदि मीठा ही रोज खाया जाए तो थोड़े ही दिनों में जहर की तरह मालूम होने लगता है ।
भला स्वामी जी आपने मीठे की मिसाल दी तो नमकीन की क्यों ने दी । यदि कोई एक मुद्दत तक मीठा खाकर मीठे से घबराता है तो इसलिए कि मीठा उसके जी की मर्जी के अनुसार इतना नहीं होता जितना नमकीन होता है अतः वह मीठे से नहीं बल्कि ना पसन्दीदा चीजों से नफरत कर जाता है । क्या ही समझ का फेर है । भला कोई व्यक्ति यदि दुनिया में बहुत समय तक ऐशो आराम में रहे तो किसी समय उसका मन चाहता होगा कि में कैदखाने में भी कुछ समय गुजारू ?
समाजियो ! धर्म से कहना, आठ हजार साल दुनिया की उम्र आपने कहीं कुरआन के 31वें_1 पारे में तो नहीं देखी ? किसी आयत या हदीस में यह बात कहीं नहीं मिलती बल्कि मात्र आपका या आप जैसों का ख्याल है ।
हां यह भी खूब कही कि इससे पहले ईश्वर निकम्मा बैठा था । पंडित जी ! लीजिए हम आपको बताते हैं यह तो आपकी मामूली बात है कि मुसलमान दुनिया की उम्र आठ हजार साल मानते हैं हां इसमें संदेह नहीं कि मुसलमान बड़े पापी हैं कि ये अल्लाह की जात को छोड़ कर इस सारी कायनात को हादिस (समाप्त होने वाली) अवश्य जानते हैं क्योंकि सारी कायनात मिश्रित है और मिश्रित अनादि नहीं हो सकता इस बात के स्पष्टीकरण के लिए आप ही के कलाम को प्रस्तुत करना उचित है । आप स्वयं नास्तिकों के जवाब में लिखते हैं ।
बिना कर्ता के कोई भी हरकत या हरकत से पैदा होने वाली वस्तु नहीं बन सकती जो जमीन आदि चीजों की ख़ास तरकीब से मिल कर बनी हुई नजर आती हैं अनादि कालिक कभी नहीं हो सकतीं ।
आर्ष साहित्य प्रचार ट्रस्ट
और पृष्ठ 557 पर लिखते हैं
जो मिलाप से पैदा होता है वह अनादिकालिक व सर्वकालिक कभी नहीं हो सकता ।
(सत्यार्थ प्रकाश अध्याय 12 )
आप दुनिया की उम्र चाहे कितनी ही लगा लें और कितने ही इसके कल्प (बार बार पैदा होने) कहें मगर इससे तो आप इन्कार नहीं कर सकते कि दुनिया मुक्कब (मिश्रित) है और जो मिश्रित है । वह नवीन है । नतीजा साफ है कि दुनिया के वजूद में आने का आरंभ है जिससे पहले वह न थी । अतएव आप स्वयं लिखते हैं ।
जो वस्तु मिलाप से बनती है वह मिलाप से पहले नहीं होती और टूट फूट जाने के बाद भी नहीं रहती।
(पृष्ठ - 288 अध्याय 8 न0 28)
अतः आपके कलाम से भी यह पता चला कि ईश्वर किसी समय निकम्मा बैठा होगा । ऐसा ही किसी समय निकम्मा बैठेगा । यदि आप कहें कि वर्तमान दुनिया का आरंभ व अन्त है मगर इसका सिलसिला अनादिकालिक है । एक दुनिया के बाद दूसरी और दूसरी दुनिया के बाद तीसरी । (सत्यार्थ प्रकाश अध्याय 8 न24)
तो यह आपके उसूल के खिलाफ है क्योंकि अनादि पदार्थ आपने केवल तीन ही गिने हैं । परमेश्वर (खुदा) जीव (आत्मा) प्रकृति, अविभाजित अंश । (सत्यार्थ प्रकाश अध्याय 8 पेज 172)
अतः यदि इन चीजों के सिवा दुनिया के सिलसिले को भी आपने प्राचीन और अनादि कालिक माना तो चार चीज़ क्यों अनादिकालिक मानते हो । जिससे नास्तिकता की बुनियाद पक्की हो । यह बात सही है कि बाहरी पदार्थों को सम्पूर्ण पर प्राथमिकता जमानी होती है जिसका साफ मतलब यह है कि एक समय अवश्य ऐसा होता है कि पदार्थ हों मगर कुल (सम्पूर्ण) जो उनसे मिलकर बना है न हो अतएव आप भी मानते हैं कि "जो वस्तु मिलाप से बनती हैं वह मिलाप से पहले नहीं होती।" अतः इस उसूल को मानते हुए भी दुनिया के सिलसिले को प्राचीन कहना विरोध करने वालों के साथ होना है जो बुद्धिमानों के लिए उचित नहीं तो फिर नतीजा साफ है कि दुनिया का सिलसिला किसी खास समय से चला है कि जिसको ईश्वर ने इसके लिए उचित समझा इससे पहले ईश्वर बेकार हो या काम वाला । हम दोनों के सोचने से बाहर हैं | हमारा तो केवल इतना ही कहना है कि
अल्लाह ने सब चीजों को पैदा किया और हर चीज़ को जानता है।"
जब कुछ न था तब निराकार था
खिलकृत का पैदा करनहार था
[नोट:- सृष्टि रचना के बारे में दयानन्द जी किस तरह विफल हो गए ये जानने के लिए हम अनवर जमाल साहब की लिखी हुई किताब "दयानन्द जी ने क्या खोजा क्या पाया?" मेसे एक छोटा सा अंश सृष्टि रचना और परमाणु पर देखते हैं
सृष्टि संरचना की ग़लत कल्पना को वैदिक सिद्धान्त समझ बैठे स्वामी जी?
... सबसे सूक्ष्म टुकड़ा अर्थात जो काटा नहीं जाता उसका नाम परमाणु, साठ परमाणुओं से मिले हुए का नाम अणु, दो अणु का एक द्वयणुक जो स्थूल वायु है तीन द्वयणुक का अग्नि, चार द्वयणुक का जल, पांच द्वयणुक की पृथिवी अर्थात तीन द्वयणुक का त्रसरेणु और उसका दूना होने से पृथ्वी आदि दृश्य पदार्थ होते हैं। इसी प्रकार क्रम से मिलाकर भूगोलादि परमात्मा ने बनाये हैं।
(सत्यार्थ प्रकाश, अष्टम. पृ.152)
हरेक अणु में 60 परमाणु होते हैं। ऐसा कहना विज्ञान के विरुद्ध है।
परमाणु टूटने के साथ ही स्वामी जी का दर्शन मिथ्या सिद्ध हो गया
परमाणु को अविभाज्य मानना भी ग़लत है। दरअसल प्राचीन काल से भारतीय दर्शन में परमाणु का न टूटना बताया गया है और स्वामी जी के काल तक परमाणु को तोड़ना संभव नहीं हुआ था। इसलिए वह परमाणु को अविभाज्य लिख गए हैं परन्तु अब परमाणु को तोड़ना संभव है। विदेशी वैज्ञानिकों ने अपने विज्ञान से परमाणु को तोड़ डाला। भारत के वैज्ञानिकों ने उनसे यह विज्ञान सीखा। आज भारत में कई ‘परमाणु रिएक्टर’ इसी सिद्वान्त के अनुसार ऊर्जा उत्पादन करते हैं। परमाणु के टूटने के बाद स्वामी जी का परमाणु विज्ञान व्यर्थ और कल्पना मात्र सिद्ध हुआ। दरअसल यह कोई वैदिक सिद्धान्त नहीं है बल्कि एक दार्शनिक मत है। विदेशी वैज्ञानिकों ने जैसे अविष्कार बिना वेद पढ़े ही कर दिए हैं, आर्य समाजियों को अपने गुरूकुलों में वेद पढ़कर उनसे बड़े अविष्कार कर दिखाने थे। वे ऐसा कुछ नहीं कर पाए, सिवाए दूसरों की मज़ाक़ उड़ाने और डींग हाँकने के। परमाणु टूट गया लेकिन फिर भी वे दर्शन की उन पुरानी मान्यताओं को नहीं छोड़ पाए, जिन्हें भारतीय वैज्ञानिकों ने त्याग दिया है।
आग, पानी, हवा और पृथ्वी की संरचना का वर्णन भी विज्ञान विरूद्ध है। उदाहरणार्थ चार द्वयणुक अर्थात 8 अणुओं के मिलने से नहीं बल्कि हाइड्रोजन के 2 और ऑक्सीजन का 1 अणु, कुल 3 अणुओं के मिलने से जल बनता है। इसी तरह पृथ्वी भी पांच द्वयणुक से नहीं बनी है बल्कि कैल्शियम, कार्बन, मैग्नीज़ आदि बहुत से तत्वों से बनी है और हरेक तत्व की आण्विक संरचना अलग-अलग है। वायु के विषय में भी स्वामी जी का मत ग़लत है। वायु भी दो अणुओ से नहीं बनती। जो बात स्वामी जी ने जैनियों के विषय में कही है। वह स्वयं उन पर ही चरितार्थ हो रही है। देखिए-
स्थूल वात का भी यथावत ज्ञान नहीं तो परम सूक्ष्म सृष्टिविद्या का बोध कैसे हो सकता है?
(सत्याथ प्रकाश, द्वादशसमुल्लास, पृष्ठ 294)]
_______________________________________________
1 - कुरआन के कुल 30 पारे हैं ।
No comments:
Post a Comment