आपत्ति नंबर 10
क़ुरआन सूरह बकरा
आयत : 32-34
आदम को सारे नाम सिखाए फिर फ़रिश्तों के सामने करके कहा । जो तुम सच्चे हो मुझे इनके नाम बताओ । कहा ऐ आदम बता दे उनको नाम उनके । तो जब बता दिए उनके नाम तो ईश्वर ने फरिश्तों से कहा कि क्या मैंने तुम से न कहा था कि निस्संदेह मैं धरती और आकाश की छुपी चीजें और जाहिर और गायब कर्मों को जानता हूं ।
(आयत : 32-34)
आपत्ति - 10
भला इस तरह फरिश्तों को धोखा देकर अपनी बड़ाई करना ईश्वर का काम हो सकता है ? यह तो एक धब्बे की बात है, इसे कोई विदान मान नहीं सकता और न ऐसा मजाक व बकवास कर सकता है । क्या ऐसी बातों से ईश्वर अपनी करामात जमाना चाहता है ? हां जंगली लोगों में कोई कैसा ही पाखंड चला ले तो चल सकता है । सुशील व सज्जन लोगों में नहीं ।
आपत्ति का जवाब
स्वामी जी को असल मतलब से तो कोई लेना देना है नहीं मगर अपने पाठकों को इस आयत का मतलब बताते हैं वह यह है कि ईश्वर ने हज़रत आदम को पैदा करने और दुनिया में खलीफा (अपना नायब) बनाने की फरिश्तों को सूचना दी । फ़रिश्तों ने अपनी इच्छा को गुप्त रख कर कुछ विनती की जिसका मतलब यह था कि हम खिलाफत के पद के हकदार हैं क्योंकि हम तेरी उपासना में लगे रहते हैं और दिल में यह बात भी रखी कि हम को सब_1 चीजों का ज्ञान भी है जो खिलाफत के लिए जरूरी भी है चूंकि यह दावा उनका गलत न था इसलिए अल्लाह ने उनकी परीक्षा लेने हेतु ।
आदम को सारी चीजों का ज्ञान (नाम एवं गुण) प्रदान किया जिस प्रकार ईश्वर ने
प्रथम सृष्टि की आदि में परमात्मा ने अग्नि, वायु, आदित्य तथा अंगिरा इन ऋषियों के आत्मा में एक-एक वेद का प्रकाश किया।
[सत्यार्थ प्रकाश सातवां समुल्लास पेज 234, वैदिक पुस्तकालय, दयानन्द आश्रम, अजमेर संस्करण 2005]
इसके बाद फ़रिश्तों से उनके दावे की पुष्टि कराने को उन सब चीजों के नाम पूछे वे न बता सके । अन्त में अपने दोष को स्वीकारे । यह बात पूरी तरह साफ है मगर स्वामी जी न समझे तो किस की गलती ? अफसोस स्वामी जी हर बार अपना उसूल भूल जाते हैं ।
जो धर्म दूसरे धमाँ को, कि जिनके हजारों करोड़ों आदमी श्रद्धालु हों झूठा बता दे और अपने को सच्चा ज़ाहिर करे उससे बढ़कर झूठा और धर्म कौन हो सकता।
(पहले पैराग्राफ की पांचवी लाइन से पढ़ें)
- विस्तार से जानने के लिए तफसीर सनाई देखो ।
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