आपत्ति नंबर 17
क़ुरआन सूरह बक़रह
आयत : 84-85
और जब ली हमने प्रतीज्ञा तुम्हारी, न डालो तुम रक्त अपने आपस के और न निकाल दो किसी आपस में अपने को घरों अपने से । फिर इकरार किया तुमने और तुम गवाह हो । फिर तुम वे लोग हो कि मार डालते हो आपस में अपने के और निकाल देते हो एक सम्प्रदाय को आप में से घरों उनके से ।
आपत्ति - 17
भला प्रतीज्ञा करना, कराना कोई अल्पज्ञान और मन बुद्धि वाले लोगों की बात है या ईश्वर की ? जब ईश्वर सर्व ज्ञाता है तो ऐसी बेहूदा बातें दुनिया दारों की तरह क्यों करेगा ? आपस में रक्त न बहाना और अपने धर्म वालों को घर से न निकालना और दूसरे धर्म वालों का रक्त बहाना और घरों से उनको निकाल देना भला कौन सी अच्छी बात है ? यह तो मूर्खता और पक्षपात से भरी व्यर्थ की बात है । क्या ईश्वर पहले से ही नहीं जानता था कि यह प्रतीज्ञा मेरे खिलाफ करेंगे ? इससे स्पष्ट होता है कि मुसलमानों का खुदा भी इसाइयों के बहुत से गुण रखता है और यह कुरआन दूसरी किताबों का मोहताज है क्योंकि इसकी थोड़ी सी बातों को छोड़कर शेष सब बाइबिल की हैं ।
आपत्ति का जवाब
ऐसी निरर्थक आपत्तियां यदि कोई और करता तो उसकी शिकायत भी होती । पंडित जी के स्वभाव में तो ऐसी ही बाते भरी थीं । इसलिए वे अपनी आदत से मजबूर हैं । क्या अजीब लाजिक छांटी है कि प्रतीज्ञा कराना भी सीमित व मन बुद्धि वाले लोगों का काम है । पंडित जी ईश्वर की प्रतिज्ञा लेने का मतलब आदेश का होना है यदि आदेश देना भी सीमित बुद्धि वालों का काम है तो सारे वेद भगवान की टीका लिखने का कष्ट क्यों उठाया था ? आखिर उसमें भी तो आदेश ही हैं ।
बाकी मरने मारने का जवाब वाक्य नंबर 2 में आ चुका है हां यह भली कही कि पहले नहीं जानता था कि ये प्रतीज्ञा के विरुद्ध करेंगे ? क्या परमेश्वर नहीं जानता था कि आर्य व्रत के आयों ने मेरे प्रस्तावित निर्देशों पर तो अमल करना नहीं जिसका बदला उनको दुनिया ही में महमूद गजनवी और मुहम्मद गौरी से दिया जाएगा । फिर क्यों हथियारों की सफाई और उनको तैयार रखने का निर्देश देता रहा । (देखो नम्बर 2)
हाथ ला उस्ताद क्यों कैसी कही ?
सच है, बहुत से लोग ऐसे हठ धर्म होते हैं कि बात करने वाले के खिलाफ असल उद्देश्य की तावील करते हैं उनकी बुद्धि अंधेरे में। फंस कर नष्ट हो जाती है ।
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