आपत्ति

Monday, 8 June 2020

आपत्ति नंबर 18
क़ुरआन सूरह बक़रह 
आयत : 86
ये वे लोग हैं कि मोल लिया सांसारिक जीवन परलोक के बदले । तो ने हल्की की जाएगी उनसे यातना और न मद्द किए जाएंगे ।
(आयत - 86
आपत्ति - 18

भला ऐसी घृणा व ईष्र्या की बातें कभी ईश्वर की ओर से हो सकती हैं ? जिन लोगों के गुनाह हल्के किए जाएंगे या जिनको मदद दी जाएगी वे कौन हैं ? यदि वे पापी हैं और पापों के बिना दंड दिए या हल्के किए जाएंगे तो अन्याय होगा । जो दंड देकर भी हल्के न किए जाएंगे तो जिनका बयान इस आयत में है ये भी दंड भोग कर हल्के हो सकते हैं और दंड देकर भी हल्के न किए जाएंगे तब भी अन्याय होगा । यदि गुनाहों से हल्के किए जाने वालों का मतलब ईश्वर से डरने वालों से है तो उनके गुनाह तो आप ही हल्के हैं । ईश्वर क्या करेगा । इससे मालूम हुआ कि यह लिखावट किसी विद्वान की नहीं और वास्तव में धर्मात्माओं को सुख और अधर्मियों को दुख उनके दुष्कर्मों के अनुसार ही सदैव देना चाहिए । 

आपत्ति का जवाब

पंडित जी ! इतनी घृणा कि “मैं बदकार अत्याचारियों को कभी आशीर्वाद नहीं देता" (त्रग वेद अशटक 1 अध्याय 2 वरग 18 मंत्र 2) "अगर मगर" में आपने जितना समय खोया किसी अरबी पाठशाला में जाकर इस आयत का मतलब पूछ लेते कि ये लोग कौन हैं तो इतना कष्ट आपको न होता । न इस्लाम के प्रति भ्रम फैलाने का आपको पाप होता । ये वही लोग हैं जिनको आप भी सत्यार्थ प्रकाश अध्याय 10 में मनु जी के हवाले से कर आए हैं । कि 
 "जो व्यक्ति वेद की निंदा करता है वही नास्तिक है ।"

बल्कि यही हैं जिनके बारे में वेद में कहा गया है ।

वे परमेश्वर की मदद और हिमायत से वंचित रहकर सदैव की मौत अर्थात जीने मरने के चक्कर में रहते हैं ।
सुनों और बड़े ध्यान से सुनो । असल कुरआनी शब्द ये हैं 

उलाइक ल्लाजी नश त र वुल हयातद दुन्या बिल आखिरति फला मुखफुफ्फु अन्हुमुल अज़ाबु वला हुम युन्सन
उन्हीं लोगों ने दीन के बदले दुनिया को पसन्द किया । अतः उनसे यातना में कमी न होगी और न ही उनको किसी से मदद पहुंचेगी । 
 
समाजियो ! यदि अरबी लिखने की योग्यता रखते हो तो इन शब्दों पर सोच विचार करो, नहीं तो अनुवाद ही देख लो और अपने स्वामी की आपत्तियों की दाद दो ।

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